✍️ *सिंधु घाटी सदृश्य सभ्यता हरियाणा के भिर्राणा एवं राखीगडी में तथा तामिलनाडु के कीझाडी एवं शिवगलाई में बनाम ब्रम्हा आदि देवों द्वारा मानव उत्पती के धर्म सिध्दांत की पोलखोल !!!*
*डॉ. मिलिन्द जीवने 'शाक्य',* नागपुर १७
राष्ट्रिय अध्यक्ष, सिव्हिल राईट्स प्रोटेक्शन सेल
एक्स व्हिजिटिंग प्रोफेसर, डॉ बी आर आंबेडकर सामाजिक विज्ञान विद्यापीठ महु मप्र
बुद्ध आंबेडकरी लेखक, कवि, समिक्षक, चिंतक
आंतरराष्ट्रीय परिषदों के संशोधन पेपर परिक्षक
मो.न. ९३७०९८४१३८, ९२२५२२६९२२
सिंधु - हडप्पा घाटी प्राचिन सभ्यता यह *"पंजाब से बलुचिस्तान तक / हरियाणा / राजस्थान / गुजरात / उत्तर प्रदेश"* तक फैली हुयी हमे दिखाई देती है. सिंधु घाटी सभ्यता में *"मेहरगड (पाकिस्तान) / अमरी / किरीगुल / मुहंमद / धोलाविरा / बागोर"* इन क्षेत्रों का जिक्र आता रहता था. आगे जाकर हरियाणा के *"राखीगडी / भिर्राणा"* तथा तामिळनाडू के *"कीझाडी / शिवगोलाई"* इन क्षेत्रों की भी, यहां भर हो गयी. परंतु *"राखीगडी"* क्षेत्र ५००० साल पुराना उन्नत शहर दिखाई देना वही *"भिर्राणा"* यह ७५०० - ८००० पुराना शहर होना, *"सिंधु - हडप्पा घाटी सभ्यता"* ( इ.पु. ३३०० - १९००) से भी प्राचिन होने से, अब संशोधन को एक नया मोड आ गया है. हमारा संशोधन यह *पुर्व सिंधु सभ्यता* (इ.पु. ७७०० - ३३००) / *सिंधु घाटी सभ्यता* (इ.पु. ३३०० - २६००) / *परिपक्व सिंधु सभ्यता* (इ.पु. २६०० - १९००) इसी बिच ही होता रहा. साथ ही *पुरा पाषाण काल* (इ.पु. २५००० - १२०००) / *मध्य पाषाण काल* (इ.पु. १२००० - १००००) / *नवं पाषाण काल* (इ.पु. १०००० - ३३००) / *कांस्य युग* (इ.पु. ३३०० - १२००) / *लौह युग* (इ.पु. १२०० - ५५०) इसी के बिच ही हमारा संशोधन चलता रहा है. मध्य प्रदेश के *"भीमबेटका"* यह स्थली पाषाण युग की साक्ष देता है. मुझे उभी स्थली को, *"मेरे परिवार सहित"* भेट करने का औचित्य मिला. वही भुगर्भ वैज्ञानिक (GSI) *अरुण सोनकिया* इन्होने सन १९८२ में, मध्य प्रदेश के नर्मदा घाटी के *हथनोरा से २.५ - ३ लाख वर्ष पुर्व "मानव खोपडी"* की खोज की. उसे *"नर्मदा मानव"* यह नाम दिया गया. वह नर्मदा मानव *"होमो इरेक्टस नर्मदेसिस"* श्रेणी से संबंधित है. सदर विभाग में मेरे मित्र स्मृतिशेष *माणिक भगत* इनके नियंत्रण पर, *मैंने भुगर्भ (GSI) विभाग म्युझीयम"* को भेट दी थी. और वह *"नर्मदा मानव खोपडी"* को मैने हाथों से पकडे देखा था. अत: यह सभी संशोधन ब्रम्हा आदी सभी धार्मिक देव वर्गो के, *"मानव उत्पत्ती सिध्दांतो"* पर प्रश्न चिन्ह भी कर जाते है. विज्ञान अनुसार *"विश्व का पहिला मानव"* लगबग *"२८ लाख वर्ष पहले आफ्रिका"* में पैदा होना बताया गया. वह *"होमो हैबिलीस"* श्रेणी का, *"दोनो पैरों से चलने की सक्षम प्रजाती"* थी. और *"आफ्रिका"* से ही वह मानव समस्त विश्व में फैल गया. आधुनिक मानव यह *"होमो सेपियंस"* श्रेणी से जुडा हुआ है.
सिंधु घाटी सभ्यता सदृश्य हरियाणा के *"राखीगडी"* में, ५००० साल पुराना बडा *"उन्नत शहर"* / साथ ही ४६०० पुराना *"मानवी कंकाल"* भी मिला. इसी के साथ ही आभुषण बनानेवाली फैक्टरी / किमती पत्थर / सोने चांदी के बर्तन / मुहरे / अग्नि चुल्हे / पक्की इटों के घर / २५ मीटर चौडी सडके / सुनियोजित जल निकामी / तांबे के बर्तन और औजारे / हेराकोटा की मुर्तीया / एक विशिष्ट गोलाकार मुहर पर एक तरफ मगरमच्छ और दुसरी तरफ हडप्पा लिपी अंकित है. वही हरियाणा के *"भिर्रौणा"* में *"हकरा वेयर संस्कृति"* हडप्पा काल सदृश्य तांबे के उपकरण / नृत्य करते हुये लडकी का रेखाचित्र मिला है. इस के साथ भुमीगत आवासिय खाईया (Underground dwelling) मिली, जो मानवी शुरुवाती जीवन को दर्शाती है. विकसित शहरी सभ्यता में मिट्टी के बर्तन (चाकलेट धुसर मिट्टी के पात्र) / तांबे की वस्तुंए (कुल्हाडी - तीर के निशाण) / मनके (Steatite fayence) / पक्की इटों के घर / कृषी जीवन शैली - जले हुये गेहु और जौ की फसल मिली / नगर नियोजन - बहु कक्षीय (Multi roomed) घर मिले, जो उन्नत शहर का बोध कराता है. यह शहर इ. पु. ७५५० - ६२०० का इतिहास बयान करता है. तामिलनाडु के *"कीझाडी / शिवगलाई"* उत्खनन में, सिंधु घाटी सदृश्य इतिहास का बोध होता है. *"कार्बन डेटिंग"* में यह सभ्यता इ.पु. ३२०० की मानी गयी है. जैसे *"सिंधु घाटी सभ्यता"* में *"चक्राकार स्तुप आदि / ध्यानस्थ मानवी मुर्ती / बैठा सिंह / वृषभ / स्वस्तिक चिन्ह"* मिले थे, वैसे प्रमाण हमें यहां दिखाई नहीं देते है. वह *"पहिला बुध्द - ताण्हणकर बुद्ध"* का बोध कराता है. जो बुद्ध परंपरा २८ वे बुद्ध *"शाक्यमुनी बुद्ध"* तक चलते आयी दिखाई देती है. अर्थात *"राखीगडी / भिर्रौणा"* में यह प्रमाण *"आदि जीवन संस्कृति"* का प्रतिक है. परंतु वहां कही भी *"स्टेफी चरवाह DNA"* नहीं दिखाई दिया. अत: ब्राह्मण वर्ग - *"वैदिक ग्रामीण सभ्यता"* का प्रमाण ना मिलना, यह *"ब्राह्मण आर्य सिद्धांत"* पर प्रश्न चिन्ह खडे करते है.
सिंधु घाटी सभ्यता के बाद भारत के और भी संस्कृति का उदय हुआ है. जैसे - *कायथा संस्कृति* (इ.पु. २००० - १८००) / *मालवा संस्कृति* (इ.पु. १७०० - १२००) / *आहर संस्कृति* (इ.पु. २१०० - १५००) / *गैरिक मृदभांड संस्कृति* (इ.पु. २००० - १५००) / *सवालदा संस्कृति* (इ.पु. २००० - १८००) / *चिरांद संस्कृति* (इ.पु. १५०० - ७५०) / *जोखे संस्कृति* (इ.पु. १४०० - ७००) परंतु उन संस्कृति के इतिहास प्रमाण सिमित है. *शाक्यमुनी बुध्द* का प्रभाव और बुध्द धर्म को *"राजाश्रय"* मिलने से, बुध्द युग का उदय दिखाई देता है. *चक्रवर्ती सम्राट अशोक* के अभिलेखों ने, प्राचिन भारत का इतिहास कथन करता है. वह *"अभिलेख"* सात भागों में विभाजित है. *"लघु शिलालेख / भाबरु शिलालेख / कलिंग शिलालेख / बृहद शिलालेख / स्तंभ शिलालेख / लघु स्तंभ शिलालेख / गुफा लेख."* लिपी भी तिन प्रकार की दिखाई देती है. *"चित्र लिपी / भाव लिपी / ध्वनी लिपी."* सिंधु घाटी सभ्यता लिपी अब तक पढी या समजी नहीं गयी. इस के कुछ कारण भी है. बुध्द काल की *"धम्म लिपी"* (ब्राम्ही लिपी) यह पढी गयी है / समझी गयी है.भाषा यह *"मागधी"* रही थी. बुध्द काल के *"हिनयान - महायान विवाद"* में, महायान संप्रदाय ने *"हिब्रु संस्कृत भाषा"* का अविष्कार किया. आज जो संस्कृत दिखाई देती है, वह *"क्लासिकल संस्कृत"* है. *"ब्राम्ही लिपी"* ही भारत के सभी लिपीओं की जननी है. तथा *"बुध्द साहित्य"* यह भारत के सभी साहित्य की जननी है.
ब्राम्ही लिपी का अविष्कार *"इ.पु. सहावी - पाचवी शती"* में हुआ. बुध्द काल में भाषा यह *"मागधी / पालि - प्राकृत भाषा"* थी. बाद में इ. पु. तिसरी - दुसरी शती में, महायान संप्रदाय ने *"हिब्रू संस्कृत भाषा"* का अविष्कार किया. इ. पु पहिली शती - पाचवी शती में *"अपभ्रंश भाषा"* का उदय हुआ. बारावी शती में *"आदि हिंदी भाषा"* का उदय हुआ. पालि प्राकृत भाषा की अंतिम अपभ्रंश अवस्था से ही *"आदि हिंदी भाषा / साहित्य"* का अविर्भाव स्वीकार किया जाता है. और अठरावी शती में *"आधुनिक हिंदी भाषा"* का अविष्कार हुआ. *"देवनागरी लिपी"* का प्रथम स्वरुप इसवी ११०० में और उसका *"प्रारंभ इसवी १७९६"* में दिखाई देता है. लिपी को दो भागों में विभक्त किया जाता है. *उत्तरी धारा* - गुप्त लिपी / कुटिल लिपी / शारदा लिपी / देवनागरी लिपी. *दक्षिणी धारा* - तेलगु / कन्नड / तामिल / कलिंग / ग्रंथ / मध्य देशी / पश्चिमी लिपी. *खरोष्टी लिपी / शंख लिपी* भी प्रयोग में थी. हिनयान - महायान संप्रदाय विभाजन के बाद, पाचवी शती में महायान ने *"वज्रयान"* को, और आठवी शती में वज्रयान ने *"तंत्रयान"* को जन्म दिया. इसवी ८५० में *शंकर* नाम के व्यक्ति का जन्म होता है. उसे *"प्रछन्न बौध्द"* भी कहते हैं. वज्रयान - तंत्रयान ने दसवी शती में, *"शैव पंथ / वैष्णव पंथ / साक्त पंथ"* को जन्म दिया. उस शंकर नाम के व्यक्ति ने, स्वयं को *"आदि शंकराचार्य"* घोषित कर, दसवी शती में *"महायान बुद्ध विहारो"* पर अधिपत्य किया. और चार पिठों की स्थापना की. यही से *"बुद्ध धर्म की अवनती"* दिखाई देती है. ब्राह्मणी धर्म *"वैदिक धर्म"* का उदय होता है. बुध्द धम्म प्रमाण *"शिलालेख / ताम्रपट / ताडपत्र"* पर अंकित है. कागज पर नहीं. *"वेद / उपनिषदे / रामायण / महाभारत यह सभी कागद"* पर ही अंकित है. कागज का शोध *"दसवी शती में चायना"* में लगा. और भारत मे अंधकार युग की शुरुवात !!!
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▪️*डॉ. मिलिन्द जीवने 'शाक्य*
नागपुर' दिनांक १ मार्च २०२६