✍️ *मध्य प्रदेश के मागासवर्गीय आय.ए.एस. अधिकारी संतोष वर्मा इन्होने अपने लडके के लिये ब्राह्मण कन्या दान (?) का बयाण कहने पर मध्य प्रदेश का माहौल गरम !*
*डॉ मिलिन्द जीवने 'शाक्य',* नागपुर १७
राष्ट्रिय अध्यक्ष, सिव्हिल राईट्स प्रोटेक्शन सेल
एक्स व्हिजिटिंग प्रोफेसर, डॉ बाबासाहेब आंबेडकर सामाजिक विज्ञान विद्यापीठ महु मप्र
एक्स मेडिकल ऑफिसर एवं हाऊस सर्जन
बुध्द आंबेडकरी लेखक, कवि, समिक्षक, चिंतक
मो. न. ९३७०९८४१३८, ९२२५२२६९२२
भारत देश में ज्यादा तर बहुजन बडे नेता वर्ग / मुस्लिम नेता वर्ग के साथ, ब्राह्मण कन्या का विवाह हो चुका है. उन सभी नेता वर्ग के नाम भी बहुत सारे लोग जानते है. अर्थात यह विवाह *"वर्णसंकर"* का एक प्रकार है, जो कि *"ब्राह्मण धर्म ग्रंथ"* में वह वर्णीत भी है. हम सदर विषय में जाने के पहले, *मध्य प्रदेश के मागासवर्गीय* आय.ए.एस. अधिकारी *संतोष वर्मा* इन्होने तो *"अजाक्स"* (अनुसूचित जाति / अनु. जनजाति अधिकारी - कर्मचारी संगठण) के प्रांत अधिकारी बनते ही, *ब्राह्मण वर्ग* के प्रति मैत्री भावना (!) रखकर अपने बयाण में कहा कि, *"जब तक मेरे बेटे के लिये कोई ब्राह्मण बेटी दान ना कर दे या उससे संबंध ना बना दे, तब तक आरक्षण मिलना चाहिए."* और उन्होंने आगे भी कहा कि, "आर्थिक आधार की बात करे जब तक रोटी बेटी का व्यवहार नहीं होता, पिछडेपण के कारण आरक्षण की पात्रता बनी रहेगी." संतोष वर्मा के सदर बयाण पर, मध्य प्रदेश के *ब्राह्मण समाज* में भुचालसा मच गया. ब्राह्मण समाज बोला कि, संतोष वर्मा को केवल *नोटीस* देना नाकापी है. उन पर *फौजदारी केस* दायर होना चाहिए. वही एक भुतपुर्व मंत्री *गोपाल भार्गव* ने तो, संतोष वर्मा इन पर कारवाई की मांग की. मुख्यमंत्री / प्रधान सचिव से मिलने की बात कही. वर्मा पर चरित्रहिन का आरोप लगाया. समाज / सरकार के लिये शर्मिंदी करार दिया. राष्ट्र एकता के लिये खिलाफ बताया. वर्मा को मनोरोगी बताया. मध्य प्रदेश के *उपमुख्यमंत्री* भी चार दिनों बाद जाग उठे है. अत: *"ब्राह्मण धर्म ग्रंथ"* के अंदर जाने के पहले, *संतोष वर्मा* ने ऐसा क्या *गलत* कह दिया है ? यह भी प्रश्न है.
ब्राह्मण धर्म ग्रंथ के संदर्भ में जाने के पहले अलाहाबाद उच्च न्यायालय के *न्या. राम नारायण मिश्रा* इन्होने बलात्कारी आरोपी को *"दोषमुक्त"* करते हुये, अपने निर्णय में कहा कि, *"स्तन को स्पर्श करना, पायजामा का नाडा खोलना, पुल के निचे ले जाना, यह बलात्कार या बलात्कार का प्रयास नहीं है."* अत: यह अच्छा प्रयास (?) तो, उस न्यायाधीश के घर से ही, शुरु कर देना चाहिए. सदर निर्णय के विरोध में, समस्त भारत से आवाज उठने से / सर्वोच्च न्यायालय ने भी उसकी दखल लेने से ही, सदर निर्णय रद्दबाबत हुआ है. परंतु सदर निर्णय पर, म.प्र. *"ब्राह्मण वर्ग"* खामोश क्यौ था ? यह मध्य प्रदेश के वह ब्राह्मण वर्ग को पुछना चाहिए. अब *"मनुस्मृती"* ग्रंथ के प्रथम अध्याय का श्लोक संदर्भ ले - *"भगवन्सवर्णानां यथावदनुपूर्वश: | अनीर प्रभावाणां च धर्म्मान्नो वक्तुमर्हेसि ||* २|| (अर्थात - भगवान, हमारा आपसे अनुरोध है कि, आप हम चारो धर्मो - ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शुद्र द्वारा तथा वर्णसंकर वर्ण के पुरुष द्वारा, भिन्न वर्ण के स्त्री से उत्पन्न संतान यानी ब्राह्मण यदी शुद्र स्त्री को गर्भवती बनाता है तो, उस शुद्र स्त्री से उत्पन्न संतान वर्णसंकर कहलायेगी. क्यौं कि उसकी जाति में दो भिन्न जाति के लोगों का लहु मिश्रण है. अत: जाति के लोगों द्वारा आचरणीय धर्मो पर प्रकाश डालने की कृपा करे.) ब्राह्मण नायक *तुलसीदास* तो कहता है कि, *"ढोल गवार शुद्र पशु नारी, सब ताडन के अधिकारी |"* उनके दृष्टी से *"स्त्री वर्ग"* तो, ताडन का अधिकारी है. तो भई *संतोष वर्मा* इनके सदर बयाण पर, *"ब्राह्मण वर्ग"* को गरम होने का, कोई कारण नहीं है. क्यौं कि, *"तुलसी रामचरितमानस"* उनका धर्म ग्रंथ ही है. ब्राह्मण धर्म ग्रंथ *"मनुस्मृती"* भी, वर्णसंकर की अनुमती देती है.
हिंदु धर्म - ब्राह्मण व्यवस्था में *ब्रम्हा* को पुजनीय मानते है. ब्रम्हा ने *"अपनी पुत्री सरस्वती से संभोग"* कर्म करने का / और उसे *"पत्नी बनाने"* का जिक्र आता है. यह श्लोक है - *"मध्या यत्कर्त्वमभवदभीके कामं कृण्वाने पितरी युवत्याम् | मनानग्रेतो जहतुविर्यन्ता सानी निषिक्तं सुकृतस्य योनौ ||"* ६ || (अर्थात - जिस समय पिता (ब्रम्हा) ने अपनी युवती कन्या (सरस्वती) के साथ यथोच्छ कर्म किया, उस समय उनके संभोग कर्म से समिप ही, थोडा विर्य गिर गया. परस्पर अभिगमन करते हुये उन दोनो ने, वह विर्य यज्ञ के उच्च स्थान योनी में छोड दिया.) इस संदर्भ का पालन ब्राह्मण व्यवस्था में होता है या नहीं ? यह अलग विषय है. वही *"गायत्री मंत्र"* का भी संदर्भ महत्वपूर्ण है. क्यौ कि, ब्रम्हा की ये पाच पत्नीया थी. *"सरस्वती / सावित्री / गायत्री / मेघा / श्रध्दा."* अत: गायत्री मंत्र भी देखे - *"ॐ भूर्भुव: स्व: तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य घीम हि धियो योन: प्रचोदयात् ||"* (अर्थात - ॐ सर्व रक्षण परमात्मा, प्राणो से प्यारा, दु:ख विनाशक, सुस्वरुप उस उत्पादक, वरने योग्य, शुध्द स्वरुप देव को ध्यान करो. और अपनी योनी में शुभ कार्यो के लिये प्रेरीत करो.) और उस गायत्री मंत्र के अन्य भी संदर्भ अर्थ बताये जाते है. इस पर भी हम फिर कभी चर्चा करेंगे. अब हम हिंदु - ब्राह्मण धर्म में *"कन्यादान"* का संदर्भ भी समझेंगे. और कन्यादान का उल्लेख *"मनुस्मृती / पुराण (शिवपुराण / ब्रम्हवैवर्त पुराण)"* तथा महाकाव्य - *"रामचरित मानस"* में वर्णीत है. *"कन्यादान"* यह हिंदु - ब्राह्मण धर्म की एक प्रमुख रस्म है. वैसे देखे तो, *"हिंदु यह कोई धर्म नहीं है"* यह संदर्भ सर्वोच्च न्यायालय ने भी माना है. १४ जनवरी १९६६ में तत्कालीन सरन्यायाधीश *पी बी गजेंद्रगडकर* इनकी मुख्य अध्यक्षतेखाली तीन न्यायाधीशों की खंडपीठ के *न्या. के एन वाच्छु / न्या. पी सत्यनारायण सजु"* इन्होने अपने निर्णय में कहा कि, *"हिंदु यह कोई धर्म नहीं है. हिंदु / हिंदुत्व संकल्पना यह सुसंगत नहीं है. हिंदुत्व यह जीवन जीने का एक मार्ग है."* वही ब्राह्मण यह भारत के मुलनिवासी नहीं है. वे *"विदेशी नागरिक"* है. यह उनके ही कई मान्यवरों के ग्रंथ का आधार है. उनका *"डी.एन.ए. - R1A1"* इस पर भी हम, फिर कभी चर्चा करेंगे.
वाल्मिकी *"रामायण"* (अयोध्या कांड ||३४||) में तथागत *बुद्ध* को चोर कहा गया है. हम ने तो फिर वह मुद्दा उछालकर, *"रामायण"* ग्रंथ पर पाबंदी लानी चाहिये. वह श्लोक है - *"यथा हि चोर: तथा हि बुध्दस्तथागता नास्तिकमत्र विध्दी | तस्माध्दिय: शक्यतम प्रजानां से नास्तिके नाभिमुखे बुध:स्यात् ||"* (अर्थात - जैसे चोर दंडनिय है, उसी प्रकार (वेद विरोधी) बुध्द भी दंडनीय है. तथागत और नास्तिक (चार्वाक) को भी, उस कोटी का समजना चाहिये. इसलिए प्रजा पर अनुग्रह करने के लिये, राजा द्वारा जिस नास्तिक को दंड दिलाया जा सके, उसे तो चोर के समान ही दंड दिलाया जाए. परंतु जो वश के बाहर हो, उस नास्तिक के प्रति विद्वान ब्राह्मण ने, कभी उन्मुख ना हो, उससे वार्तालाप ना करे.) हिंदु ब्राह्मण धर्म ग्रंथ में और ऐसे अनगिणत संदर्भ है. परंतु शब्द मर्यादा के कारण उस पर चर्चा को, हम बंद करने के पहले, आय. ए. एस. अधिकारी *संतोष वर्मा* को भी कहेंगे कि, इस प्रकार कि विवादीत बयान करने से बचे. हमारा उद्देश तो, हमारे समाज को *"नयी भारत दिशा"* को ओर, हमें ले जाना है. कभी कभी *"हमारे अपने भी तो धोका कर"* जाते है. तो फिर अन्य वर्ग के स्वयं को उच्च समझनेवालो से, *"हम क्या अपेक्षा करे ?"* हमे वह संघर्ष तो, हमारे *"अपने लोगों से भी करना होता है."* फिर भी हमारा एक ही लक्ष हो - *"हमारा अस्तित्व ! हमारा विकास !! हमारी समृद्धी !!! हमारा देश !!!! हम सभी एक है !!!!!"* बाबासाहेब डॉ आंबेडकर इनका व्हिजन भी तो यही था.
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▪️ *डॉ मिलिन्द जीवने 'शाक्य'*
नागपुर दिनांक २९ नवंबर २०२५
(*दि बुध्दीस्ट टाईम्स* पत्रिका भोपाल म.प्र. के संपादक *विजय बौध्द* इनके अनुरोध पर)
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