Thursday, 26 March 2026

 ✍️  *चक्रवर्ती सम्राट अशोक जयंति  - चैत्र शुक्ल अष्टमी अर्थात २६ मार्च २०२६ को दोपहर ३.०० बजे दीक्षाभूमी नागपुर पर सम्राट अशोक पुतले के समिप सिव्हिल राईट्स प्रोटेक्शन सेल द्वारा भिक्खु संघ सहित प्रोसेशन में जाकर अभिवादन किया  !*    


प्राचिन भारत का महान राजा *चक्रवर्ती सम्राट अशोक* इनकी जयंति *चैत्र शुक्ल अष्टमी* दिन - इस साल दिनांक २६ मार्च २०२६ को आयी है. *"सिव्हिल राईट्स प्रोटेक्शन सेल"* संलग्न सभी विंग की ओर से, *"गुरुवार दिनांक २६ मार्च २०२६ दोपहर ३.०० बजे"* दीक्षाभूमी नागपुर स्थित *"चक्रवर्ती सम्राट अशोक"* के पुतले समिप, सी.आर. पी. सी. द्वारा भिक्खु सघ सहित अभिवादन किया गया. उस अवसर पर सीआरपीसी अध्यक्ष *डॉ. मिलिन्द जीवने शाक्य* इनके साथ नामांकित गीतकार - गायक  *अनिरुद्ध शेवाळे* / महाराष्ट्र शासन के भुतपुर्व अधिकारी *शिवदास वासे* /मनपा माजी प्रसिद्ध प्रमुख *दिलिप तांदळे* / सीआरपीसी अल्पसंख्याक विभाग के *युसुफ उन्नबी खान* (उद्योजक) /सीआरपीसी इंजिनिअर्स विंग के *इंजी. गौतम हेंदरे - इंजी. गीतांजली नगराले* / सीआरपीसी एम्प्लॉइज विंग के *शालिक जिल्हेकर - मिलिंद मस्के* / सीआरपीसी कल्चरल विंग के *दिलिप तांदळे*/ सीआरपीसी डॉक्टर्स विंग के *प्रा. डॉ. भाऊराव बोरकर - डॉ. राजेश नंदेश्वर - डॉ . इंदिरा सोमकुवर - डॉ. मंगला बनसोड* /सीआरपीसी वुमेन्स विंग के *डॉ मनिषा घोष  - सीमा बोधनकर- सुरेखा खंडारे - सत्यफुला गाडे*/ सीआऱपीसी के  *राजेंद्र घोरपडे / विजय सहारे / सुभेदार गुणवंत सोमकुवर-* आदि मान्यवर उपस्थित थे. सदर कार्यक्रम का संचालन *डॉ. मनिषा घोष* इऩ्होने तथा आभार *दिलिप तांदऴे* इन्होने माना. उस अवसर पर बहुत आंबेडकर प्रेमी उपस्थित थे.

Wednesday, 25 March 2026

 👌*चक्रवर्ती सम्राट अशोक जयंति पुर्व संध्या पर जीवन आश्रय वृध्दश्रम - अनाथालय में फलाहार / भोजन दान कार्यक्रम का सफल आयोजन !*


           *मॅट्रिक्स वरियर्स ऑर्गनायझेशन* द्वारा राणी दुर्गावती चौक नागपुर स्थित *"जीवन आश्रय वृध्दाश्रम - अनाथालय"* मे फलाहार वाटप तथा शांतीनगर के *मेहुल मुदलीयर ग्रुप* द्वारा सदर वृध्दाश्रम को *"भोजन दान"* कार्यक्रम का आयोजन 25 मार्च 2026 को श्याम 7.00 बजे किया गया. सदर आयोजन मे आयझल फाउंडेशन के *युसुफ उन्नबी खान* इनकी प्रमुख भुमिका थी. उस अवसर पर सिव्हिल राईट्स प्रोटेक्शन सेल के *डॉ. मिलिन्द जीवने 'शाक्य' /दिलिप तांदऴे* यह मान्यवर प्रमुख अतिथी थे. सदर कार्यक्रम सफल करने मे *श्रमिक महेंद्रा / प्रतिक पाटील / आदित्य खोबरागडे / पुजा रेड्डी / निशा मुदलीयार / हर्षिता थटिया / नदिनी मेंजोगे /आकाश निखाडे / संजना शाहु / सुरेश हरडे / कुणाल पवार* इनका योगदान रहा. अंत मे संस्था के *डॉ. विकास शेंडे / अश्विनी शेंडे* इन्होने  आभार माना.

Tuesday, 24 March 2026

👌*चक्रवर्ती सम्राट अशोक की जयंती चैत्र शुक्ल अष्टमी दिन पर भारत शासन द्वारा राष्ट्रिय स्तर पर मनाने एवं राष्ट्रिय अवकाश घोषित करने संदर्भ की सिव्हिल राईट्स प्रोटेक्शन सेल की सरकार से मांग !* (सिव्हिल राईट्स प्रोटेक्शन सेल द्वारा चैत्र शुक्ल अष्टमी - *२६ मार्च २०२६* को दीक्षाभूमी पर चक्रवर्ती सम्राट अशोक को अभिवादन)
       *डॉ. मिलिन्द जीवने 'शाक्य',* नागपुर १७
राष्ट्रीय अध्यक्ष, सिव्हिल राईट्स प्रोटेक्शन सेल 
एक्स व्हिजिटिंग प्रोफेसर, डॉ बी आर आंबेडकर सामाजिक विज्ञान विद्यापीठ महु मप्र 
बुध्द आंबेडकरी लेखक, कवि, समिक्षक, चिंतक 
आंतरराष्ट्रीय परिषदों के संशोधन पेपर परिक्षक 
मो. न. ९३७०९८४१३८, ९८९०५८६८२२

           प्राचिन *"अखंड भारत"* का एकमेव महान राजा *चक्रवर्ती सम्राट अशोक* हो गये है. और कोई भी सम्राट की उनसे तुलना नही हो सकती है. भारत सरकार का राष्ट्रिय चिन्ह यह *"सम्राट अशोक"* की धरोहर है. प्राचिन भारत का गौरव *"सम्राट अशोक शिलालेख"* के बयाण करता है. और खेद का विषय यह है कि, उनकी जयंती *"चैत्र शुक्ल अष्टमी"* के दिन ना भारत सरकार ने / ना किसी राज्य सरकार ने, अब तक उस दिन *"राष्ट्रिय अवकाश"* (छुट्टी) घोषित किया है, ना ही वह दिन *"राष्ट्रिय स्तर पर मनाया"* गया है. ऐसा भी नहीं हैं कि, भारत सरकार से किसी संघठण ने मांग ही नहीं की. *"सिव्हिल राईट्स प्रोटेक्शन सेल"* इस राष्ट्रिय संघटन ने, दिनांक ५/०३/२०१८ तथा २७/०४/२०२४ को, भारत सरकार से वह मांग की थी. भारत सरकार के *"विभिन्न मंत्रालयों"* (कार्मिक - लोक शिकायत तथा पेंशन मंत्रालय का मिला पत्र दिनांक १५/०७/२०१८ / गृह मंत्रालय का मिला पत्र दिनांक ६/०९/२०१८ को सांस्कृतिक मंत्रालय को / सामान्य प्रशासन विभाग का मिला पत्र दिनांक ८/१०/२०१८) की ओर से, सिव्हिल राईट्स प्रोटेक्शन सेल के राष्ट्रीय अध्यक्ष *डॉ मिलिन्द जीवने 'शाक्य'* इन्हे तिन पत्र भी प्राप्त हुये. परंतु ८ सालों से भारत सरकार *"भारत के महान धरती पुत्र"* का सन्मान ना करती हो तो, भारत सरकार में पदासिन कोई भी *"मंत्रालय / नोकरशाही"* उस पद पर बैठने के *"लायक"* ही नहीं है, यह खेद के साथ कहना पडता है. सन २०२६ में *चक्रवर्ती सम्राट अशोक* की जयंती *"चैत्र शुक्ल अष्टमी"* यह दिन *"२६ मार्च"* को है. अत: हम भारतीयों लोगों ने अपना दायित्व निभाने की सक्त जरुरत है. *"हमें भारत सरकार समान अहसास फरामोश नहीं हो सकते है."* सम्राट अशोक की जयंती भारत में पहिली बार *"सिव्हिल राईट्स प्रोटेक्शन सेल / जीवक वेल्फेअर सोसायटी / अश्वघोष बुध्दीस्ट फाऊंडेशन"* द्वारा आज से *"२० साल पहले संयुक्त रुप"* से मनायी गयी थी, यह हम गौरव से बताते है. *सिव्हिल राईट्स प्रोटेक्शन सेल* की ओर से, चैत्र शुक्ल अष्टमी दिन *"२६ मार्च २०२६"* को, हम दीक्षाभूमी जाकर सम्राट अशोक की मुर्ती पर जाकर अभिवादन करेंगे. आप भी हमारे साथ शामिल हो !!!

Sunday, 22 March 2026

 👌 *प्राचिन बुध्द धम्म मिशन - साहित्य में विपश्यना - फालुन दाफा साधना (?) एवं अष्टांगीक मार्ग की सम्यक समाधी समन्वय संदर्भ बनाम भारतीय राजसत्ता व्यवस्था में उसकी प्रासंगिकता और सद्य जीवन स्थिती !*

        *डॉ. मिलिन्द जीवने 'शाक्य',* नागपुर १७

राष्ट्रिय अध्यक्ष, सिव्हिल राईट्स प्रोटेक्शन सेल 

एक्स व्हिजिटिंग प्रोफेसर, डॉ बी आर आंबेडकर सामाजिक विज्ञान विद्यापीठ महु मप्र 

बुध्द आंबेडकरी लेखक, कवि, समिक्षक, चिंतक 

आंतरराष्ट्रीय परिषदों का संशोधन पेपर परिक्षक 

मो. न. ९३७०९८४१३८, ९८९०५८६८२२


          बुध्द का धम्म सारं दो पंक्तिओं में कह सकते है - *"सब्ब पापस्स अकरण, कुसलस्स उपसंपदा | सचित्तपरियोदपनं, एतं बुध्दान सासनं ||"* (अर्थात - सभी पापों को ना करना, कुशल कर्मों का करना, तथा स्वयं के मन - चित्त को परिशुध्द करना, यही बुध्द की शिक्षा है. यही बुद्ध का शासन है.) बुध्द धर्म हमें *"त्रिशरण - पंचशील - अष्टांग मार्ग - अष्टशील - दस पारमिता - चार आर्य सत्य - प्रतित्यसमुत्पाद - कार्यकारण भाव - अनात्मवाद - शुण्यवाद"* आदि मुल्यों का भी बोध कराता है. परंतु प्रमुख विवादित विषय *"विपश्यना"* (Meditation) यह रहा है. उसी प्रमुख्य विवाद में *"फालुन दाफा  / फालुन गोंग साधना"* पध्दति की भी भर हो गयी. फालुन दाफा / फालुन गोंग साधना पध्दति का प्रायोजक (?) *महायान संप्रदायी* (वज्रयान - तंत्रयान सलग्न) *ली होंग* यह चायना का साधक है. चायना में *ली होंग* और *"फालुन दाफा साधकों"* का शोषण / *"आर्गन तस्करी"* कराने का आरोप सत्ता शासन पर होते आया है. और उन्होंने *"अमेरिका"* में आश्रय लेने की भी चर्चा है. हम इस विषय पर आगे कुछ चर्चा भी करेंगे. वही *"विपश्यना"* यह बुध्द ने बतायी ही नहीं, यह कहनेवाला वर्ग है. वही विपश्यना वादी उसका खंडन करते रहे है. बुध्द ने *"अष्टांगीक मार्ग"* (Eight Fold) के आठवे क्रमांक में केवल *"समाधी"*  (Concentration) का उल्लेख है. *"विपश्यना"* (Meditation) यह उल्लेख नहीं है. विपश्यना का उल्लेख हमें केवल *"सत्तीपटन सुत्त"* में दिखाई देता है. *"फालुन दाफा / फालुन गोंग"* संदर्भ किस प्राचिन ग्रंथ में है, यह खुलासा करने की जिम्मेदारी *ली होंग "* इन्हे करना जरुरी भी है. महत्वपूर्ण सवाल यह है कि, हमारा अंतिम लक्ष *"विपश्यना / फालुन दाफा / फालुन गोंग"* प्रसार - प्रचार विवाद होना चाहिए या *"बुध्द धम्म का प्रसार - प्रचार ?"* हमारे जीवन की प्रणाली *"बुध्द धर्म"* से जुडी हुयी है या *"किसी साधना"* पध्दती से ??? भारत से तमाम *"विश्व भर में बुध्द का प्रसार - प्रचार"* हुआ है, उसी भारत देश में, बुध्द धर्म यह *"अल्पसंख्याक धर्म"* हो गया है. हमें इस विषय पर गंभीर विचार मंथन करना बहुत जरुरी है.

           बुध्द धर्म के *"तिन स्तंभ"* भी हमें दिखाई देते है. *"अनित्य / अनात्म / दु:ख अनित्य"* (अनिच्च). *"अविद्या"* (अज्ञान) का नाश किया तो ही, *"प्रज्ञा"* यह जागृत होती है. *"विपश्यना"* (Meditation) और *"सम्यक समाधी"* (Right Concentration) यह दोनो, क्या एक ही विषय है ? यह भी प्रश्न है. *"सम्यक समाधी"* यह अष्टांगिक मार्ग की अंतिम अवस्था है. *"आनापानसति"* अर्थात श्वास नियंत्रण / *"प्राणायाम"* अर्थात पुरक - कुंभक - रेचक पर नियंत्रण / *"समाधी मार्ग"* यह संदर्भ विषय भी है. हम यहां *"अर्हत / बोधिसत्व / बुध्दत्व"* इस संदर्भ की चर्चा नहीं करेंगे. परंतु *"फालुन दाफा / फालुन गोंग"* साधना पध्दति में, हमें यह संदर्भ, *"ली होंग"* इनके भाषण संकलन में दिखाई देते है. वह पुस्तके *ली होंग* इनके केवल *"भाषण संकलन"* है, जहां कही जगह पर *ली होंग* यह कंफुज्ड दिखाई देते है. उन्होंने *"फालुन दाफा / फालुन गोंग"* संदर्भ में, कोई भी *"संदर्भ ग्रंथ"* लिखा हुआ हमे नहीं दिखाई दिया. उस भाषण संकलन पुस्तक में, *"प्राचिन पध्दति का जिक्र"* है, परंतु कोई *"प्राचिन ग्रंथ का संदर्भ"* नहीं है. *फालुन दाफा साधक* केवलं उनके कथन को ही, *"प्रमाण"* संदर्भ मानते हुये दिखाई देते है. बुध्द ने ना किसी के कहने पर उसे *"प्रमाण"* मानो, यह उपदेश दिया है. बल्कि वह तुम्हारे बुध्दी के कसोटी पर सही उतरना चाहिए. बुध्द हमें *"अत्त दिपो भव |"* (अपना दिपक स्वयं बनो) यह संदेश देते है. बुध्द ने *"आकाश तत्व"* को नहीं माना. क्यौं कि उसमें *"रासायनिक घटक"* ही नहीं है. केवल चार ही तत्व (महाभुत) *"पृथ्वी / आप / तेज / वायु"* माना है. उसमे *"रासायनिक घटक"* यह विद्यमान होते है. परंतु फालुन दाफा प्रवर्तक *ली होंग* तो, *"आकाश तत्व"* का भी संदर्भ देते है. बुध्द ने *"आत्मा"* तत्व को नहीं माना. बुध्द ने *"नाम - रुप जोडी"* का ही संदर्भ दिया है. *"नामं च रुपं च इथ अत्थि सच्चतो.....!"* (विशुध्दीमग्ग) बुध्द ने *"मन - चित्त"* को माना है. *"चित्तेन नियतो लोको |"* सृष्टी - संसार यह चित्त की ही उपज है. बुध्द ने *"सृष्टी"* में तिन चिजों को नहीं माना. *"सृष्टी यह अजर, अमर, सचेतन या अचेतन नहीं है / संस्कार नित्य (कभी भी नाश ना होना) नहीं है / परमार्थत: कोई जीव या आत्मा नहीं है."* तथागत बुध्द ने *"कार्यकारणभाव"* (Cause of Action) नियम को *"प्रतित्यसमुत्पाद धम्म"* (पटिच्च समुप्पाद) माना है. तथागत बुध्द ने विश्व का कोई भी *"कर्ता"* नहीं माना. *"न हेत्थ देवो ब्रम्ह संसारस्य अत्थि कारको | बुध्दधम्मा पवन्तति हेतुसंभारपच्चया ति ||"* बुध्द ने सृष्टी के नियम अनुसार अपने आप *"सृष्टी चक्र"* शुरु रहने की बात कही है. परंतु फालुन दाफा प्रवर्तक *"ली होंग"* तो, बुध्द धर्म को अलग मोड पर ले जाते नजर आ रहे है. कोई *फालुन दाफा साधक* इस संदर्भ में, मेरे से चर्चा करे तो, निश्चित ही उनका स्वागत है. *"विपश्यना"* संदर्भ में पुर्वग्रह या विकृति से मुक्त होकर, वस्तु को समजा जाने की बात कही है. *"नकारात्मक आदतों"* को खत्म करने के आंतरिक शांती की स्थिती विकसित करने की बात कही है. और बहुत कुछ लिखा जा सकता है. परंतु लेख लिखने की शब्द मर्यादा होती है. इसलिए विराम देना ठिक है.

           तथागत बुध्द के महापरिनिर्वाण के बाद *इ. पु. तिसरी शति* में, बुध्द धर्म यह *"हिनयान - महायान संप्रदाय"* विभाजित हो गया था. *"हिनयान संप्रदाय"* द्वारा बुध्द की मुल भाषा *"पालि भाषा"* का ही अंगिकार किया. वही *"महायान संप्रदाय"* ने पालि भाषा पर संस्कार कर, *"हिब्रू संस्कृत भाषा"* का नविन अविष्कार किया. परंतु लिपी यह *"ब्राम्ही लिपी"* ही थी. आगे जाकर ब्राम्ही लिपि से *"अन्य लिपी का अविष्कार"* हुआ. तथा *"विभिन्न भाषा"* का भी अविष्कार हुआ. आगे जाकर *"क्लासिकल संस्कृत भाषा"* का भी अविष्कार हुआ. और उसकी लिपी यह *"नागरि लिपी"* थी. उसका *"प्रारुप इसवी ११००"* बना था. परंतु व्यवहार में *"नागरि लिपी इसवी १७९६"* में आयी. पाचवी शति में महायान ने *"वज्रयान संप्रदाय"* को / आठवी शति में वज्रायन ने *"तंत्रयान संप्रदाय"* को जन्म दिया. इसवी ८५० में *शंकर* नाम का व्यक्ती का जन्म होना / *"प्रछन्न बौध्द"* रुप में परिचीत होना / वज्रयान - तंत्रयान संप्रदाय ने इसवी दसवी शति में, *"शैव पंथ / वैष्णव पंथ / साक्त पंथ"* को जन्म देना / शंकर नामक व्यक्ती ने स्वयं को *"आदि शंकराचार्य"* घोषित कर, *"महायान बुद्ध विहारों"* पर अधिपत्य स्थापित करना / दसवी - ग्यारहवी शति में *"वैदिक धर्म - ब्राह्मण धर्म"* की स्थापना होना / *बुध्द धर्म अवनति* का कारण दसवी शति तक *"संप्रदाय विभाजन / पंथ का निर्माण - महायान बुद्ध विहारों पर आदि शंकराचार्य का अधिपत्य / ब्राह्मण धर्म का उदय"* तथा मोगल शासकों का आक्रमण भी रहा है. *"ब्राह्मण धर्म अवनति का इतिहास"* हमें क्यौं नहीं दिखाई देता. जब कि *"भारत गुलामी का इतिहास"* हमें दिखाई देता है. *"हिनयान"* संप्रदाय के प्रमुख ग्रंथ थे. *"त्रिपिटक / प्रतित्यसमुत्पाद / निर्वाण प्राप्ती."* वही *"महायान"* संप्रदाय के प्रमुख ग्रंथ थे. *"प्रज्ञा पारमिता / महायान श्रद्धोत पद / सध्दर्म पुण्डरिक / ललित विस्तार / अट्ठ सहस्त्रिका / महावस्तु / लंकावतार सुत्त / दशभुमिश्वर / नागानंदा."* उस समय *आचार्य अश्वघोष / आचार्य नागार्जुन / आचार्य आर्यसुरा / आचार्य कुमारल्भ* इन्हे *"चार सुर्य"* रुप में नाव लौकिकता भी मिली. और भी आचार्य परिचीत रहे थे. शब्द मर्यादा के कारण शब्द को विराम देना ही ठिक रहेगा.

          *फालुन दाफा साधक* वर्ग यह मुख्यतः भारत का *"आंबेडकरी बुध्द धर्मीय वर्ग"* ही है. बाबासाहेब डॉ आंबेडकर इन्होने हमें *"नवायान बुद्ध धर्म"* दिया. यह धर्म *"हिनयान संप्रदाय"* से कुछ निकटता भी रखता है. परंतु *"महायान / वज्रयान / तंत्रयान संप्रदाय"* से बहुत दुरी है. *"फालुन दाफा साधक"* के बुध्दी की कीव करनी होगी कि, वह *"चायना सत्ता शासन के फालुन दाफा साधक वर्ग शोषण"* के लिये संघर्ष कर रहे है. किसी भी प्रकार के *"शोषण की भर्त्सना"* जरुरी होनी चाहिये. परंतु भारत में *"आंबेडकरी बौध्द वर्ग"* यह शोषण काल से ही गुजरा वर्ग है. *"भीमा कोरेगाव युद्ध"* इसकी साक्ष है. *"पुणे पेशवाई गुलामी"* उन्होंने ना देखी है, ना ही सही है. महात्मा फुले / सावित्रीबाई फुले / छत्रपती शाहु महाराज / डॉ बाबासाहेब आंबेडकर आदि महाविरों की, हमारे हक्क की *"संघर्ष गाथा"* उन्होने अनुभव नहीं की है. तब फालुन दाफा के प्रवर्तक *ली होंग* हमें बचाने नहीं आया. आज हम पुनश्च उस पुराने *"संक्रमण काल"* से गुजर रहे है. हमे *"मागासवर्गीय नोकरी आरक्षण"* संविधान कवच होने से, उसे बंद करना संभव भी नहीं है तो, *"खाजगीकरण"* की बुनियाद रची गयी. नोकरी *"ठेकेदारी पध्दति"* (Contact System) का अवलंब किया गया. हम *"उच्च शिक्षा"* भी ना ले, शिक्षा क्षेत्र का भी *"निजिकरण"* किया गया. हम लोगों को *"कामों में आलसी"* करने के लिये, *"मोफत / स्वस्त अनाज वितरण"* की व्यवस्था की गयी. *"कामगार कानुन"* बदलकर उद्दोगपति फेवर में *"कानुन"* बनाये गये है. धनाढ्य वर्ग *"और ढनाढ्य"* बनते जा रहा है. और गरिबी वर्ग यह *"गरिबी"* में जी रहा है. भारत का *"प्रजातंत्र"* को धत्ता बताकर *"पुंजीवाद व्यवस्था"* घर कर रही है. हमारे लिये *"नया जेलखाना"* बनाने का प्रबंध किया जा रहा है. *"नागरिकता कानुन"* के नाम पर शोषण किया जा रहा है. हम केवल अनाज मुफ्त / स्वस्त मिलने पर ही खुश है. परंतु हमारे *"आलस्य मानसिकता"* की चिंता दिखाई नहीं देती. भारत पर *"विदेशी कर्ज"* बढते जा रहा है. अत: भारत के हर नागरिक पर, *"दो लाख का कर्ज"* का बोजा है. भारत का *"बेकारी दर ४.९% / दारिद्री दर ५.३% / विकास दर (GDP) ६.८ % - ७.२%"* शासन रिकार्ड आधार पर बतायी जा रही है. भारत की कुल *"लोकसंख्या १४५ करोड"* (विश्व का नंबर १ देश) के आसपास है. परंतु *"८० - ८५ लाख लोग मुफ्त अनाज"* पर बसर करते है. हर घर में *"बेरोजगार"* व्यक्ती हमें दिखाई देता है. और कुछ लोग *"पुंजीवाद"* के साथ नोकरी करने में, स्वयं को धन्य समझते है. अत: सरकार का *"घोलमाल आकडा"* हमें क्या संदेश देता है. भविष्य की *"पुणेरी पेशवाई"* लादने की यह शुरुवात है. फालुन दाफा साधकों को अपनी वेदना दिखाई नही दे रही है. बहुत कुछ उदाहरण दिये जा सकते हैं. हमारे नेता *"सत्ता नेता"* के पायलागु बने है. और हम *"विपश्यना / फालुन दाफा"* समान विवादो में / और केवल साधना करने में ही व्यस्त है. हमारा प्रमुख लक्ष *"धम्म प्रसारक - प्रचार - पालन"* हो, ना कि *"विपश्यना  - फालुन दाफा "* आदि. अत: हम हमारे बुध्दी को *"मानसिक लवकाग्रस्त"* (Mentaly Paralysed) होने पर भी समज नहीं पा रहे ? *"मानसिक शांती"* के लिये *"साधना"* करना बुरी बात नहीं है. परंतु उसके *"अधिन"* हो जाना यह चिंता का विषय है. जैसे - शराबी / मोबाईल अधिन .... अत: अपनी बात मनवाने के लिये केवल हम, मुजोरी / जिद्द / हेकेखोरी ही कर सकते हैं. जयभीम !!!


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▪️*डॉ. मिलिन्द जीवने 'शाक्य'*

     नागपुर दिनांक २२ मार्च २०२६

Saturday, 21 March 2026

 🌹*स्वप्नात आलेली ती कोरोना !*

     *डॉ. मिलिन्द जीवने 'शाक्य'*

      मो. न. ९३७०९८४१३८


कालच्या त्या धकाधकित

सर्व काही कामे पार पाडल्यावर

सहज ऑफिस खुर्चीवर

माझ्या डोळ्यानी विसावा घेतला 

आणि अक्षरशः कोरोना (व्हायरस)

ही माझ्या स्वप्नात आली

आणि हळुवारपणे मला ती म्हणाली 

चल आपण प्रेम करु या !

तु आज एकटा निवांत दिसतोस

आणि मी सुद्धा एकटी निवांत आहे....

मी म्हणालो 

अगं आज तु कशी काय फ्री आहेसं ?

चीन देशातुन तु जगात वावरतेसं

आणि समस्त जग पालथे घातलेसं

माझ्या भारताला ही सोडले नाहीसं !

तेव्हा ती म्हणाली 

अरे हो, तुझे हे बरोबर आहे

पण भारत देशाचे कर्जबाजारी होणे

सोबत जातीव्यवस्था जोपासत असतांना

मला मानवतावाद कधी दिसलाचं नाही

मला वाटले ही छान भुमी आहे

माझ्या व्हायरस लागणीला....

परंतु काल बुध्द दर्शन झाले

विश्व शांती अहिंसा संदेश 

बुध्दाने जगाला दिलेला आहे 

आता वाटले येथे थांबायला नको

म्हणुन मला निवांत वेळ मिळाली

तुझ्याशी बोलायला - प्रेम करायला

वरुन तु डॉक्टर ही आहेसं

माझी लागणं तुला होवु देणार नाही....

तिच्या ह्या प्रेम आवाहनाने 

मी हळुच तिला म्हटले

अगं हो पण आपले हे प्रेम !

किती घटकांचे राहाणार आहे ?

कारण तु देश सोडणार आहेस नां !

ती लाजत लाजत मला म्हणाली

अरे तु लिखाण करणारा

मग आपल्या अल्प काळ प्रेमावर 

तु काही तरी लिखाण करशील

ती आठवण हृदयात कोरुन ठेवील

चिरकाल तुला ना विसरण्यासाठी....

आणि हळुचं मी डोळे उघडले

बघतो तर काय ?

स्वप्नात आलेली ती कोरोना

फार दुर निघुन गेलेली होती

कायमची माझ्यापासुन !

ह्या आयुष्यातुन !!

मला कधी ना भेटण्याकरीता...!!!


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नागपूर दिनांक २१/०३/२०२६

(कोराना काळात लिहिलेली माझी ही 

कविता अचानक दिसुन आली. पुनश्च 

सादर तुमच्या वाचनाकरीता)

Friday, 20 March 2026

 💐 *अधिकराव बाबुराव शिंदे इनकी सीआरपीसी पश्चिम शाखा महाराष्ट्र के सचिव पद पर नियुक्ती !*


      *सिव्हिल राईट्स प्रोटेक्शन सेल* यह राष्ट्रिय संघटन  के *"पश्चिम महाराष्ट्र प्रदेश सचिव"* पद पर *अधिकराव बाबुराव शिंदे* इनकी नियुक्ती सीआरपीसी के पश्चिम महाराष्ट्र कार्याध्यक्ष *महादेव बनसोडे* इन्होने सीआरपीसी एम्प्लॉइज विंग के राष्ट्रीय पदाधिकारी *डॉ. सिध्दार्थ मोरे* तथा पश्चिम महाराष्ट्र अध्यक्ष *निवृत्ती रोकडे* इनसे चर्चा कर की है. सदर नियुक्ती सुचना सिव्हिल राईट्स प्रोटेक्शन सेल के *राष्ट्रिय अध्यक्ष* तथा सीआरपीसी वुमन्स विंग / सीआरपीसी एडव्होकेट विंग / सीआरपीसी एम्पाइज विंग / सीआरपीसी हेल्थ (डॉक्टर) विंग / सीआरपीसी बुध्द आंबेडकरी साहित्यिक (लिटररी) विंग / सीआरपीसी इंजीनियर्स विंग / सीआरपीसी ट्रेड्स एंड कॉमर्स विंग / सीआरपीसी ट्रायबल विंग / सीआरपीसी कल्चरल विंग / सीआरपीसी वुमन्स क्लब के "राष्ट्रिय पेट्रान" - *डॉ मिलिन्द जीवने 'शाक्य'*  इन्हे कर दी है. *साहेबराव शिंदे* ये विभिन्न सामाजिक कार्या से जुडे है. उनके इस नियुक्ती पर सभी पदाधिकारी वर्ग ने उनका अभिनंदन किया है.

Monday, 16 March 2026

 ‌‌👌*बुध्द काल की बम्हन संज्ञा एवं वैदिक आर्य काल की ब्राह्मण संज्ञा ये दोनो भी भिन्न भिन्न अर्थ होकर बुद्ध काल में वैदिक ब्राह्मण धर्म नाम का कोई अस्तित्व नहीं था !*

       *डॉ. मिलिन्द जीवने 'शाक्य',* नागपुर १७

राष्ट्रिय अध्यक्ष, सिव्हिल राईट्स प्रोटेक्शन सेल 

एक्स व्हिजिटिंग प्रोफेसर, डॉ बी आर आंबेडकर सामाजिक विज्ञान विद्यापीठ महु मप्र 

बुद्ध आंबेडकरी लेखक, कवि, समिक्षक, चिंतक 

आंतरराष्ट्रीय परिषदों के संशोधन पेपर परिक्षक 

मो. न. ९३७०९८४१३८, ९२२५२२६९२२


           जब हम बुद्ध काल में *"वैदिक ब्राह्मण आर्य धर्म"* अस्तित्व पर संशोधन करते है, तब हमें *"बम्हन"* और *"ब्राह्मण"* यह संज्ञा, दो विभिन्न वर्ग अर्थ मे दिखाई देती है. बुद्ध काल में *"बम्हन"* यह शब्द - *"समन / विद्वान"* इस अर्थ से दिखाई देती है. हमे इस संदर्भ को पुर्ण रुप से समझने के लिये, इ.पु. षटवी - पाचवी शती की लिपी, *"धम्म लिपी या बाम्ही लिपी"* को समझना बहुत ही जरुरी है. प्राचीन भारत सभ्यता लिपी *"सिंधु घाटी सभ्यता लिपी"* को, अभी तक भी पढा  / समजा नहीं गया. इस के बहुत से कारण भी रहे है. इस पर चर्चा हम फिर कभी करेंगे. परंतु *"पालि भाषा"* यह पढी गयी है / समझी गयी है / और उमगी भी गयी है. तत्कालीन प्राचीन भाषा मागधि भाषा या *"पाली भाषा"* यह रही थी. अत: तत्कालीन *"पालि भाषा"* तथा इ.पु. तिसरी शति की *"हिब्रू संस्कृत भाषा"* इनके संदर्भ को समझना होगा. वह काल बुध्द धर्म के *"हिनयान - महायान संप्रदाय"* विभाजन संक्रमण का विशेष काल है. हिनयान संप्रदाय यह बुद्ध की मुलं भाषा, *"पालि भाषा"* से ही जुडा रहा. वही महायान संप्रदाय ने *"पालि भाषा पर संस्कार कर हिब्रू संस्कृत भाषा"* का, नविन अविष्कार किया. पालि भाषा पर संस्कार होने से, उसका नामकरण यह *"संस्कृत"* पडा है. इसवी दसवी ग्यारहवी शति में, *"वैदिक ब्राह्मण धर्म"* का उदय होता है. और हिब्रू संस्कृत भाषा पर, वैदिक काल में फिर से नविन संस्कार होकर, *"क्लासिकल संस्कृत भाषा"* का जन्म हुआ. आज की संस्कृत भाषा भी क्लासिकल संस्कृत भाषा ही है.

             पालि भाषा का सर्व प्रथम वैय्याकरण *"कच्चायन"* इन्होने कराने का संदर्भ मिलता है. पालि व्याकरण यह तिन भागों में विभक्त है. *"कच्चायन व्याकरण / मोग्गलान व्याकरण / अग्गवसकृत - सद्यनीति."* पालि भाषा में ४१ ध्वनिया और १० स्वर है. प्राकृत भाषा में भी १० स्वर है. संस्कृत भाषा में १३ स्वर है. अपभ्रंश भाषा में ८ स्वर है. हिंदी भाषा में केवल ११ स्वर है. *"पालि - प्राकृत भाषा की अंतिम अपभ्रंश अवस्था ही आदि हिंदी है."* उसके बाद अठरह शति में *"आधुनिक हिंदी भाषा"* का अविष्कार हुआ. भगवान महावीर का जन्म इ. पु. ५४० है. भगवान बुद्ध का जन्म उनके *"२३ साल पहले"* इ.पु. ५६३ में हुआ. परंतु लुंबिनी में हुयी खुदाई में, डरहम विद्यापीठ के *डॉ रॉबिन कनिंगहॅम* इनके नेतृत्व में संशोधन किया गया. *"कार्बन डेटिंग"* से बुद्ध का जन्म उसके भी *"७० साल पहले इ.पु. ६२४* को बताया गया है. नेपाल के लोग भी बुद्ध का जन्म इ.पु. ६२४ को मानते है. अत: हम *"बुद्ध का जन्म इ.पु. ६२४"* को समझे या नहीं, इस पर निर्णय लेना बहुत जरुरी है. *पालि भाषा* में *"ऋ / श / ष / क्ष / त्र / ज्ञ / र"* यह शब्द नहीं दिखाई देते. जब कि *संस्कृत भाषा* में यह शब्द हमें दिखाई देते है. *सम्राट अशोक* इनके शिलालेखों में *"पियदसि लाजा"* यह संदर्भ दिखाई देते है. अर्थात *"प्रियदर्शी राजा."* आगे जाकर हमें *"र"* यह शब्द दिखाई देता है. और धम्म इस शब्द की व्याख्या का *"अत्तनो सभावं, अत्तनो लख्खनं, धारेति ति धम्मो |"* (अर्थात - जो अपने स्वभाव को धारण करता है, जो अपने लक्षणों को धारण करता है, उसे ही धम्म - धर्म कहते हैं) हमें बोध होता है. *"नागरि लिपि"* शब्द का अविष्कार *"नाग + रि"* अर्थात नाग लोंगों की और *"रि"* यह शब्द *"संबंधकारक शब्द"* है. अत: वैदिक ब्राह्मण यह *"आर्य"* शब्द भी *"हिब्रू संस्कृत"* का परिपाक है.

          ब्राह्मण वर्ग यह *"हिंदु धर्मीय"* नहीं था, इसके प्रमाण हैदराबाद संस्थान के रिकार्ड्स भी देते है. सन १९२४ का *"वैदिक अंक"* भी कराता है. अंग्रेज शासन काल में, ब्राह्मण वर्ग ने *"हिंदु धर्मीयों"* से दुरी बनायी थी. ब्राह्मणी इतिहास यह *"आमने - सामने लढाई"* कराने का दिखाई नहीं देता. ब्राह्मणी *"डी.एन.ए. रिपोर्ट"* भी अलग ही कहानी बयाण करता है. वैज्ञानिक *मायकल बामशाद* इन्होने सन २००१ में, ब्राह्मण वर्ग विदेशी होने का संशोधन किया है. ब्राह्मण वैदिक धर्म का *"उदय इसवी दसवी ग्यारहवी शति"* तो है, परंतु *"ब्राह्मणी युग पतन"* का इतिहास सहजता से दिखाई नहीं देता. ब्राह्मण प्रवृति भी दो भागों में, *"सनातनी ब्राम्हण / प्रगतीशील ब्राह्मण"* विभाजीत की गयी है. विश्व के कुछ प्रमुख सभ्यताओं जिक्र किया जा सकता है. *"सिंधु घाटी सभ्यता* (इ.पु. ३३०० - १७००/ *चायना सभ्यता* (इ.पु. २०७० - १९११) / *मेसोपोटेमिया सभ्यता* (इ.पु.  १०,००० - ५३९) / *इजिप्त नाईल सभ्यता* (इ.पु. ३१०० - ३१००) / *अक्कडियन सभ्यता* (इ.पु. २३५० - २१५०) / *सुमेरियन सभ्यता* (इ.पु. ४५०० - ४०००) / *बेबोलियन सभ्यता* (इ.पु. १७०० - १६००) / *असिरियन सभ्यता* (इ.पु. १००० - ६०९). वही भारत में *"पुर्व सिंधु घाटी सभ्यता "* (इ.पु. ८००० - ३३००) भी हरियाणा के *भिर्राणा / राखीगडी* में हमें दिखाई देती है. फारसी वैज्ञानिक *अलबरुनी* (इसवी ९७३ - १०४८) इन्होने ने उनके संशोधन में, ब्राह्मणी वेद का उल्लेख कही भी नहीं बताया. विदेशी इतिहासकार *मेगस्थनीज* (इ.पु. ३६५) यह सम्राट अशोक दरबार में था. और उसने *"इंडिका"* नामक ग्रंथ लिखा. वहां भी *"ब्राह्मण वर्ग"* होने का कोई प्रमाण नही है. उसने *"सात वर्ग"* का जिक्र किया है. *"विद्वान वर्ग / खेतिहार वर्ग / पशुपालक वर्ग / कारागिर - प्रशासकीय वर्ग / सैनिक वर्ग / दुकानदार वर्ग / गरिब वर्ग."* वही विदेशी इतिहासकार *एरियन"* (इ.पु. ९५ - इसवी १७६) ये भी, उसी संदर्भ की पुष्टी करता है. बुद्ध काल तथा बुद्ध प्रभाव काल में, जाति विभाजन दिखाई नहीं देता. वही विभिन्न *"वंश राज व्यवस्था"* हमें दिखाई देती है. जैसे - *"शाक्य वंश / कोलिय वंश / मौर्य वंश / हरयक वंश / कुषाण वंश‌ / सुंग वंश / सक वंश / गुप्त वंश / पाल वंश."*

           ब्राह्मण वर्ग यह *"विदेशी होने"* का जिक्र तो *बाल गंगाधर तिलक* से लेकरं, बहुत से ब्राह्मण इतिहासकारो ने ही किया है. परंतु *"विदेशी"* होने पर भी, वे कहां से आये है ? इस संदर्भ में विरोधाभास भी है. जैसे - *"सेंट्रल एशिया / सायबेरिया / मंगोलिया / ट्रांसकोकेशिया / स्कैंडेनेलिया / इराण....* कुछ विद्वान वर्ग उन्हे - *"स्टेफि चरवाह"* (गडरिया) श्रेणी से जोडकर उनका व्यवसाय पशुपालन बताया है. बुध्द धर्म यह इ.पु. तिसरी शति में *"हिनयान - महायान संप्रदाय"* विभाजन होने के बाद, इसवी पाचवी शति में महायान ने *"वज्रयान संप्रदाय"* को / इसवी आठवी शति में वज्रयान ने *"तंत्रयान संप्रदाय"* को जन्म दिया. इसवी ८५० (नववी शति) में *शंकर* नामक व्यक्ती का जन्म होकर / वह स्वयं को *"प्रछन्न बौध्द"* कहलाता है. वही इसवी दसवी शति में वज्रयान - तंत्रयान संप्रदाय ने, *"शैव पंथ / वैष्णव पंथ / साक्त पंथ"* को जन्म दिया. अत: *"बुध्द धर्म के अवनति"* का कारण *"संप्रदाय विभाजन"* / तथा *"पंथ को जन्म देना"* भी रहा है. इसके बाद शंकर नामक व्यक्ती ने *इसवी दसवी शती* में, स्वयं को *"आदि शंकराचार्य"* घोषित कर, समस्त *"महायान संप्रदाय बुद्ध विहारों"* पर अधिपत्य किया. और *"चार पीठ"* (शारदा पीठ, गुजरात / श्रृंगेरीपीठ, केरल / ज्योतिर्मठ पीठ, उत्तराखंड / गोवर्धन पीठ, पुरी) की स्थापना की.‌ और उन्ही चार पीठों में *"वेदों की रचना"* की गयी. बुध्द धर्म के सभी संदर्भ *"शिलालेख / ताम्रपट / ताडपत्र"* दिखाई देते है. वही *"ब्राह्मणी वैदिक धर्म"* (इसवी ग्यारहवी शति) के सभी संदर्भ यह *"कागज"* पर अंकित है. *"कागज का शोध"* इसवी दसवी शती में, *"चायना"* देश में लगा. अत: बुद्ध धर्म अवनति का तिसरा - चवथा कारण यह तो, *आदि शंकराचार्य* का उदय / *वैदिक ब्राह्मण धर्म* की स्थापना दिखाई देता है. *पुष्यमित्त सुंग* तो बौध्द राजा था. मौर्य - सुंग वंश संघर्ष यह *"सत्ता संघर्ष"* रहा है. सम्राट अशोक शिलालेख मे कही भी *"ब्राह्मण धर्म / चाणाक्य"* का  संदर्भ नही है. परंतु इतिहास में कही भी, *"ब्राह्मण धर्म अवनति"* का जिक्र हमें दिखाई नहीं देता. यह तो एक बहुत बडी *"मिस्ट्री"* दिखाई देती है. परंतु *"भारत गुलामी का इतिहास"* जरुर दिखाई देता है. भारत में *"विभिन्न राजे - महाराजे सत्ता पद लालसा"* ही भारत के गुलामी नीवं रही है. यहां कौन राजा *"देशभक्त"* था / है ? यह संशोधन का विषय है. फिर वह *"मुगल से लेकरं अंग्रेजो की गुलामी"* क्यौं ना हो ? वह अलग ही इतिहास बयान करता है. अर्थात *"अस्तिन के साप"* या *"देश के गद्दार"* कौन है ? यह आप विचारविद को ही तय करना है. यहां हम *"भारत इतिहास लेखक"* के बुध्दी पर क्या कहे ??? जयभीम !!!


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▪️*डॉ. मिलिन्द जीवने 'शाक्य'*

     नागपुर दिनांक १५ मार्च २०२६