✍️*हिंदु धर्म रक्षणार्थ तिन बच्चे पैदा करो यह संघप्रमुख डॉ. मोहन भागवत का आवाहन और खंडमय भारत की आर्थिक - सामाजिक - राजकीय स्थिती अवलोकन !*
*डॉ. मिलिन्द जीवने 'शाक्य'*, नागपुर १७
राष्ट्रिय अध्यक्ष, सिव्हिल राईट्स प्रोटेक्शन सेल
एक्स व्हिजिटिंग प्रोफेसर, डॉ बी आर आंबेडकर सामाजिक विज्ञान विद्यापीठ महु मप्र
बुद्ध आंबेडकरी लेखक, कवि, समिक्षक, चिंतक
आंतरराष्ट्रीय परिषद का संशोधन पेपर परिक्षक
मो. न. ९३७०९८४१३८, ९२२५२२६९२२
लखनौ. उत्तर प्रदेश के सरस्वती शिशु मंदिर में आयोजित कार्यक्रम में सरसंघचालक डॉ मोहन भागवत के एक बयाण ने भारत में तुफान मचाया है. वह बयाण है - *"हिंदुओं ने तिन बच्चों को जन्म चाहिए."* मैं पिछले दो दिनों से इस बयान पर सोच रहा था. आगे भी डॉ मोहन भागवत बोल गये है. वह बयाण ही देखे. *"हिंदु धर्म को कोई भी धोका नहीं है. फिर भी सावध होकर घटती हुयी जनसंख्या पर, चिंता जतायी है. आमिष लेकरं धर्मांतरण पर भी बोल गये. भारत के घटते हुये प्रजनन दर के कारण भविष्य में नष्ट होने की बात कही है. विद्यापीठ अनुदान आयोग के नविन मार्गदर्शक तत्व संदर्भ में, कानुन के पालन की बात कही है. कानुन में त्रृटी हो तो, कानुन सुधार की भी बात कही है."* यह सभी विषय भारत के संदर्भ में हमें सोचने पर, मजबुर कर रहे है. इसके पहले *डॉ मोहन भागवत* इनका इंदौर (मध्य प्रदेश) का भाषण, तत्कालीन लोकसभा अध्यक्ष *सुमित्रा महाजन* इनकी प्रमुख उपस्थिती में, मुझे याद आ गया. इंदौर सभा में डॉ भागवत बोल गये थे - *"विवाह यह एक करार है. औरत का काम आदमी को खुश करना है. उसके बदले आदमी उसका भरण - पोषण करेगा."* अत: यह दोनो बयाण में मरना कहे या पिडित होना - *"स्त्री ही दिखाई देती है."* अत: भारतीय संविधान के *"अनुच्छेद १४ - १८ : समानता अधिकार"* का क्या होगा ? यह भी प्रश्न उत्पन्न हो गया है. अत: संघप्रमुख *डॉ मोहन भागवत* इनके बयान पर, हम कुछ बिंदुओं पर चर्चा करेंगे.
सबसे पहले हमें समझना होगा कि, *"राष्ट्रिय स्वयंसेवक संघ"*(RSS) के कार्यकर्ता ब्याह (विवाह) नहीं रचाते. उनका *"ब्रम्हचर्य पालन"* यह संदर्भ संशोधन का विषय भी हो सकता है. अब हम भारत का *"जनसंख्या दर"* देखेंगे. भारत की *"जनसंख्या १४५.०९ करोड"* अर्थात विश्व का नंबर वन देश है. नंबर दो पर *"चायना - १४१ करोड"* है और *"विश्व की जनसंख्या ८.२ से ८.३ अरब"* है. जनसंख्या मामलों में उत्तर प्रदेश / बिहार राज्य आघाडी पर है. वही *"दक्षिण भारत"* ने जनसंख्या दर पर, नियंत्रण पाया भी है. परंतु जनसंख्या अनुपात में *"लोकसभा सांसद बढोत्तरी"* यह विषय भारत के *"तिन तुकडे"* (उत्तरी भारत / दक्षिणी भारत / पश्चिमोत्तर भारत) होने का बडा विवाद भी भविष्य में हो सकता है. *"कुटुंब नियोजन कार्यक्रम"* (Family Planning) द्वारा प्रजनन दर पर अंकुश लगाया गया है. और *"प्रजनन दर (TFR) में २% से घटकर १.९%"* लाने में, हम ने सफलता पायी है. परंतु इस अंकुश को समाधानकारक नहीं कहा जा सकता. *"प्रजनन दर"* पर हम पुर्णतः स्थिरता लाने में सफलता नहीं पा सके. अत: संघप्रमुख *डॉ. मोहन भागवत* का वह बयाण हमारे देश के लिये चिंता का विषय है.
*"जनसंख्या दर वृध्दी"* (Population Control) की बहुत बडी समस्या, भी हमारे सामने खडी है. एक है *"गरिबी"* (Poverty) और दुसरी है *"बेरोजगारी"* (Unemployment). अभी हम केवल दो विषयों पर ही चर्चा करेंगे. सन २०२६ को *नीति आयोग तथा UNDP* के अनुसार, भारत का *"गरिबी दर सन २०१३ - १४ के मुकाबले २९.१७% से घटकर आज ११.२८%"* बताया जा रहा है. तथा *"अत्याधिक गरिबी दर ५.३%"* ही बताया जा रहा है. वही दुसरी ओर भारत शासन रिपोर्ट के अनुसार *"प्रधानमंत्री कल्याण अन्न योजना में ८१.३५ करोड (५६.१०%)"* में लाभार्थी है. वही *"अन्य लोग अन्न योजना लाभार्थी को मिलाये तो अंदाजे ८०% लाभार्थी"* दिखाई देते है. अत: *"नीति आयोग तथा UNDP के आकडों"* पर संदेह होना स्वाभाविक है. वही *"विश्व का गरिबी ८०८ मिलियन"* (४७%) बतायी गयी है. वही *"बेरोजगारी"* (Unemployment) को भी देखें. भारत का *"बेकारी दर २०२६ - ५.९५% तथा २०२५ - ४.८%"* बताया गया है. आंतरराष्ट्रीय संघटन (ILO) अनुसार *"विश्व का बेरोजगारी दर ४ ९%"* बताया गया है. जो हमारे लिये चिंता का विषय है.
भारत का *"साक्षरता दर"* (Literacy) सन २०११ - ७४% तुलना में *"बढकर ८०.९%"* बताया गया है. पुरुष दर ८२.१४% तथा स्त्री दर ६५.४६% बताया गया है. इसमें उत्तर प्रदेश / बिहार राज्य भी पिछडा हुआ है. अर्थात GDP तुलना में *"विकास दर ८.२%"* यह बतायी गयी है. वही भारत पर *"सरकारी ऋण"* (Public Debt) सकल घरेलु उत्पाद (GDP) से लगबग *"८१.९%"* है. जो विश्व में १७ वे स्थान पर है. आंतरिक बनाम बाहरी - *"कुल सार्वजनिक ऋण ९६.५९%"* तथा *"विदेशी ऋण ३ ४१%"* दिखाई देता है. अर्थात *"प्रति व्यक्ती ऋण ४.८ लाख"* तक है. भारत का ऋण GDP अनुपात ८१.९% बताया गया है. इस से हम भारत की आर्थिक - सामाजिक - राजकिय स्थिती का बोध, सहजता से कर सकते हैं. *"विद्यापीठ अनुदान आयोग"* विषय पर, पहले बार ही *"ब्राह्मण आंदोलन"* हुआ है. ब्राह्मणी मक्तेदारी चल रही थी. उस पर रोक लगाना जरुरी था. *"सुप्रीम कोर्ट"* ने ब्राह्मण वर्ग को राहत दी है या नहीं ? यह संशोधन का विषय है. इस में हम ने वह विषय, तथा *"अस्पृश्यता / मागासवर्गीय स्थिती / स्त्री शोषण / न्यायालय - सत्ताशाही - नौकरशाही मनमानी"* यह संदर्भ जोडे नहीं है. अगर यह मोटा मोटी भारत की स्थिती देखे तो, *"तिन बच्चे पैदा करने"* के बाद, होने वाले भयानक समस्या की हम कल्पना ही नहीं कर सकते.
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▪️*डॉ. मिलिन्द जीवने 'शाक्य'*
नागपुर दिनांक २३ फरवरी २०२६