👌*हिंदु यह धर्म नही यह सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय / वही अनुसुचित जाति समुह के धर्मांतरण पर बंधन / मा. सर्वोच्च न्यायालय २४ मार्च २०२६ निर्णय संविधानिक मुलभुत अधिकारों का हनन है !*
*डॉ. मिलिन्द जीवने 'शाक्य',* नागपुर १७
राष्ट्रिय अध्यक्ष, सिव्हिल राईट्स प्रोटेक्शन सेल
एक्स व्हिजिटीग प्रोफेसर, डॉ बी आर आंबेडकर सामाजिक विज्ञान विद्यापीठ, महु मप्र
बुध्द आंबेडकरी लेखक, कवि, चिंतक, समिक्षक
आंतरराष्ट्रिय परिषदों के संशोधन पेपर परिक्षक
मो. न. ९३७०९८४१३८, ९८९०५८६८२२
कभी कभी सर्वोच्च / उच्च न्यायालय के कुछ निर्णय देखकर मुझे लगता है कि, न्यायालय मे न्यायाधिश नही, *"बिन-अकल गधे"* बैठे है. अगर न्यायालय मे *"कोलोजियम सिस्टम"* ना होती तो, क्या वे न्यायाधीश महोदय *"चपराशी वर्ग की स्पर्धा परिक्षा"* पास हुये होते या नही? यह सशोधन का विषय है. यही संदर्भ लेकर मैने *"केंद्रिय लोक सेवा आयोग"* समान ही, न्यायाधीश नियुक्ति के लिए *"केँद्रिय न्यायिक सेवा आयोग"* (Union Judiciary Public Commission) होने की हमने शासन सें मांग की थी. नरेँद्र मोदी सरकार द्वारा गठीत संविधान अनुच्छेद 124 (A) *"National Judiciary Appintment Commission"* यह बिलकुल ही अमल ना हो. यह पँटर्न पुर्णत: न्यायव्यवस्था पर सत्ता अंकुश करने का एक माध्यम है. *"राम जन्मभुमी बाबरी प्रकरण निर्णय"* पर, तत्कालिन प्रधान न्यायाधीश *रंजन गोगाई* अध्यक्षतावाली खंडपीठ के *न्या. शरद बोबडे / न्या. अशोक भुषण / न्या. धनंजय चंद्रचुड / न्या. एस अब्दुल सत्तार* इनको तो *"किसी गधेखाना"* में भेजना चाहिये था या किसी मँदिर का *"पुजारी"* (पंडा) बनाना चाहिये था. उस निर्णय मे *"प्रायमा फेसी"* कहां है? केवल *"भावना के आधार"* पर निर्णय दिखाई देता है. आगे सरन्यायाधिश बने *शरद बोबडे* इनको सरन्यायाधीश प्रोटोकाल तक पता नही था. वह महाशय मंदिर जाने के बाद, दर्शन के नाम पुरी तरह लेट गया था. दुसरा सरन्यायधीश बना *धनंजय चंद्रचुड* इनके पास बुध्दी का अभाव था. वो महाशय को तो भगवान ने ही निर्णय लिखने की बुध्दी दी थी. क्या करे *"घुटनागिरी व्याधी"* से वे ग्रसित थे. इसे माँ का *"गर्भ दोष"* कहे ? यह प्रश्न है. *"राष्ट्रपति /सरन्यायाधीश"* आदि पद पर रहने के बाद, अपनी पद की गरिमा बनाना होता है. अभी अभी *"२४ मार्च २०२६"* के सर्वोच्च न्यायालय निर्णय ने तो, अनुसूचित जाति समुह कें *"धर्म - धर्माँतर संविधान मुलभुत अधिकार"* (अनुच्छेद १४, १९, २५ आदि) का पुर्णत: वह हनन दिखाई देता है. अब हम उस विषय अंतराल जाने के बाद *"हिंदु यह धर्म नही"* इस न्यायालय निर्णय पर भी चर्चा करेंगे.
सर्वोच्च न्यायालय के *न्या. प्रशांतकुमार मिश्रा / न्या. एन. व्ही. अंजारिया* इनके खंडपीठ ने *"अनुसुचित जाति धर्मांतर"* पर बंधन लादते हुये निर्णय दिया है कि, *"हिंदु / शिख / बौध्द इन धर्म व्यतिरिक्त अन्य धर्म का स्वीकार करनेवाले व्यक्ति को, अनुसुचित जाति का सदस्य नही माना जाएगा. उस धर्मांतरीत व्यक्ति को अनुसुचित जाति प्रतिबंधित (Atrocity) कानुन आदि का सरंक्षण नही मिलेगा. "* यह निर्णय इतना भी सरल नही है, जितना कुछ लोग समझ रहे है. यहां संबंध भारत की *"जाति व्यवस्था पध्दती"* इस सामाजिक आशय से भी जुडा हुआ है. *"जाति"* यह मरने पर भी जाती नही, वह *"जाति"* है. बाबासाहेब डॉ आंबेडकर इन्होने तो *"जाति यह बंद वर्ग है"* (Caste is a closed Class) यह जाति का नविन संज्ञा अविष्कार किया था. सर्वोच्च न्यायालय के इस निर्णय के पिछे *"मुस्लिम इसाई धर्म द्वेष"* दिखाई देता है. और यह प्रकरण भी *"चिंथाडा आनंद विरुध्द आंध्र प्रदेश सरकार"* से जुडा है. *"आंध्र प्रदेश उच्च न्यायालय"* ने शिकायत कर्ता - *ख्रिश्चन धर्मांतरीत पादरी* के विरोध में निर्णय दिया. और सर्वोच्च न्यायालय ने वह निर्णय सही माना है. अत: शिकायत कर्ता के पास सर्वोच्च न्यायालय अपिल के, और भी *"दो आँप्शन"* बचे हुये है. *"Review Petition / Curative Petition."* वह उसका उपयोग करता है या नही? यह अलग विषय है. उस *धर्मांतरीत ख्रिस्ती पादरी* को मारपीट की गयी थी. और *आरोपी* ने धर्मांतरण के नाम पर, उस पाद्री के *"अनुसुचित जाति प्रतिबंधित कानुन"* संरक्षण को, न्यायालय में चुनौति देकर जीत भी हासिल की. यहां प्रश्न यह है कि, *"क्या कोई धर्म परिवर्तन करने से, भारतीय जाति व्यवस्था अंतर्गत, व्यक्ति की जाति खत्म हो जाती है या नहीं?"* अगर जाति पिढी दर पिढी चिपकी रहती हो तो, उस व्यक्ति को *"अनुसुचित जाति प्रतिबंधित कानुन"** का वा *"अन्य संविधानीक लाभ"* भी, क्यौ ना मिले? यह अहं प्रश्न है.
न्यायालय की दिरंगाई एवं वहाँ के निर्णय पर कहावत है. *"Justice should not be done but appeared to be done. "* दुसरा संदर्भ है - *"Justice should be Independence!"* और तिसरा संदर्भ तो और बहुत ही महत्वपुर्ण है. *"Justice delayed is Justice denied."* यह कुछ संदर्भ हमें न्यायालय कसौटे पर खरे उतरते है क्या? यह प्रश्न है. *इंदिरा सहानी विरुद्ध भारत सरकार* (सिव्हिल याचिका न. ९३०/१९९०) इस केस में, सरन्यायाधीश *एम. एच. केनिया* अध्यक्षतावाली ९ न्यायाधीश खंडपीठ में *एम व्यंकटचलैय्या / ए. एम. अहमदी / कुलदीप सिंग / पी.बी. सावंत / आर. एम. सहानी / बी. पी. जीवन रेड्डी / डॉ. टी के थाँमेन / एस. आर. पांडियन* द्वारा १० मार्च १९९२ को *"मागासवर्ग आरक्षण"* को ६:३ बहुमतो सें उसे वैध तो माना, परंतु *"आरक्षण की सीमा यह ५०% से अधिक भी ना हो,"* यह अलग से बंधन भी लगाया है. यही नही *"ओबीसी समुह"* के लिए *"क्रिमिलेयर को आरक्षण सीमा से बाहर"* रखने की व्यवस्था भी की गयी. यही नही *"पदोन्नति में आरक्षण"* को खारीज किया गया. इसे कहते है *"ब्राम्हण्य की कुटनीति."* आदमी को जिंदा भी तो रखो, और अंदर से आदमी को धिरे धिरे घिमा जहर भी खिलावो. इस *"ब्राम्हण्यवाद"* ने *"देवत्व"* के नाम पर, बहुजनोँ को *"मानसिकता के गुलामी"* का आवरण भी चढाया है. भारतीय समाज तो *"जिंदा लाश"* है, वो क्या आवाज उठायेगी?
*"इ. व्ही चिन्नैय्या केस"* में सर्वोच्च न्यायालय सरन्यायाधीश *व्ही. एन. खरे* इनके अध्यक्षतावाली पाच न्यायाधीशों की खंडपीठ - *एस. बी. सिन्हा / अरिजित पसायत / ए. आर. लक्ष्मण / डी. एम. धर्माधिकारी* द्वारा सन २००४ में, *"अनुसुचित जाति / जनजाति उपवर्गिकरण (Sub Classification) नही किया जा सकता"* यह निर्णय दिया था. उसे भारतीय संविधान के *"अनुच्छेद ३४१"* अंतर्गत उल्लंघन ही माना. परंतु वह निर्णय १ अगस्त २०२४ को, सर्वोच्च न्यायालय सरन्यायाधीश *धनंजय चंद्रचुड* इनके अध्यक्षतावाली सात न्यायाधीशों के एक खंडपीठ - *भुषण गवई / विक्रमनाथ / पंकज मित्तल / मनोज मिश्रा / एस. सी. शर्मा / बेला त्रिवेदी* द्वारा ६:१ बहुमतों से पलट दिया है. उन्होने *"Sub Classification within the Reserved Scheduled Caste"* यह अलग निर्णय दिया है. न्या. बेला त्रिवेदी उन ष: न्यायाधीशों के विचारों से सहमत नही थी. *"अनुसुचित जाति उपवर्गिकरण"* का आधार क्या है ? *"अनुसुचित जाति / जनजाति वर्ग"* यह संकल्पना सन १९११ से कैसे आयी ? वह वर्ग *"हिंदु"* ना होने से वह *"अनुसुची"* (Schedule) कैसे बनी? इस पर फिर कभी चर्चा करेंगे. मुझे परेशानी तो *न्या. भुषण गवई* इनकी *"अकल घास खाने जाने"* की रही है. दुसरी परेशानी तो उनके सर्वोच्च न्यायालय सरन्यायाधीश *भुषण गवई* बनने के बाद, उसने अपने कार्यकाल में फास्ट ट्रक्ट *"महाबोधी बोधी टेंपल"* केस पर सुनवाई ना कर, उसका निर्णय ना देने की रही है. यहां सबसे बडा दोष सरन्यायाधीश *भुषण गवई* इनके माथे पर चढा है. सन २०२६ में *रमाशंकर प्रजापति / यमुना प्रसाद* इन दो महावीरों (?) ने, सर्वोच्च न्यायालय में, *"अनुसुचित जाति / जनजाति वर्ग समुह के लिए क्रिमीलेयर लागु हो"* यह याचिका दायर की है. अर्थात *"इंकम आधार पर आरक्षण"* व्यवस्था लागु करने की बात कही है. और वह याचिका न्यायाधीश द्वय *सुर्यकांत / जयमाला बागची* इनके खंडपीठ के सामने लगने के बाद, उस खंडपीठ ने वह याचिका *"खारीज ना कर"* केंद्र सरकार को नोटीस जारी किया हुआ है. हम *"विपश्यना - फालुन दाफा विवाद / राजकिय पार्टी भेद राजनीति"* में उलझे हुये है. तो दुसरों की चिंता करने में व्यस्त है. *"सरकारीकरण का खाजगीकरण / सरकारी नोकरी खत्म / नोकरी में अ-सुरक्षा / नोकरी में ठेकेदारी पध्दति / पुराने कामगार हित कानुन खत्म कर पुंजीवाद पुरक कानुन का निर्माण / नागरिकता कानुन का भुत"* ऐसे बहुत ही सारे हमारे प्रश्न शिर पर है. अत: अगला कदम (?) *"पुरानी पेशवाई गुलामी"* अब दस्तक दे रही है. और हम केवल मस्त सोये हुये है. हम केवल *"मोफत / स्वस्त अनाज"* पर ही खुश है. अत: हम *"मानसिक आलस्य के शिकार"* है, इसकी चिंता किस को है ? कहां गयी सर्वोच्च न्यायालय की *"संविधान वाँच डाँगीता"* भी ???
*"हिंदु* यह धर्म है या नहीं ? इस खास विवादपुर्ण प्रश्न का उत्तर, मा. सर्वोच्च न्यायालय के इन *"दो सायटेशन"* में ही निहित है. *"AIR 1966 SC 1127 & 1966 SCR (3) 242."* सर्वोच्च न्यायालय के सरन्यायाधीश *पी. बी. गजेंद्रगडकर* इनकी अध्यक्षतावाली पाच न्यायाधीशों के खंडपीठ - *के. एन. वांचु / एम. हिदायतुल्ला / रामास्वामी / पी. सत्यनारायण राजु* द्वारा सन १९६६ के निर्णय में कहा कि, *"हिंदु धर्म को एक विशिष्ट धर्म में परिभाषित करना बहुत मुस्कील है. क्यौ कि यह साझा मुल्यों और संस्कृति का एक समुह है. ना कि एक व्यक्ति द्वारा स्थापित पंथ. "* शास्त्री यज्ञपुरुषदजी इस केस में न्यायालय कहता है कि, Hinduism is impossible to define. The court adopted Radhakrishnan submission that Hinduism is a complex and the theist and atheist the skeptic and agnostic may all be Hindus. If they accept the Hindu system of culture and life. The court judged that Hinduism historically has had an *"Inclusive nature"* and it may broadly be described as a way of life and nothing more. सर्वोच्च न्यायालय के सदर निर्णय में जबरदस्ती से, *राधाकृष्णन* के सबमिशन तथा *"हिंदु"* शब्द को बडा कराने का प्रयास किया गया. अर्थात सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय यह *"प्रायमा फेसी"* संदर्भ में नही है. बल्कि निर्णय यह *"भावना के आधार"* पर दिखाई देता है. दुसरी ओर *राधाकृष्णन* ये अपने संशोधन छात्र का प्रबंध चुरानेवाला प्राध्यापक है. *"हिंदु"* इस जातिव्यवस्था पुरक शब्द पर हम और क्या कहे? *"सिंधु घाटी सभ्यता"* के बाद इ. पु. षटवी शति यह *"२८ वे बुध्द उगम"* का काल है. बुध्द के महापरिनिर्वाण के बाद इ. पु. तिसरी शति में *"महायान - हिनयान"* संप्रदाय विभाजन / पाचवी शति में महायान ने *"वज्रयान"* संप्रदाय को जन्म देना / ईसवी आठवी शति में वज्रयान ने *"तंत्रयान"* संप्रदाय को जन्म देना / इसवी ८५० को *शंकर* नामक व्यक्ति का जन्म होना / शंकर नामक व्यक्ति *"प्रछन्न बुध्द"* कहलाना / इसवी दसवी शति में वज्रयान - तंत्रयान ने, *"शैव पंथ / वैष्णव पंथ / साक्त पंथ"* को जन्म देना / शंकर नामक व्यक्ति ने स्वयं को *"आदि शंकराचार्य"* घोषित कर, *"महायान बुध्द विहारों"* पर अधिपत्य करना / शंकराचार्य द्वारा चार पीठों का निर्माण होना / इसवी ग्यारहवी - बारहवी शति मेँ *"वैदिक धर्म - ब्राम्हण धर्म"* की स्थापना होना / *"मोगल आदि सम्राटों"* का भारत पर आक्रमण / आदि कारण *"बुध्द धर्म अवनति"* के रहे है. परंतु *"ब्राम्हण धर्म - वैदिक धर्म अवनति"* का सही इतिहास यह क्या है ? अहं प्रश्न है. हमे *"भारत गुलामी का इतिहास"* दिखाई देता है. सन १८५७ का उठाव यह *"भारत के पहले आझादी का सही इतिहास"* है ही नही. वह झुठ का इतिहास रचा गया. विदेशी *"ब्राम्हण्यवाद"* यह भारतीय संविधान के *"समता"* (Equality) शब्द को तिलांजली देते हुये, *"समरसता"* (Hormony / Assimilation) को बढावा देने की, ब्राम्हण्य मानसिकता चेष्टा करता रहा / और कर रहा है. *"धर्मनिरपेक्षता"* (Secularism) शब्द को भी, *"पंथनिरपेक्षता"* अर्थ बताकर भ्रमित करने का प्रयास हो रहा है. अत: हम भारत को *"एकसंघ भारत"* कैसे बनाये रखे ? *"न्यायालयों"* में न्याय नही मिलता, आदि विषय यह हमारे लिए चिंता का विषय है. जो निंदनीय विषय है. न्यायालय निर्णय में, हिंदु धर्म के *"सामाजिक विषमता"* को पुर्णतः छोड दिया है. *"ब्राम्हण धर्म / वैदिक धर्म"* यह हिंदु धर्म से कैसे जुडा है ? यह विषय भी मायने रखता है. जय भीम !!!
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▪️*डॉ मिलिन्द जीवने 'शाक्य'*
नागपुर, दिनांक ३० मार्च २०२६
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