💲 *केंद्र सरकार के समकक्ष पगार वा पेंशन यह राज्य सरकारी कर्मचारी वा अंडरटेकींग कॉर्पोरेशन कर्मचारी को सर्वोच्च न्यायालय के जजमेंट आधार पर संभव है ?*
*डॉ मिलिन्द जीवने 'शाक्य',* नागपुर १७
राष्ट्रिय अध्यक्ष, सिव्हिल राईट्स प्रोटेक्शन सेल
एक्स व्हिजिटिंग प्रोफेसर, डॉ बाबासाहेब आर. आंबेडकर सामाजिक विज्ञान विद्यापीठ महु मप्र
एक्स मेडिकल ऑफिसर एवं हाऊस सर्जन
बुध्द आंबेडकरी लेखक, कवि, समिक्षक, चिंतक
आंतरराष्ट्रीय परिषद के संशोधन पेपर परिक्षक
मो. न. ९३७०९८४१३८, ९८९०५८६८२२
१७ दिसंबर यह दिन *"पेंशन दिन"* के रुप मे याद किया जाता है. उस दिन का इतिहास जानना भी जरुरी है. *इंदिरा गांधी* सरकार ने, *"३० मार्च १९७९"* को, एक आदेश द्वारा *"पेंशन का दो भागों में विभाजीत"* किया था. एक ही वर्ग के, समान पद पर काम करनेवाले केंद्रीय कर्मचारी को, सदर दिनांक आधार पर, *"केंद्रीय पेंशन में तफावत"* कर दी गयी थी. सदर पेंशन में पिडित केंद्रीय कर्मचारी - *डी. एस. नाकारा* तथा अन्य विरुद्ध *भारत सरकार* इस केस में, तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश *डी. ए. देसाई* इनके अध्यक्षतावाली पांच खंडपीठ में *न्या. यशवंत चंद्रचूड, न्या. व्ही डी तुळजापुरकर, न्या. ओ चिन्नाप्पा रेड्डी, न्या. बहरलाल इस्लाम* इन्होने १७ दिसंबर १९८२ को, जो जजमेंट दिया गया है, वह *"केंद्र सरकार के पेंशनधारक"* (पेंशन नियम १९७२) को ही नहीं तो, *"आर्मी पेंशन रेगुलेशन"* को भी लागु किया गया. सदर केस में 1983 AIR 134, 1983 SCR (2) 165, AIR 1983 SC 130 आदी सायटेशन का संदर्भ दिया जाने का, संदर्भ बताया जाता है. सर्वोच्च न्यायालय के सदर जजमेंट में, *"कुछ महत्वपूर्ण बिंदुओ"* पर प्रकाश डाला गया. वह *"बिंदु भी"* हमें समजना बहुत जरुरी है.
मा. सर्वोच्च न्यायालय द्वारा उस जजमेंट में कुछ महत्वपूर्ण बिंदु है - *"पेंशन यह कोई दान नहीं, या मेहरबानी नहीं, यह आप का कानुनी हक है. पेंशन यह आप की सेवा से अर्न किया गया है. पेंशन यह सोशल वेल्फेअर मेजर है, सुरक्षा देने का तरीका है. सिर्फ रिटायरमेंट तारिख के आधार पर, एक ही तरह के पेंशनर्स को, दो हिस्सों में बाटना, कुछ को कम तो कुछ को ज्यादा पेंशन देना, यह संविधान अनुच्छेद १४ - (समानता) मुलभूत अधिकारों का उल्लंघन है. सोशल वेल्फेअर का जिक्र करते हुये "डायरेक्टिव्ह प्रिन्सिपल" के अनुच्छेद ४१ - Rights to Work, to Education and to public Assistances in certain cases"* का भी संदर्भ दिया था. अर्थात केंद्र सरकार पेंशनधारक से *"भेदभाव नहीं"* कर सकती. और पेंशनर्स के सन्मान / गरिमा पर अपनी मुहर लगाई है. परंतु सदर जजमेंट लागु होते हुये भी, *राज्य सरकारों द्वारा कर्मचारी वर्ग की पेंशन बंद* करना, सरकारी कर्मचारी भरती बंद कराकर *"कान्ट्राक्ट लेबर / स्टॉप"* की नियुक्ती करना, *लेबर कानुनों में बदलाव* कराकर उद्योगपती वर्ग हित में कानुन बनाना, केंद्र सरकार - राज्य सरकार *"कर्मचारी वर्ग के पगार - पेंशन में तफावत"* होना आदी सवाल भी खडे हो गये है. क्या यह जजमेंट का आधार केंद्र सरकार - राज्य सरकार के *"पगार - पेंशन"* तफावत तथा *"कान्ट्राक्ट सिस्टम"* संदर्भ में, हम *"सायटेशन"* रुप में, प्रयोग में ला सकते हैं या नहीं ? यह एक प्रश्न है.
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▪️ *डॉ मिलिन्द जीवने 'शाक्य'*
नागपुर दिनांक २० दिसंबर २०२५
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