Sunday, 22 March 2026

 👌 *प्राचिन बुध्द धम्म मिशन - साहित्य में विपश्यना - फालुन दाफा साधना (?) एवं अष्टांगीक मार्ग की सम्यक समाधी समन्वय संदर्भ बनाम भारतीय राजसत्ता व्यवस्था में उसकी प्रासंगिकता और सद्य जीवन स्थिती !*

        *डॉ. मिलिन्द जीवने 'शाक्य',* नागपुर १७

राष्ट्रिय अध्यक्ष, सिव्हिल राईट्स प्रोटेक्शन सेल 

एक्स व्हिजिटिंग प्रोफेसर, डॉ बी आर आंबेडकर सामाजिक विज्ञान विद्यापीठ महु मप्र 

बुध्द आंबेडकरी लेखक, कवि, समिक्षक, चिंतक 

आंतरराष्ट्रीय परिषदों का संशोधन पेपर परिक्षक 

मो. न. ९३७०९८४१३८, ९८९०५८६८२२


          बुध्द का धम्म सारं दो पंक्तिओं में कह सकते है - *"सब्ब पापस्स अकरण, कुसलस्स उपसंपदा | सचित्तपरियोदपनं, एतं बुध्दान सासनं ||"* (अर्थात - सभी पापों को ना करना, कुशल कर्मों का करना, तथा स्वयं के मन - चित्त को परिशुध्द करना, यही बुध्द की शिक्षा है. यही बुद्ध का शासन है.) बुध्द धर्म हमें *"त्रिशरण - पंचशील - अष्टांग मार्ग - अष्टशील - दस पारमिता - चार आर्य सत्य - प्रतित्यसमुत्पाद - कार्यकारण भाव - अनात्मवाद - शुण्यवाद"* आदि मुल्यों का भी बोध कराता है. परंतु प्रमुख विवादित विषय *"विपश्यना"* (Meditation) यह रहा है. उसी प्रमुख्य विवाद में *"फालुन दाफा  / फालुन गोंग साधना"* पध्दति की भी भर हो गयी. फालुन दाफा / फालुन गोंग साधना पध्दति का प्रायोजक (?) *महायान संप्रदायी* (वज्रयान - तंत्रयान सलग्न) *ली होंग* यह चायना का साधक है. चायना में *ली होंग* और *"फालुन दाफा साधकों"* का शोषण / *"आर्गन तस्करी"* कराने का आरोप सत्ता शासन पर होते आया है. और उन्होंने *"अमेरिका"* में आश्रय लेने की भी चर्चा है. हम इस विषय पर आगे कुछ चर्चा भी करेंगे. वही *"विपश्यना"* यह बुध्द ने बतायी ही नहीं, यह कहनेवाला वर्ग है. वही विपश्यना वादी उसका खंडन करते रहे है. बुध्द ने *"अष्टांगीक मार्ग"* (Eight Fold) के आठवे क्रमांक में केवल *"समाधी"*  (Concentration) का उल्लेख है. *"विपश्यना"* (Meditation) यह उल्लेख नहीं है. विपश्यना का उल्लेख हमें केवल *"सत्तीपटन सुत्त"* में दिखाई देता है. *"फालुन दाफा / फालुन गोंग"* संदर्भ किस प्राचिन ग्रंथ में है, यह खुलासा करने की जिम्मेदारी *ली होंग "* इन्हे करना जरुरी भी है. महत्वपूर्ण सवाल यह है कि, हमारा अंतिम लक्ष *"विपश्यना / फालुन दाफा / फालुन गोंग"* प्रसार - प्रचार विवाद होना चाहिए या *"बुध्द धम्म का प्रसार - प्रचार ?"* हमारे जीवन की प्रणाली *"बुध्द धर्म"* से जुडी हुयी है या *"किसी साधना"* पध्दती से ??? भारत से तमाम *"विश्व भर में बुध्द का प्रसार - प्रचार"* हुआ है, उसी भारत देश में, बुध्द धर्म यह *"अल्पसंख्याक धर्म"* हो गया है. हमें इस विषय पर गंभीर विचार मंथन करना बहुत जरुरी है.

           बुध्द धर्म के *"तिन स्तंभ"* भी हमें दिखाई देते है. *"अनित्य / अनात्म / दु:ख अनित्य"* (अनिच्च). *"अविद्या"* (अज्ञान) का नाश किया तो ही, *"प्रज्ञा"* यह जागृत होती है. *"विपश्यना"* (Meditation) और *"सम्यक समाधी"* (Right Concentration) यह दोनो, क्या एक ही विषय है ? यह भी प्रश्न है. *"सम्यक समाधी"* यह अष्टांगिक मार्ग की अंतिम अवस्था है. *"आनापानसति"* अर्थात श्वास नियंत्रण / *"प्राणायाम"* अर्थात पुरक - कुंभक - रेचक पर नियंत्रण / *"समाधी मार्ग"* यह संदर्भ विषय भी है. हम यहां *"अर्हत / बोधिसत्व / बुध्दत्व"* इस संदर्भ की चर्चा नहीं करेंगे. परंतु *"फालुन दाफा / फालुन गोंग"* साधना पध्दति में, हमें यह संदर्भ, *"ली होंग"* इनके भाषण संकलन में दिखाई देते है. वह पुस्तके *ली होंग* इनके केवल *"भाषण संकलन"* है, जहां कही जगह पर *ली होंग* यह कंफुज्ड दिखाई देते है. उन्होंने *"फालुन दाफा / फालुन गोंग"* संदर्भ में, कोई भी *"संदर्भ ग्रंथ"* लिखा हुआ हमे नहीं दिखाई दिया. उस भाषण संकलन पुस्तक में, *"प्राचिन पध्दति का जिक्र"* है, परंतु कोई *"प्राचिन ग्रंथ का संदर्भ"* नहीं है. *फालुन दाफा साधक* केवलं उनके कथन को ही, *"प्रमाण"* संदर्भ मानते हुये दिखाई देते है. बुध्द ने ना किसी के कहने पर उसे *"प्रमाण"* मानो, यह उपदेश दिया है. बल्कि वह तुम्हारे बुध्दी के कसोटी पर सही उतरना चाहिए. बुध्द हमें *"अत्त दिपो भव |"* (अपना दिपक स्वयं बनो) यह संदेश देते है. बुध्द ने *"आकाश तत्व"* को नहीं माना. क्यौं कि उसमें *"रासायनिक घटक"* ही नहीं है. केवल चार ही तत्व (महाभुत) *"पृथ्वी / आप / तेज / वायु"* माना है. उसमे *"रासायनिक घटक"* यह विद्यमान होते है. परंतु फालुन दाफा प्रवर्तक *ली होंग* तो, *"आकाश तत्व"* का भी संदर्भ देते है. बुध्द ने *"आत्मा"* तत्व को नहीं माना. बुध्द ने *"नाम - रुप जोडी"* का ही संदर्भ दिया है. *"नामं च रुपं च इथ अत्थि सच्चतो.....!"* (विशुध्दीमग्ग) बुध्द ने *"मन - चित्त"* को माना है. *"चित्तेन नियतो लोको |"* सृष्टी - संसार यह चित्त की ही उपज है. बुध्द ने *"सृष्टी"* में तिन चिजों को नहीं माना. *"सृष्टी यह अजर, अमर, सचेतन या अचेतन नहीं है / संस्कार नित्य (कभी भी नाश ना होना) नहीं है / परमार्थत: कोई जीव या आत्मा नहीं है."* तथागत बुध्द ने *"कार्यकारणभाव"* (Cause of Action) नियम को *"प्रतित्यसमुत्पाद धम्म"* (पटिच्च समुप्पाद) माना है. तथागत बुध्द ने विश्व का कोई भी *"कर्ता"* नहीं माना. *"न हेत्थ देवो ब्रम्ह संसारस्य अत्थि कारको | बुध्दधम्मा पवन्तति हेतुसंभारपच्चया ति ||"* बुध्द ने सृष्टी के नियम अनुसार अपने आप *"सृष्टी चक्र"* शुरु रहने की बात कही है. परंतु फालुन दाफा प्रवर्तक *"ली होंग"* तो, बुध्द धर्म को अलग मोड पर ले जाते नजर आ रहे है. कोई *फालुन दाफा साधक* इस संदर्भ में, मेरे से चर्चा करे तो, निश्चित ही उनका स्वागत है. *"विपश्यना"* संदर्भ में पुर्वग्रह या विकृति से मुक्त होकर, वस्तु को समजा जाने की बात कही है. *"नकारात्मक आदतों"* को खत्म करने के आंतरिक शांती की स्थिती विकसित करने की बात कही है. और बहुत कुछ लिखा जा सकता है. परंतु लेख लिखने की शब्द मर्यादा होती है. इसलिए विराम देना ठिक है.

           तथागत बुध्द के महापरिनिर्वाण के बाद *इ. पु. तिसरी शति* में, बुध्द धर्म यह *"हिनयान - महायान संप्रदाय"* विभाजित हो गया था. *"हिनयान संप्रदाय"* द्वारा बुध्द की मुल भाषा *"पालि भाषा"* का ही अंगिकार किया. वही *"महायान संप्रदाय"* ने पालि भाषा पर संस्कार कर, *"हिब्रू संस्कृत भाषा"* का नविन अविष्कार किया. परंतु लिपी यह *"ब्राम्ही लिपी"* ही थी. आगे जाकर ब्राम्ही लिपि से *"अन्य लिपी का अविष्कार"* हुआ. तथा *"विभिन्न भाषा"* का भी अविष्कार हुआ. आगे जाकर *"क्लासिकल संस्कृत भाषा"* का भी अविष्कार हुआ. और उसकी लिपी यह *"नागरि लिपी"* थी. उसका *"प्रारुप इसवी ११००"* बना था. परंतु व्यवहार में *"नागरि लिपी इसवी १७९६"* में आयी. पाचवी शति में महायान ने *"वज्रयान संप्रदाय"* को / आठवी शति में वज्रायन ने *"तंत्रयान संप्रदाय"* को जन्म दिया. इसवी ८५० में *शंकर* नाम का व्यक्ती का जन्म होना / *"प्रछन्न बौध्द"* रुप में परिचीत होना / वज्रयान - तंत्रयान संप्रदाय ने इसवी दसवी शति में, *"शैव पंथ / वैष्णव पंथ / साक्त पंथ"* को जन्म देना / शंकर नामक व्यक्ती ने स्वयं को *"आदि शंकराचार्य"* घोषित कर, *"महायान बुद्ध विहारों"* पर अधिपत्य स्थापित करना / दसवी - ग्यारहवी शति में *"वैदिक धर्म - ब्राह्मण धर्म"* की स्थापना होना / *बुध्द धर्म अवनति* का कारण दसवी शति तक *"संप्रदाय विभाजन / पंथ का निर्माण - महायान बुद्ध विहारों पर आदि शंकराचार्य का अधिपत्य / ब्राह्मण धर्म का उदय"* तथा मोगल शासकों का आक्रमण भी रहा है. *"ब्राह्मण धर्म अवनति का इतिहास"* हमें क्यौं नहीं दिखाई देता. जब कि *"भारत गुलामी का इतिहास"* हमें दिखाई देता है. *"हिनयान"* संप्रदाय के प्रमुख ग्रंथ थे. *"त्रिपिटक / प्रतित्यसमुत्पाद / निर्वाण प्राप्ती."* वही *"महायान"* संप्रदाय के प्रमुख ग्रंथ थे. *"प्रज्ञा पारमिता / महायान श्रद्धोत पद / सध्दर्म पुण्डरिक / ललित विस्तार / अट्ठ सहस्त्रिका / महावस्तु / लंकावतार सुत्त / दशभुमिश्वर / नागानंदा."* उस समय *आचार्य अश्वघोष / आचार्य नागार्जुन / आचार्य आर्यसुरा / आचार्य कुमारल्भ* इन्हे *"चार सुर्य"* रुप में नाव लौकिकता भी मिली. और भी आचार्य परिचीत रहे थे. शब्द मर्यादा के कारण शब्द को विराम देना ही ठिक रहेगा.

          *फालुन दाफा साधक* वर्ग यह मुख्यतः भारत का *"आंबेडकरी बुध्द धर्मीय वर्ग"* ही है. बाबासाहेब डॉ आंबेडकर इन्होने हमें *"नवायान बुद्ध धर्म"* दिया. यह धर्म *"हिनयान संप्रदाय"* से कुछ निकटता भी रखता है. परंतु *"महायान / वज्रयान / तंत्रयान संप्रदाय"* से बहुत दुरी है. *"फालुन दाफा साधक"* के बुध्दी की कीव करनी होगी कि, वह *"चायना सत्ता शासन के फालुन दाफा साधक वर्ग शोषण"* के लिये संघर्ष कर रहे है. किसी भी प्रकार के *"शोषण की भर्त्सना"* जरुरी होनी चाहिये. परंतु भारत में *"आंबेडकरी बौध्द वर्ग"* यह शोषण काल से ही गुजरा वर्ग है. *"भीमा कोरेगाव युद्ध"* इसकी साक्ष है. *"पुणे पेशवाई गुलामी"* उन्होंने ना देखी है, ना ही सही है. महात्मा फुले / सावित्रीबाई फुले / छत्रपती शाहु महाराज / डॉ बाबासाहेब आंबेडकर आदि महाविरों की, हमारे हक्क की *"संघर्ष गाथा"* उन्होने अनुभव नहीं की है. तब फालुन दाफा के प्रवर्तक *ली होंग* हमें बचाने नहीं आया. आज हम पुनश्च उस पुराने *"संक्रमण काल"* से गुजर रहे है. हमे *"मागासवर्गीय नोकरी आरक्षण"* संविधान कवच होने से, उसे बंद करना संभव भी नहीं है तो, *"खाजगीकरण"* की बुनियाद रची गयी. नोकरी *"ठेकेदारी पध्दति"* (Contact System) का अवलंब किया गया. हम *"उच्च शिक्षा"* भी ना ले, शिक्षा क्षेत्र का भी *"निजिकरण"* किया गया. हम लोगों को *"कामों में आलसी"* करने के लिये, *"मोफत / स्वस्त अनाज वितरण"* की व्यवस्था की गयी. *"कामगार कानुन"* बदलकर उद्दोगपति फेवर में *"कानुन"* बनाये गये है. धनाढ्य वर्ग *"और ढनाढ्य"* बनते जा रहा है. और गरिबी वर्ग यह *"गरिबी"* में जी रहा है. भारत का *"प्रजातंत्र"* को धत्ता बताकर *"पुंजीवाद व्यवस्था"* घर कर रही है. हमारे लिये *"नया जेलखाना"* बनाने का प्रबंध किया जा रहा है. *"नागरिकता कानुन"* के नाम पर शोषण किया जा रहा है. हम केवल अनाज मुफ्त / स्वस्त मिलने पर ही खुश है. परंतु हमारे *"आलस्य मानसिकता"* की चिंता दिखाई नहीं देती. भारत पर *"विदेशी कर्ज"* बढते जा रहा है. अत: भारत के हर नागरिक पर, *"दो लाख का कर्ज"* का बोजा है. भारत का *"बेकारी दर ४.९% / दारिद्री दर ५.३% / विकास दर (GDP) ६.८ % - ७.२%"* शासन रिकार्ड आधार पर बतायी जा रही है. भारत की कुल *"लोकसंख्या १४५ करोड"* (विश्व का नंबर १ देश) के आसपास है. परंतु *"८० - ८५ लाख लोग मुफ्त अनाज"* पर बसर करते है. हर घर में *"बेरोजगार"* व्यक्ती हमें दिखाई देता है. और कुछ लोग *"पुंजीवाद"* के साथ नोकरी करने में, स्वयं को धन्य समझते है. अत: सरकार का *"घोलमाल आकडा"* हमें क्या संदेश देता है. भविष्य की *"पुणेरी पेशवाई"* लादने की यह शुरुवात है. फालुन दाफा साधकों को अपनी वेदना दिखाई नही दे रही है. बहुत कुछ उदाहरण दिये जा सकते हैं. हमारे नेता *"सत्ता नेता"* के पायलागु बने है. और हम *"विपश्यना / फालुन दाफा"* समान विवादो में / और केवल साधना करने में ही व्यस्त है. हमारा प्रमुख लक्ष *"धम्म प्रसारक - प्रचार - पालन"* हो, ना कि *"विपश्यना  - फालुन दाफा "* आदि. अत: हम हमारे बुध्दी को *"मानसिक लवकाग्रस्त"* (Mentaly Paralysed) होने पर भी समज नहीं पा रहे ? *"मानसिक शांती"* के लिये *"साधना"* करना बुरी बात नहीं है. परंतु उसके *"अधिन"* हो जाना यह चिंता का विषय है. जैसे - शराबी / मोबाईल अधिन .... अत: अपनी बात मनवाने के लिये केवल हम, मुजोरी / जिद्द / हेकेखोरी ही कर सकते हैं. जयभीम !!!


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▪️*डॉ. मिलिन्द जीवने 'शाक्य'*

     नागपुर दिनांक २२ मार्च २०२६

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