🎓 *दि बुध्दीस्ट पर्सनल लॉ - कानुन बौध्द समुदायों के लिये बहुत जरुरी है या नहीं ??? एक संशोधन कानुनी चिंतन !!!*
*डॉ मिलिन्द जीवने 'शाक्य',* नागपुर १७
राष्ट्रिय अध्यक्ष, सिव्हिल राईट्स प्रोटेक्शन सेल
एक्स व्हिजिटिंग प्रोफेसर, डॉ बी आर आंबेडकर सामाजिक विज्ञान विद्यापीठ महु मप्र
एक्स मेडिकल ऑफिसर एवं हाऊस सर्जन
बुध्द आंबेडकरी लेखक, कवि, समिक्षक, चिंतक
आंतरराष्ट्रीय परिषद के संशोधन पेपर परिक्षक
मो. न. ९३७०९८४१३८, ९८९०५८६८२२
अभी अभी मा सर्वोच्च न्यायालय के सरन्यायाधीश मा. *सुर्यकांत / न्या. जय माल्या बागची* इनके खंडपीठ ने, *बौध्द पर्सनल लॉ एक्शन कमेटी* इनके बौध्द धर्मियों का अलग से कानुन हो, इस याचिका पर, एक निर्णय (?) दिया है. उस निर्णय में सर्वोच्च न्यायालय ने याचिकाकर्ता को कहा कि, *"कोर्ट संविधान में बदलाव का निर्देश देने की स्थिती में नहीं है. हालाकी लॉ कमिशन द्वारा पार्लियामेंट को सुझाव दिया जाता है. हम लॉ कमिशन को रिक्वेस्ट कर सकते हैं कि, वह आप को सुनने का मौका दे."* इस निर्णय पर "बौध्द पर्सनल लॉ एक्शन कमेटी" बहुत बडी खुश और बहुत बडा तीर मार दिया है, इस प्रकार बौध्द समुदाय को संदेश देना चाहती है. वास्तव यह है कि, जब भी हम कोई *"रिप्रेझेंटेशन"* सरकार को देते है या सरकार से कोई मांग करते रहे है, बस वह *"रिप्रेझेंटेशन"* अब याचिकाकर्ता नहीं है, सर्वोच्च न्यायालय का रहा है. *"मा. सर्वोच्च न्यायालय भारत सरकार को केवल रिक्वेस्ट कर रही है. वह आदेश नहीं दे रही है."* इसके अलावा उस निर्णय में कुछ भी ऐसा नहीं है. *"दि पर्सनल बुध्दीस्ट लॉ"* हो, इस विषय पर *"मेरे स्वयं"* के बहुत सारे लिखाण मिडिया पर मौजुद है. साथ ही वह *"दि बुध्दीस्ट पर्सनल लॉ "* कैसे हो ? उस कानुन में हमने *"क्या क्या अंतर्भाव"* करना चाहिए ? आदि संदर्भ में एक *"अखिल भारतीय बौध्द विचारविध कानुन परिषद"* का आयोजन करने का, मेरी संघटन *"सिव्हिल राईट्स प्रोटेक्शन सेल "* का एक मिशन भी रहा था. परंतु मैं पिछले *"तिन साल"* से, मेरे कुछ उलझन में होने से, उस दिशा में मैं कदम नहीं बढा पाया. *"बगैर बौध्द विचारविधों से चर्चा हुये बिना / संशोधन पेपर सादरीकरण के बिना, उस कानुन पर पहल करना"* यह संभव भी नहीं होगा. उसी दरम्यान *"बौध्द पर्सनल लॉ एक्शन कमेटी"* के तथाकथित विद्वान (?) *एड दिलिप काकडे* यह महाशय सर्वोच्च न्यायालय चले गये. हमारे उत्तर नागपुर के विधायक और हमारे मित्र *डॉ. नितीन राऊत* इन्होने भी, कुछ वकिल लोगों को बुलाकर *"बुध्दीस्ट एक्ट"* का ड्राफ्ट बनाया था. और वह ड्राफ्ट बनाने में जुडा एक वकिल ड्राफ्ट बनाने के बाद, *"मुझे मिलने मेरे ऑफिस"* आकर बडी बडी बातें कहने लगा. तब मैने उस वकिल से पुछा था कि, *"उस ड्राफ्ट में संस्कार विधी क्या बतायी गयी है ?"* फिर वह ड्राफ्ट बनानेवाला वकिल खामोश हो गया. मैने उस वकिल को, *"डॉ बाबासाहेब लिखित पत्र बौध्द विवाह संस्कार"* लिखित एक पुस्तक भेट की. नितिन राऊत और अन्य कुछ के प्रयास रहे है. महाराष्ट्र शासन के *"सामाजिक न्याय विभाग"* द्वारा कुछ पहले भी की गयी. बाद में वह विषय थंडे बस्तें में चला गया. *"क्या वह कानुन केवल महाराष्ट्र सिमित है ?"* यह भी प्रश्न है. बौध्द समुदायों के कुछ मान्यवरों से, *दिलिप काकडे* द्वारा सर्वोच्च न्यायालय जाने के लिये, *"बहुत कुछ धन उगाई"* करने की भी बहुत चर्चा है. और उसका फल क्या मिला ? हम सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय हम देख रहे है. *दिलिप काकडे / डॉ नितीन राउत* इस महाशय के अकेले विचारों से, *"समस्त बौध्द समुदायों"* पर कोई *"बौध्द कानुन"* लागु करना, यह एक प्रकार का अन्याय ही है. अब हम *"दि बुध्दीस्ट पर्सनल लॉ"* इस अंतरंग में जाने के पहले, *"अन्य धर्मिय कानुनों को तथा हिंदु यह धर्म है या नहीं ?"* इस मा सर्वोच्च न्यायालय के कुछ *"जजमेंट सायटेशन"* पर चर्चा करना बहुत जरुरी है.
गुलाम भारत यें १५ अगस्त १९४७ को आझाद हुआ और भारत २६ जनवरी १९५० में *"संविधान संस्कृति"* में वह बांधा गया या *"प्रजासत्ताक देश"* हुआ. अर्थात *बाबासाहेब डॉ आंबेडकर* इन्होने भारत को *"संविधान "* दिया. बाबासाहेब डॉ आंबेडकर ने ११ अगस्त १९४७ को *"हिंदु कोड बिल"* यह प्रस्ताव सादर किया था. उसके पहले *ब्रिटिश काल* में, अंग्रेज अधिकारी *वारंन हेस्टिंग* इन्होने, सन १७७२ को ब्राह्मणी हिंदु ग्रंथ आधार पर, *"कानुन"* संकलित किया गया था, जिसे *"एंग्लो हिंदु लॉ"* यह कहा गया. यह *"हिंदु कानुन"* उसका आधुनिकीकरण भी कहा जाता है. बाबासाहेब आंबेडकर का वह प्रस्ताव ३१ अगस्त १९४८ को, *"प्रवर समिती के निष्कर्ष अध्ययन"* को रखा गया था. प्रवर समिती द्वारा १९ दिसंबर १९४९ को, *"विधायक पर विचार"* हुआ. सन १९५० में *"विधेयक पर बहस ही नहीं"* हुयी. सन १९५१ को विधेयक पर *"संसद में तिन दिनों"* तक चर्चा हुयी. जनसंघ के श्यामा प्रसाद मुखर्जी तथा कट्टर हिंदू संघटनों का विरोध होने से, वह बिल *"सप्टेंबर १९५१ को, संसद में पारीत ही नहीं"* हुआ. अत: बाबासाहेब डॉ आंबेडकर इन्होने, २७ सितंबर १९५१ को *"कानुन मंत्री"* पद से इस्तिफा दिया. बाबासाहेब डॉ आंबेडकर इनके दृष्टिकोन से, वह हिंदु कोड बिल यह *"महिला सशक्तीकरण / कानुनों का संहितीकरण / सामाजिक सुधार / समानता का आधार"* कहा गया था. आगे जाकर वह हिंदु कोड बिल (The Hindu Personal Law 1955) *"चार भागों"* में पारीत कर निम्न कानुन बनाये गये. *"हिंदु विवाह अधिनियम १९५५ / हिंदु उत्तराधिकारी अधिनियम १९५६ / हिंदु अल्पसंख्याक और संरक्षकता अधिनियम १९५६ / हिंदु दत्तक ग्रहण और भरण पोषण अधिनियम १९५६."* बाबासाहेब सन १९५५ में कानुन मंत्री नहीं रहे थे. और बाबासाहेब डॉ आंबेडकर ने *"दि बुध्दीस्ट सोसायटी ऑफ इंडिया"* की नीव सन १९५४ में रखकर, उसका पंजीकरण (न. ३२२७) *"४ मई १९५५"* में किया गया. और *"बौध्द धर्म दीक्षा"* यह १४ अक्तुबर १९५६ को लिया था. अत: बाबासाहेब को *"दि बुध्दीस्ट पर्सनल लॉ"* बनाने का समय ही नहीं मिला. क्यौं कि, बाबासाहेब ये *"दि बुध्दा एंड हिज धम्मा"* यह ग्रंथ लिखने में व्यस्त थे. अब हमे *"हिंदु धर्म / हिंदुत्व"* है या नहीं ? इसे सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय आधार पर देखना है.
सर्वोच्च न्यायालय की याचिका क्रमांक 1966 SCR (3) 242 सरन्यायाधीश *पी बी गजेंद्रगडकर* इनकी अध्यक्षतावाली *"पाच"* न्यायाधीशों की खंडपीठ - *न्या. के एन वाच्छु / न्या. एम हिदायतुल्ला / न्या. व्ही रामास्वामी / न्या. पी सत्यनारायण* इन्होने तो, १४ जनवरी १९६६ को ही, *"हिंदु धर्म / हिंदुत्व"* संदर्भ में अपने निर्णय में कहा कि, *"हिंदु / हिंदुत्व यह संकल्पना सुसंगत नहीं. हिंदुत्व यह जीवन जीने का एक मार्ग है."* दुसरे अर्थ में हम कहे तो, हिंदु यह धर्म नहीं माना. हिंदु धर्म का कोई *संस्थापक"* ही नहीं है. *"हिंदु"* यह शब्द मुस्लिम शासकों द्वारा दी गयी गाली थी. *"हिंदु > हिनदु > हिन + दु > हिन = निच, चोर ... दु = प्रजा > हिंदु = चोर, काले मुहंवाला"* इस अर्थ में वह शब्द होने से, *स्वामी दयानंद सरस्वती* इन्होने, हिंदु इस शब्द के प्रयोग ना करने की चेतावणी दी थी. और *"ब्राह्मणी"* मानसिकता को यह शब्द बिलकुल सही दिखाई देता है. दुसरी केस *तिस्ता शितलवाड* याचिका पर दिखाई देता है. इसके अलावा *"हिंदुत्व"* अवधारणा संदर्भ में, *रमेश प्रभु विरुद्ध प्रभाकर कुंटे* और *बाल ठाकरे विरुद्ध प्रभाकर कुंटे* यह याचिका भी देख सकते हैं. सन २०१६ में सरन्यायाधीश *टी. एस. ठाकुर* इनकी अध्यक्षतावाली *"सात"* न्यायाधीश खंडपीठ - *न्या. रंजन गोगोई / न्या. मदन लोकुर / न्या. कुरियन जोसेफ / न्या. ए के सिकरी / न्या. एन व्ही रमन्ना / न्या. आर एफ नरिमन* इन्होने २५ अक्तुबर २०१६ के *"पुनर्विचार याचिका"* पर अपने निर्णय में कहा कि, *"हिंदुत्व क्या कहे ? इसका अर्थ क्या है ? अदालत इस समय इस विवाद में नहीं पडेगी. अदालत सन १९९५ के फैसले पर पुनर्विचार नहीं करेगी. साथ ही इस स्तर पर हिंदुत्व और हिंदु धर्म की भी पडताल नहीं करेगी."* हिंदु धर्म की व्याख्या नहीं की है. और इस स्वरूप की बहुत सारी याचिका का संदर्भ दिया जा सकता है. संघवाद नायक *डॉ मोहन भागवत"* उन्होंने भारत को, *"संविधान से परे होकर भारत को हिंदु राष्ट्र माना है."* इसे बडी मुर्खता (?) कहे या बिन-अकलवाद / देशद्रोहीता ! यह हर आदमी अपने अपने विचारों से ही सोंचे !!! अब हम और अन्य धर्म के कानुनों पर भी, दृष्टीक्षेप करते है.
*"दि मुस्लिम पर्सनल लॉ (शरियत) एप्लिकेशन्स एक्ट १९३७"* यह कानुन मुस्लिम धर्म से जुडा है. वह कानुन मुस्लिम समुदायों के लिये व्यापक रुप में दिखाई देता है.*"भारतीय इसाई विवाह अधिनियम १८७२"* यह इसाई वा ख्रिस्तियन कानुन में विवाह की प्रक्रिया, पंजियन और संबंधित नियम शामिल भी है. यह कानुन इसाई विवाहों को वैध बनाता है. कौन व्यक्ति विवाह संपन्न करा सकता है ? जैसे - पादरी या रजिस्ट्रार. *"सिख गुरुद्वारा अधिनियम १९२५"* - जो ब्रिटिश भारत में पारित एक ऐसा महत्वपूर्ण कानुन था. जिसने सिख गुरुद्वारा (पुजा स्थल) के प्रबंधन को *"वंशानुगत महंतो"* (पुजारी) से निकालकर एक निर्वाचीत निकाय - *"शिरोमणी गुरुद्वारा प्रबंधन समिती"* (SGPC) के नियंत्रण में लाने का काम भी किया है. जिसमें गुरुद्वारा के संपत्ती का उपयोग धार्मिक उद्दशों के लिये सुनिश्चित हो सके. और सिख समुदायों में सुधार आंदोलन के कानुनों का आधार मिला है. *"दि बुध्दिस्ट पर्सनल एक्ट"* अब तक बन नहीं पाया है. यही कारण है कि, हम हमारे सभी *"बुध्द विहारों की जबाबदेही"* नहीं निश्चित कर पाये है. *"महाबोधी महाविहार कानुन"* (बुध्दगया) पर *"ब्राह्मण्य अधिपत्य"* नहीं हटा सके. हमारे *"समान बौध्द संस्कार"* नही निर्धारीत कर पाये है. हम बौध्द समुदाय को *"धार्मिक एकसंघ"* कर नहीं पाये है. भारतीय संविधान *"अनुच्छेद २५ और २६"* (मुलभूत अधिकार) का भी हम उचित लाभ नहीं ले सके हैं . *"समान नागरी कायदा"* (Uniform Civil Code - UGC) यह अलग विषय है. *"विधी आयोग"* (Law Commission of India - LCI) यह केवल सरकार का *"पालतु कुत्ता"* बनकर काम करता है. यहां सवाल तो, संसद में बैठे हुये हमारे अपने *"सांसदो"* का भी है.
हमारे *"दि बुध्दिस्ट पर्सनल लॉ"* (The Buddhist Personal Law) में कौन कौन से संदर्भ हो सकते हैं ? यह विषय महत्वपूर्ण है. जैसे की - *"बौध्द विवाह अधिनियम / बौध्द बाल संस्कार एवं अन्य संस्कार अधिनियम / बौध्द उत्तराधिकारी अधिनियम / बौध्द दत्तक ग्रहण और भरण पोषण (वृध्द पाल्य सहित) अधिनियम / बौध्द सुरक्षा अधिनियम /बौध्द पंजीकरण अधिनियम / बौध्द मायनारिटी वेल्फेअर अधिनियम / बौध्द शिक्षा संस्थान अधिनियम"* आदि बहुत सारे संदर्भ हो सकते है. मेरी हमारी राष्ट्रिय संस्था - *"सिव्हिल राईट्स प्रोटेक्शन सेल "* द्वारा चार जागतिक बौध्द परिषद / एक जागतिक बौध्द महिला परिषद / एक ऑन लाईन विश्व शांती परिषद (कोरिया की HWPL के समन्वय से) / दोन अखिल भारतीय आंबेडकरी विचारविध परिषद / एक अखिल भारतीय आंबेडकरी महिला विचारविध परिषद / तिन विश्व शांती रॅली आदि का सफल आयोजन किया जा चुका है. परंतु पिछले *"तिन सालों"* में, मेरे अपने कुछ उलझनों के कारण, *"अखिल भारतीय बुध्द - आंबेडकरी विचारविध कानुन परिषद"* का बडा आयोजन, मैं नहीं कर पाया हुं, इसका भी मुझे बहुत खेद है. और उस *"कानुन परिषद"* में भारत के बुध्दजीवी वर्ग से, *"संशोधन पेपर"* भी मंगाये जानेवाले है. अत: भविष्य में मेरी हमारी संघटन - सिव्हिल राईट्स प्रोटेक्शन सेल द्वारा *"राष्ट्रिय तथा आंतरराष्ट्रीय कामों"* में, अधिक शिघ्र गती से आगे बढेगी, यह मुझे उम्मीद है. और *"दि बुध्दीस्ट पर्सनल लॉ"* संदर्भ में, उचित निर्णय लेकरं *"ब्ल्यू प्रिंट"* तयार करेगी, यही आशा के साथ !!!
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▪️ *डॉ मिलिन्द जीवने 'शाक्य'*
नागपुर, दिनांक २६ दिसंबर २०२५
(बाबासाहेब डॉ आंबेडकर इन्होने हिंदु कोड बिल पारित ना होने कारण, दिनांक २७ सितंबर १९५१ को कानुन मंत्री पद से इस्तिफा दिया था. और २५ दिसंबर १९२७ को मनुस्मृती (महाड में गंगाधर सहस्त्रबुद्धे और सिताराम शिवणकर इन दो ब्राह्मणों के हस्ते) दहन कर, मानवी समानता का बिजारोपन किया था. उसी उपलक्ष में यह लेख है.)
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