🎓 *सरन्यायाधीश भुषण गवई अध्यक्षता की पांच जज खंडपीठ द्वारा भारतीय संविधान पर असंविधानिक बलात्कार ???*(राष्ट्रपति - राज्यपाल अधिन विधेयक कालमर्यादा प्रकरण)
*डॉ मिलिन्द जीवने 'शाक्य',* नागपुर १७
राष्ट्रिय अध्यक्ष, सिव्हिल राईट्स प्रोटेक्शन सेल
एक्स व्हिजिटिंग प्रोफेसर, डॉ बाबासाहेब आंबेडकर सामाजिक विज्ञान विद्यापीठ महु मप्र
आंतरराष्ट्रीय परिषद के संशोधन पेपर परिक्षक
एक्स मेडिकल ऑफिसर एवं हाऊस सर्जन
बुध्द आंबेडकरी लेखक, कवि, समिक्षक, चिंतक
मो. न. ९३७०९८४१३८, ९२२५२२६९२३
दिनांक २० नवंबर २०२५. मा. सर्वोच्च न्यायालय के सरन्यायाधीश *भुषण गवई* इनकी अध्यक्षतावाली *"पांच न्यायाधीश खंडपीठ"* में - *न्या. सुर्यकांत / न्या. विक्रम नाथ / न्या. पी एस नरसिंह / न्या. अतुल चांदूरकर* द्वारा भारत के महामहीम *"राष्ट्रपती तथा राज्यपाल अधिन विधेयक कालमर्यादा"* निर्णय एकमत से लेकरं, इसके पहले *"दो न्यायाधीश"* खंडपीठ के विद्वत *न्या. जे बी पारदीवाला / न्या. आर महादेवन* इन्होने *"संविधान के अनुच्छेद ३४० - ३४१"* संबंधित ८ अगस्त २०२५ को *"उचित दिये"* गये, *"पहले निर्णय को बदल"* (समय सीमा को तय करना) डाला. सर्वोच्च न्यायालय के सरन्यायाधीश *भुषण गवई* इनकी अध्यक्षता वाली *"पाच न्यायाधीशों"* की पीठ ने, सदर *"दो बेंच वाली पीठ"* की वह याचिका निर्णय को *"रिव्हीजन पिटिशन"* स्वरुप पिटिशन के रूप में, *"स्वीकृत ना करने"* का सही कारण क्या था ? भारत के महामहीम राष्ट्रपती *द्रोपदी मुर्मु* द्वारा संविधान *"अनुच्छेद १४३(१)"* अन्वये पुछे गये *"१४ सवाल पर"* निर्णय देते समय जो *"पाच न्यायाधीशों की पीठ"* का गठण किया गया था, उस खंडपीठ में इसके पहले निर्णय देने वाले दो न्यायाधीश - *न्या. जे बी पारदीवाला / न्या. आर महादेवन* इनको *"पांच न्यायाधीश पीठ"* सहभाग से, क्यौं वंचित किया गया ? या राष्ट्रपती द्वारा पुछे गये *"१४ प्रश्नावली"* को उन *"दो बेंच वाली खंडपीठ"* को, क्यौं नहीं सोपा गया था ? या महामहीम राष्ट्रपती के *"संविधान अनुच्छेद १४३(१)"* अंतर्गत पुछे गये *"१४ सवालों"* के उत्तर ना भेज कर, *"पांच न्यायाधीश खंडपीठ"* गठण का राज क्या था ? अत: इन सभी प्रश्नों में, *"पांच न्यायाधीश खंडपीठ का २० नवंबर २०२५ का निर्णय"* का बहुत बडा राज छुपाया दिखता है. अत: भारत के प्रधानमंत्री *नरेंद्र दा. मोदी* सरकार को, खुश करने की वह *"कुटील राजनीति"* रही थी ? दुसरे भाषा में सरन्यायाधीश *भुषण गवई* भी दुसरे मार्ग से, इसके पहले के सरन्यायाधीश *धनंजय चंद्रचूड* की राह पर गये है क्या ? यह भी प्रश्न उठ खडा होता है. अत: *"दो न्यायाधीश खंडपीठ का निर्णय"* यह सर्वथा उचित होने पर भी, उसे पलटने के कारण *"पांच न्यायाधीश खंडपीठ"* का २० नवंबर २०२५ का निर्णय, *"भारतीय संविधान पर असंविधानिक बलात्कार"* (???) समान दिखाई देता है...!!! अत: इस निर्णय पर आगे *"नवं बेंच खंडपीठ / ग्यारह बेंच खंडपीठ / तेरह बेंच खंडपीठ"* के सामने सविधानीक व्याख्या होने के कारण, *"रिव्हीजन याचिका"* डाले या, *"क्युरेटिव्ह याचिका"* डाले, यह संविधानिक विषय है.
*"राष्ट्रपती - राज्यपाल अधिन विधेयक कालमर्यादा निर्णय"* देने वाले दो न्यायाधीश *न्या. जे बी पारदीवाला / न्या. आर महादेवन* इनके उचित निर्णय की समिक्षा करने के पहले, *"केशवानंद भारती विरुध्द केरल सरकार"* इस केस के २४ अप्रेल १९७३ के दिये गये *"तेरा न्यायाधीश खंडपीठ"* के फैसले को समझना भी बहुत जरुरी है. सदर तेरा न्यायाधीश खंडपीठ में सरन्यायाधीश *एम. एस. सिकरी* इनकी अध्यक्षतावाली पुर्ण खंडपीठ में थे. - *न्या. जे एम शेलत / न्या. के एस हेगडे / न्या. ए एम ग्रोवर / न्या. ए एन रे / न्या. पी जगमोहन रेड्डी / न्या. डी जी पालेकर* यह सात न्यायाधीश *"एक साईड"* में तथा *न्या. एच आर खन्ना / न्या. के के मैथ्यु / न्या. एम एच बेग / न्या. एस एन द्विवेदी / न्या. बी के मुखर्जी / न्या. यशवंत चंद्रचूड* (न्या. धनंजय चंद्रचूड के पिता) यह *"छह न्यायाधीश विरोध"* मे रहे थे. और ७:६ बहुमत से सर्वोच्च न्यायालय ने, *"भारतीय संविधान की गरीमा बचायी थी."* और फैसले में कहा कि, *"भारतीय संसद यह भारतीय संविधान में संशोधन कर सकती है. परंतु संविधान के मुल संरचना (Basic Structure) में बदलाव नहीं कर सकती."* आज वह निर्णय बहुत याद आ रहा है. क्यौ कि, *"भारत के राष्ट्रपती - चार पाच राज्यों के राज्यपाल के पास तहतीस (३३) से ज्यादा बील कितने सारे दिनों से प्रलंबीत है."* जिसमे पश्चिम बंगाल / कर्नाटक / तेलंगणा / केरल /पंजाब इन बगैर भाजपा राज्यों का ही समावेश है. अगर विधानसभा / विधान परिषद में बील या विधेयक पारित होता हो, और राज्यपाल सालों तक उस पर निर्णय ना रे तो, *"भारत के लोकतंत्र"* (Democracy) का क्या होगा ? यह हम कल्पना कर सकते हैं. क्यौ की सर्वोच्च न्यायालय के सरन्यायाधीश *भुषण गवई* इनकी अध्यक्षता वाली *"पांच न्यायाधीश खंडपीठ"* ने, *"दो बेंच वाली खंडपीठ"* का सही फैसला बदल दिया है. रद्द कर दिया हैं. यह भारतीय संविधान पर *"बलात्कार"* (?) नहीं तो, और क्या कहे ? बस, *"पांच न्यायाधीशों के खंडपीठ"* ने केवल अल्पशी राहत दी है, *"अगर किसी विधेयक को अनिश्चित समय तक लंबीत रखा जाता है तो, यह कोर्ट के सीमीत दखल और अपवाद का आधार बन सकता है."* अर्थात दोबारा और फिर जाओ - *"कोर्ट के दरबार में !"*
अब हम *"दो न्यायाधीश खंडपीठ"* द्वारा ८ अगस्त २०२५ के फैसले पर चर्चा करते है. *"दो न्यायाधीश खंडपीठ"* ने उनके निर्णय में कहा कि, भारतीय संविधान के *"अनुच्छेद २०० में As soon as possible"* (जल्द से जल्द) यह जिक्र है. अर्थात राज्यपाल से त्वरीत कारवाई की अपेक्षा करता है. आगे खंडपीठ कहता है, *"जहां समय सीमा निर्धारीत नहीं होती,"* वहां शक्ती का उपयोग उचित समय में किया जाना चाहिए. यदी प्रक्रिया में त्वरित कार्यवाही की मांग करता है तो, तो कोई *"समय सीमा निर्धारीत"* कर सकती है. और खंडपीठ कहती है, समय सीमा निर्धारीत करना *"संविधान में संशोधन करना नहीं है."* बल्की वह अनुच्छेद २०० की अंतर्निहीत प्रकृती के अनुरुप *"न्यायिक मानकों"* का तय करना है. ता कि, *"मनमानी / अनुचित विलंब को रोका"* जा सके. तथा अनुच्छेद २०० के महत्व को देखते हुये *"समय सीमा निर्धारीत की जाती"* है. राज्यपाल के लिये *"एक माह के भीतर विधेयक पर निर्णय"* ले. तथा राष्ट्रपती के लिये *"तिन माह के भीतर निर्णय "* ले. दो न्यायाधीश खंडपीठ *न्या. जे बी पारदीवाला / न्या. आर महादेवन* इन्होने कौनसा भारतीय संविधान का *"उल्लंघन"* किया है ? भारतीय *"सत्ता व्यवस्था को गती"* देने का काम किया है. अत: सरन्यायाधीश *भुषण गवई* इनके उस अध्यक्षता वाली *पाच न्यायाधीशों"* की खंडपीठ ने, *"वह फैसला रद्द"* कर, भारतीय संविधान पर *"बलात्कार"* (?) ही किया है नां ! हमारे भारतीय *"लोकतंत्र की हत्या"* दिखाई देती है.
सर्वोच्च न्यायालय के सरन्यायाधीश *धनंजय चंद्रचूड* इनकी अध्यक्षतावाली *"सात न्यायाधीशों की खंडपीठ"* द्वारा उनके *"पंजाब सरकार विरुध्द दविंदर सिंह "* इस केस के निर्णय १ अगस्त २०२४ में, अनुसूचित जाती वर्ग को *"उपवर्गिकरण / क्रिमीलेयर"* में बांट दिया. सात न्यायाधीशों में *न्या. भुषण गवई / न्या. विक्रम नाथ / न्या. बेला त्रिवेदी / न्या. मनोज मिश्रा / न्या. पंकज मिश्रा / न्या. एस सी वर्मा* इन्होने ६ विरुद्ध १ बहुमत से वह फैसला सुनाकर, *"इ. व्ही. चिनैय्या विरुध्द आंध्र सरकार"* फैसले को *"पलट"* दिया. आधार लिया गया था *"इंदिरा सहानी विरुध्द भारत सरकार"* इस केस के *"नवं बेंच खंडपीठ "* द्वारा, जहां ओबीसी वर्ग पर *"क्रिमीलेयर"* का निर्णय ६ विरुध्द ३ बहुमत से लागु किया गया था. साथ ही *"आरक्षण सीमा ५०% अधिक ना हो"* यह भी कहा गया. अगर *"आरक्षण सीमा ५०% अधिक ना"* हो तो, *"आर्थिक रुप से कमजोर वर्ग"* (EWS) केस में, सर्वोच्च न्यायालय द्वारा सरन्यायाधीश *यु यु ललीत* अध्यक्षता वाली पाच बेंच में, *न्या. दिनेश माहेश्वरी /न्या. एस रविंद्र भट / न्या. बेला त्रिवेदी / न्या. जे बी पारदीवाला* इन्होने ५ विरुध्द १ बहुमत से *"१०% आर्थिक आरक्षण"* किस आधार पर, वह मान्य किया ? भारतीय संविधान में केवल *"सामाजिक आधार"* आरक्षण है, ना कि *"आर्थिक आधार"* पर आरक्षण व्यवस्था ! यहां तो भारतीय संविधान को, सर्वोच्च न्यायालय द्वारा पुर्णतः *"बायपास"* किया जा रहा है. जब कि *इ व्ही चिनैय्या केस* में, सर्वोच्च न्यायालय के *"पांच न्यायाधीशों"* के खंडपीठ ने, सरन्यायाधीश *संतोष हेगडे* इनकी अध्यक्षतावाली पीठ में *न्या. एस एन वारीयन / न्या. बी पी सिंह / न्या. एम के सेमा / न्या. एस बी सिंह"* इन्होने ५ नवंबर २००४ को ४ विरुध्द १ बहुमत से, *"उचित फैसला"* को देते हुये कहा कि, *"अनुसूचित जाती / जनजाती एक वर्ग समुह है. उनका वर्गिकरण ये नहीं किया जा सकता."* इसके साथ *"अस्पृश्य या अनुसुचित जाती"* यह अलग वर्ग है, इसकाळ संदर्भ अंग्रेजी काल में, सन १९१६ में आया था, जब हिंदु धर्म ब्राह्मण व्यवस्था ने, *"अस्पृश्य को हिंदु मानने से मना"* किया था. तब अंग्रजो ने *"जाती (Caste) / जनजाती (Tribe) की दो अलग अलग अनुभुती"* (Schedule) बनायी. जिसे अब हम *"अनुसूचित जाती / जनजाती"* नाम से जानते है. सन १९३१ का *"जनगणना"* (Census) आधार भी वही था.
भारतीय समाज में *"वेश्या"* (Prost) यह दो प्रकार की होती है. एक होती है *" गरीब वेश्या"* और दुसरी *"पॉश वेश्या."* गरीब वेश्या यह बदनाम हो जाती है. परंतु *"पॉश वेश्या"* यह बदनाम नहीं होती. उसका तो *"हाय प्रोफाईल"* जगह / सोसायटी पर बैठना उठना सोना होता है. वैसे ही *"भिकारी"* (Beggar) भी दो प्रकार के होते. एक है - *"गरीब भिकारी"* और दुसरा *"पॉश भिकरी."* पॉश भिकारी ये *"सत्ता पद पाने की भिक"* मांगता है. *"गरिबी वेश्या"* हो या *"गरिबी भिकारी"* हो, वो अपने पेशवे से बहुत *"वफादार / इमानदार"* होता है. यह *"पॉश वेश्या / पॉश भिकारी"* बिलकुल ही *"वफादार / इमानदार"* नहीं होता. वह पॉश वेश्या / भिकारी तो *"समाज / देश आदी से गद्दारी"* भी कर जाता है. वह ना-लायक (Not Qualified) श्रेणी का होता है. रिटायरमेंट के बाद किसी *"आयोग"* पर / *"संसद सदस्य"* रूप में / *"राज्यपाल"* आदी बनने की चाहत रखता है. उन्हे *"वेश्या"* कहे या *"भिकारी"* कहे, कोई फर्क नहीं पडता. वे लोग *"बे-शरम"* चारित्र्य के बन जाते है. यह *"न्याय व्यवस्था"* में *"दिल्ली उच्च न्यायालय"* के न्यायाधीश *न्या. यशवंत वर्मा* इनके घर *"पचास करोड"* (?) करंसी मिलने पर भी, कारवाई क्या ? उसकी बदली *"अलाहाबाद उच्च न्यायालय"* कर दी जाती है. *"लखनौ उच्च न्यायालय"* का न्यायाधीश हिंदु धर्मपीठ पर, *"धर्मांध भाषण"* कर जाता है. कारवाई क्या ? *"अलाहाबाद उच्च न्यायालय"* एक न्यायाधीश *राम नारायण मिश्रा* अपने निर्णय में, *"स्त्री को स्तन को छुना / पायजामा का नाडा खोलना / पुल के निचे ले जाना, यह बलात्कार वा बलात्कार का प्रयास नहीं है."* और आरोपी को छोडने का निर्णय देता है. ऐसे न्यायाधीशों के परिवार से *"वह शुरुवात"* हो तो, बहुत अच्छा होगा. *"राजस्थान उच्च न्यायालय"* के सामने *मनु का पुतला* बिठाया गया है, उसे उठाया नहीं गया. न्यायाधीश पर कारवाई क्या ? सर्वोच्च न्यायालय के सरन्यायाधीश *रंजन गोगोई* इन पर, एक *"स्त्री शोषण"* प्रकरण चला. केस से भरी हो गये. *"रामजन्मभूमी प्रकरण"* पर सहमती निर्णय दिया. *रंजन गोगोई* महाराज तो *"राज्यसभा"* चले गये है. वह न्यायाधीश यादी बहुत लंबी है. वही *अनुसूचित जाती* के मद्रास उच्च न्यायालय के न्यायाधीश *सी. एस. कर्णन* इन्होने न्याय व्यवस्था में *"बीस (२०) न्यायाधीश भ्रष्टाचारी"* होने की शिकायत प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को की थी. प्रधानमंत्री ने वह शिकायत को *"सर्वोच्च न्यायालय को भेज"* दिया. सर्वोच्च न्यायालय ने दोषी न्यायाधीशों पर कारवाई करने के बदले, *न्या. कर्णन* को ही *"कारण बताओ नोटीस"* जारी किया. और न्या. कर्णन की बदली *"कलकत्ता उच्च न्यायालय"* कर दी गयी. आगे जाकर सर्वोच्च न्यायालय के सरन्यायाधीश *जे एस केहर* अध्यक्षता वाली *"नवं न्यायाधीश"* खंडपीठ में *न्या. दिपक मिश्रा / न्या. जे चेलमेश्वर / न्या. रंजन गोगोई / न्या. मदान / न्या. बी लोकुर / न्या. पिनाकी चंद्रा घोष / न्या. कुरीयन जोसेफ / न्या. भानुमती* इन्होने एकमत से, मागासवर्गीय *न्या. कर्णन* इनको *"अवमानना"* का दोषी मानते हुये, *"छह माह की कारावास"* सजा सुनाई. और *न्या. कर्णन* द्वारा वह सजा काटी गयी. सर्वोच्च न्यायालय *"बहुमत / एकमत"* का निर्णय है, भई ! हम इस घटना का क्या कहे ? बस, *"हमाम में सब नंगे होते है."* यह सिख है.
हमारी *"न्याय व्यवस्था"* का वो पुराना इतिहास को देखने पर, *"अंग्रेज काल के सन १९१९"* साल की याद आती है. उन्होंने *"न्याय व्यवस्था"* में *"ब्राह्मण न्यायाधीश"* बनने पर बॅन लाया था. आज *"सर्वोच्च न्यायालय "* यह सर्वोच्च नहीं *"सवर्ण न्यायालय"* दिखाई देती है. हमारे कुछ न्यायाधीश वर्ग का निर्णय देखकर, *"न्यायालय की तोहिम"* महसुस होती है. अत: हमें *"मेरीट धारक न्यायाधीश"* वर्ग की जरुरत है. हमारी विद्यमान *"कोलोजीयम सिस्टम"* वह न्याय करते हुये, हमे दिखाई नहीं देती. ना ही *"भाजपा - नरेंद्र मोदी सरकार"* द्वारा संसद में पारीत हुये, संविधान *अनुच्छेद १२४ (१)* - National Judicial Appointments Commission *(NJAC)* चाहिए (?) वह सिस्टीम तो न्याय व्यवस्था में, *"सत्ताधारी वर्ग हस्तक्षेप"* प्रभाव की होने की बडी संभावना है. भारत के कांग्रेसी पितामह *मोहनदास गांधी* तथा प्राचिन भारत इतिहास विचारविध *भर्तृहरी* इन्होने, *"भारतीय राजनीति को वेश्यालय"* की उपमा दी थी. अत: केंद्रीय लोकसेवा आयोग *(UPSC)* पैटर्न पर, *"न्यायाधीशों की स्पर्धा परीक्षा"* होनी चाहीये. जो *"Union Judiciary Service Commission"*(UJSC) इसके अधिन ही वह आयोजित हो. हमारी *"सर्वोच्च न्यायालय"* यह हमारे *"भारतीय संविधान की कस्टोडियन"* (Custodian) है. वह *"वॉच डॉग"* ही है. भारतीय संविधान की कस्टोडियन ना ही *"संसद"* है, ना ही *"राष्ट्रपती"* है, ना ही *"प्रधानमंत्री"* बने है. अत: सर्वोच्च न्यायालय का दायित्व है कि, वह *"भारतीय संविधान के अधिन"* निर्णय करे. संविधान का *"बायपास"* ना करे. तभी हम *"भारतीय न्यायव्यवस्था"* को मजबुत कर सकते हैं. *"स्वस्थ भारत - समृद्ध भारत - विकास भारत"* बना सकते हैं.
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▪️ *डॉ मिलिन्द जीवने 'शाक्य'*
नागपुर दिनांक २२नवंबर २०२५
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