✍️ *मा. सर्वोच्च न्यायालय यह अब संविधान की रक्षक (Watch Dog) ना होकर /निरपेक्ष सही न्यायदान की क्षमता खोकर / क्या जुते - फाईले खानेवाली फँक्टरी एवं गाली गलौच स्थली हो गयी है ?*
*डॉ. मिलिन्द जीवने 'शाक्य'* नागपुर १७
राष्ट्रिय अध्यक्ष, सिव्हिल राईट्स प्रोटेक्शन सेल
एक्स व्हिजिटींग प्रोफेसर, डॉ बी आर आंबेडकर सामाजिक विज्ञान विद्यापीठ, महु म.प्र.
एक्स मेडिकल आँफिसर एंड हाऊस सर्जन
बुध्द आंबेडकरी लेखक, कवि, समिक्षक, चिंतक
आंतरराष्ट्रिय परिषदों के संशोधन पेपर परिक्षक
मो.न. ९३७०९८४१३८, ९८९०५८६८२२
मा. सर्वोच्च न्यायालय *"संविधान रक्षक"* (Watch Dog) / *"निरपेक्ष - उचित न्यायदान"* (Right Justice) की अहं भुमिका पालन करने की पात्रता यह एक बहुत बडी पहेली बन गयी है. *"अयोध्या रामजन्मभुमी निर्णय / नागरीकत्व प्रश्न / चुनाव पध्दती / विभिन्न भ्रष्टाचार केसेस / कुछ विवादपुर्ण निर्णय"* आदी का उदाहरण दिया जा सकता है. अगर *"कोलोजीयम पध्दति"* ना होती तो, न्याय व्यवस्था के न्यायाधीश *"चपराशी स्पर्धा परिक्षा"* पास होते या नही होते ? यह संशोधन का विषय है. इसलिए न्यायदान व्यवस्था में *"संघ लोक सेवा आयोग"* (UPSC) के सदृश्य *"न्यायिक लोक सेवा आयोग"* (Judiciary Public Service कमीशन - JPSC) का गठण होकर, मेरिट आधार पर *"न्यायाधीश नियुक्ति "* होना, बहुत जरुरी हो गया है. यह प्रश्न *"न्यायाधीश मेरिट"* का है. नरेंद्र मोदी सरकार द्वारा पारीत *"संविधान अनुच्छेद 124 A - National Judicial Appintment Commission"* (NJAC) की मै बात नही कर रहा हुं. सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश वर्ग पर *"बुट फेकना / फाईल फेकना / न्यायाधीशों पर अभद्र टिप्पणी वा गाली गलौच करना"* यह आम विषय हो गया है. क्या यही *"न्याय व्यवस्था"* पात्रता रही है ? न्याय व्यवस्था की *"गरिमा"* क्यौ धुमिल हो रही है ? इस पर संशोधन होना बहुत जरुरी है. अनुसुचित जाति समुह से जुडे मद्रास उच्च न्यायालय के *न्या. कर्णन* इन्होने न्यायव्यवस्था में *"२० भ्रष्ट न्यायाधीश"* होने की शिकायत प्रधानमंत्री *नरेंद्र मोदी* इन्हे की थी. नरेंद्र मोदी इन्होने वह शिकायत तत्कालिन सरन्यायाधीश *जे एस केहर* इन्हे भेजी थी. और सर्वोच्च न्यायालय के *"सात बेंच खंडपीठ - जे एस केहर / दिपक मिश्रा / जे चेलमेश्वर / रंजन गोगाई / मदन लोकुर / पी सी घोष / कुरियन जोसेफ* इनके द्वारा न्या कर्णन को छ माह की सजा सुनाई थी. उन सात न्यायाधीश वर्ग से भ्रष्टाचारी न्यायाधीश कौन है ? इस विषय को छोडकर *"स्त्री लंपट / शोषक - रंजन गोगाई* सरन्यायाधीश पद से रिटायरमेंट होने के बाद, अब राज्यसभा मे विराजीत है. अत: हम न्याय व्यवस्था की कुछ धुमिल घटनाओं पर चर्चा करेंगे.
तत्कालिन सरन्यायाधीश *ए एस आनंद* इनके खंडपीठ में *एड. नंदलाल बालवानी* इन्होने सरन्यायाधीश इन पर २६ फरवरी १९९९ को *"जुता"* फेककर मारने से, तत्कालिन खंडपीठ ने उस वकिल की *"याचिका निरस्त"* करते हुये / अवमानना का दोषी मानकर *"४ माह की सजा, रु २००० जुर्माना, वकिल सुची"* से बरखास्त किया था. फिर २६ साल के बाद वही घटना तत्कालीन सरन्यायाधीश *भुषण गवई* इनके खंडपीठ मे घटीत हुयी. उच्च जाती के *एड. राकेश किशोर* इन्होने भुषण गवई इन पर *"बुट* फेकने के बाद भी, उसकी *"FIR दर्ज नही"* कराई गयी ना ही उस वकिल को कोई शिक्षा मिली. कारण एक *"वकिल लाबी"* बुट फेकनेवाले वकिल के साथ खडी होने से, *भुषण गवई* वह हिम्मत नही जुटा पाये. उत्तर प्रदेश के सत्ताधारी भाजप सांसद *निशिकांत दुबे* इन्होने १९ अप्रेल २०२५ को, तत्कालीन सरन्यायाधीश *संजीव खन्ना* इन्हे भारत मे *"गृह कलह"*(Civil War) करनेवाला कहने पर भी, सांसद निशिकांत दुबे इन पर कोई कारवाई नही हुयी. आज दिनांक १० जुलै २०२६ को, सर्वोच्च न्यायालय के *न्या. विश्वनाथन / न्या. आलोक आराधे* इनके खंडपीठ मे न्यायाधीश को *एड. भानुप्रताप सिंग* इस वकिल द्वारा *"Judicial Servant"* इस अपमानजनक शब्द से सुरुवात कर / लखनौ के ACP को *"अरेस्ट करने"* आदेश दे, यह कहने पर / न्यायाधीश ने हमे *"आदेश देने"* का जिक्र करने पर / एड भानुप्रताप सिंग ने अपने *"हाथ की फाईल"* न्यायाधीश पर फेकते हुये / *सरन्यायाधीश सुर्यकांत* इनको *"माँ - बहन की गाली गलौच"* की. अत: एड सिंग को न्यायालय के सुरक्षा रक्षको ने पकडकर वहा के *"पोलिस चौकी"* ले गये. परंतु *"FIR दर्ज नही"* की गयी. सर्वोच्च न्यायालय की यह घटनाएं क्या *"संदेश"* दे रही है ? क्या सर्वोच्च न्यायालय अपनी *"गरिमा - विश्वास खो चुकी"* है ? ऐसे बहुत सारे प्रश्न खडे होना तो लाजमी है.
उत्तर प्रदेश उच्च न्यायालय के *न्या. राम मनोहर नारायण मिश्रा* इन्होने १७ मार्च २०२५ को एक *"गंभिर यौन पिडन केस"* के निर्णय मे, *"नाबालिग लडकी के स्तन को पकडना / पायजामा का नाडा खोलना / पुल के निचे ले जाना"* इन तमाम घटना को *"बलात्कार का प्रयास"* ना मानकर / आरोपी को बरी किया. अत: उस *"न्यायाधीश के पत्नी - लडकी"* पर यह प्रयोग होना बलात्कार नही माना जाएगा ? प्रकरण की गंभिरता देखकर सर्वोच्च न्यायालय ने उस निर्णय को *"खारीज"* किया, यह अलग विषय है. उत्तर प्रदेश उच्च न्यायालय के और एक *न्या. शेखर यादव* यह विश्व हिंदु परिषद के मंच पर ८ दिसंबर २०२४ को जाकर / *"बहुत विवादपुर्ण जातियवादी टिप्पणी"* कर गये. वही दिल्ली उच्च न्यायालय के *न्या. यशवंत वर्मा* इनके बंगले पर, १४ मार्च २०२५ को *"लाखो की करंसी"* मिली थी. राजस्थान उच्च न्यायालय मे कुछ ब्राम्हण न्यायाधीश - वकिलो द्वारा *"मनु का पुतला"*:बिठाया गया. और ऐसे बहुत सारे विवादपुर्ण न्यायाधीश के निर्णय बताये जा सकते है. इन तमाम केस में उन *"न्यायाधीशो को जेल की शिक्षा - दंड"* नही मिला, जेसे अनुसुचित जाति के न्यायाधीश *सी. एस. कर्णन* को बगैर किसी अपराध से मिला था. शब्द मर्यादा के कारण शब्द को विराम दे रहा हु. प्रश्न हमारे *"न्याय व्यवस्था मेरिट"* का है. *"निरपेक्ष उचित न्याय"* का है. एवं *"भारतीय संविधान रक्षा"* का भी है. क्या *"न्यायाधीशों का Code of Conduct"* यही शिक्षा पढाता है. अत: भारत के भविष्य के बारे मे हम क्या कहे ??? इसलिए ब्रिटिश अंग्रेज काल *"ब्राम्हण्य न्यायाधीश"* बनने पर पाबंदी लगाई गयी थी. कांग्रेस पितामह *मोहनदास गांधी* / संघवाद के *सुदर्शन* / प्राचिन भारत के विचारविद *भर्तुहरी* इनके शब्दों में, भारत की राजनीति *"वेश्यालय"* है. आज वे होते तो, *"न्याय व्यवस्था को भी वेश्यालय"* कहते ? यह प्रश्न है...!!!
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▪️ *डॉ. मिलिन्द जीवने 'शाक्य'*
नागपुर दिनांक १० जुलै २०२६