Saturday, 28 February 2026

 ✍️ *सिंधु घाटी सदृश्य सभ्यता हरियाणा के भिर्राणा एवं राखीगडी में तथा तामिलनाडु के कीझाडी एवं शिवगलाई में बनाम ब्रम्हा आदि देवों द्वारा मानव उत्पती के धर्म सिध्दांत की पोलखोल !!!*

       *डॉ. मिलिन्द जीवने 'शाक्य',* नागपुर १७

राष्ट्रिय अध्यक्ष, सिव्हिल राईट्स प्रोटेक्शन सेल

एक्स व्हिजिटिंग प्रोफेसर, डॉ बी आर आंबेडकर सामाजिक विज्ञान विद्यापीठ महु मप्र 

बुद्ध आंबेडकरी लेखक, कवि, समिक्षक, चिंतक 

आंतरराष्ट्रीय परिषदों के संशोधन पेपर परिक्षक 

मो.न. ९३७०९८४१३८, ९२२५२२६९२२


         सिंधु - हडप्पा घाटी प्राचिन सभ्यता यह *"पंजाब से बलुचिस्तान तक / हरियाणा / राजस्थान / गुजरात / उत्तर प्रदेश"* तक फैली हुयी हमे दिखाई देती है. सिंधु घाटी सभ्यता में *"मेहरगड (पाकिस्तान) / अमरी / किरीगुल / मुहंमद / धोलाविरा / बागोर"* इन क्षेत्रों का जिक्र आता रहता था. आगे जाकर हरियाणा के *"राखीगडी / भिर्राणा"* तथा तामिळनाडू के *"कीझाडी / शिवगोलाई"* इन क्षेत्रों की भी, यहां भर हो गयी. परंतु *"राखीगडी"* क्षेत्र ५००० साल पुराना उन्नत शहर दिखाई देना वही *"भिर्राणा"* यह ७५०० - ८००० पुराना शहर होना, *"सिंधु - हडप्पा घाटी सभ्यता"* ( इ.पु. ३३०० - १९००) से भी प्राचिन होने से, अब संशोधन को एक नया मोड आ गया है. हमारा संशोधन यह *पुर्व सिंधु सभ्यता* (इ.पु. ७७०० - ३३००) / *सिंधु घाटी सभ्यता* (इ.पु. ३३०० - २६००) / *परिपक्व सिंधु सभ्यता* (इ.पु. २६०० - १९००) इसी बिच ही होता रहा. साथ ही *पुरा पाषाण काल* (इ.पु. २५००० - १२०००) / *मध्य पाषाण काल* (इ.पु. १२००० - १००००) / *नवं पाषाण काल* (इ.पु. १०००० - ३३००) / *कांस्य युग* (इ.पु. ३३०० - १२००) / *लौह युग* (इ.पु. १२०० - ५५०) इसी के बिच ही हमारा संशोधन चलता रहा है. मध्य प्रदेश के *"भीमबेटका"* यह स्थली पाषाण युग की साक्ष देता है. मुझे उभी स्थली को, *"मेरे परिवार सहित"* भेट करने का औचित्य मिला. वही भुगर्भ वैज्ञानिक (GSI) *अरुण सोनकिया* इन्होने सन १९८२ में, मध्य प्रदेश के नर्मदा घाटी के *हथनोरा से २.५ - ३ लाख वर्ष पुर्व "मानव खोपडी"* की खोज की‌. उसे *"नर्मदा मानव"* यह नाम दिया गया. वह नर्मदा मानव *"होमो इरेक्टस नर्मदेसिस"* श्रेणी से संबंधित है. सदर विभाग में मेरे मित्र स्मृतिशेष  *माणिक भगत* इनके नियंत्रण पर, *मैंने भुगर्भ (GSI) विभाग म्युझीयम"* को भेट दी थी. और वह *"नर्मदा मानव खोपडी"* को मैने हाथों से पकडे देखा था. अत: यह सभी संशोधन ब्रम्हा आदी सभी धार्मिक देव वर्गो के, *"मानव उत्पत्ती सिध्दांतो"* पर प्रश्न चिन्ह भी कर जाते है. विज्ञान अनुसार *"विश्व का पहिला मानव"* लगबग *"२८ लाख वर्ष पहले आफ्रिका"* में पैदा होना बताया गया. वह *"होमो हैबिलीस"* श्रेणी का, *"दोनो पैरों से चलने की सक्षम प्रजाती"* थी. और *"आफ्रिका"* से ही वह मानव समस्त विश्व में फैल गया. आधुनिक मानव यह *"होमो सेपियंस"* श्रेणी से जुडा हुआ है.

            सिंधु घाटी सभ्यता सदृश्य हरियाणा के *"राखीगडी"* में, ५००० साल पुराना बडा *"उन्नत शहर"* / साथ ही ४६०० पुराना *"मानवी कंकाल"* भी मिला. इसी के साथ ही आभुषण बनानेवाली फैक्टरी / किमती पत्थर / सोने चांदी के बर्तन / मुहरे / अग्नि चुल्हे / पक्की इटों के घर / २५ मीटर चौडी सडके / सुनियोजित जल निकामी / तांबे के बर्तन और औजारे / हेराकोटा की मुर्तीया / एक विशिष्ट गोलाकार मुहर पर एक तरफ मगरमच्छ और दुसरी तरफ हडप्पा लिपी अंकित है. वही हरियाणा के *"भिर्रौणा"* में *"हकरा वेयर संस्कृति"* हडप्पा काल सदृश्य तांबे के उपकरण / नृत्य करते हुये लडकी का रेखाचित्र मिला है. इस के साथ भुमीगत आवासिय खाईया (Underground dwelling) मिली, जो मानवी शुरुवाती जीवन को दर्शाती है. विकसित शहरी सभ्यता में मिट्टी के बर्तन (चाकलेट धुसर मिट्टी के पात्र) / तांबे की वस्तुंए (कुल्हाडी - तीर के निशाण) / मनके (Steatite fayence) / पक्की इटों के घर / कृषी जीवन शैली - जले हुये गेहु और जौ की फसल मिली / नगर नियोजन - बहु कक्षीय (Multi roomed) घर मिले, जो उन्नत शहर का बोध कराता है. यह शहर इ. पु. ७५५० - ६२०० का इतिहास बयान करता है. तामिलनाडु के *"कीझाडी / शिवगलाई"* उत्खनन में, सिंधु घाटी सदृश्य इतिहास का बोध होता है. *"कार्बन डेटिंग"* में यह सभ्यता इ.पु. ३२०० की मानी गयी है. जैसे *"सिंधु घाटी सभ्यता"* में *"चक्राकार स्तुप आदि / ध्यानस्थ मानवी मुर्ती / बैठा सिंह / वृषभ / स्वस्तिक चिन्ह"* मिले थे, वैसे प्रमाण हमें यहां दिखाई नहीं देते है. वह *"पहिला बुध्द - ताण्हणकर बुद्ध"* का बोध कराता है. जो बुद्ध परंपरा २८ वे बुद्ध *"शाक्यमुनी बुद्ध"* तक चलते आयी दिखाई देती है. अर्थात *"राखीगडी / भिर्रौणा"* में यह प्रमाण *"आदि जीवन संस्कृति"* का प्रतिक है. परंतु वहां कही भी *"स्टेफी चरवाह DNA"* नहीं दिखाई दिया‌. अत: ब्राह्मण वर्ग - *"वैदिक ग्रामीण सभ्यता"* का प्रमाण ना मिलना, यह *"ब्राह्मण आर्य सिद्धांत"* पर प्रश्न चिन्ह खडे करते है.

         सिंधु घाटी सभ्यता के बाद भारत के और भी संस्कृति का उदय हुआ है. जैसे - *कायथा संस्कृति* (इ.पु. २००० - १८००) / *मालवा संस्कृति* (इ.पु. १७०० - १२००) / *आहर संस्कृति* (इ.पु. २१०० - १५००) / *गैरिक मृदभांड संस्कृति* (इ.पु. २००० - १५००) / *सवालदा संस्कृति* (इ.पु. २००० - १८००) / *चिरांद संस्कृति* (इ.पु. १५०० - ७५०) / *जोखे संस्कृति* (इ.पु. १४०० - ७००) परंतु उन संस्कृति के इतिहास प्रमाण सिमित है. *शाक्यमुनी बुध्द* का प्रभाव और बुध्द धर्म को *"राजाश्रय"* मिलने से, बुध्द युग का उदय दिखाई देता है. *चक्रवर्ती सम्राट अशोक* के अभिलेखों ने, प्राचिन भारत का इतिहास कथन करता है. वह *"अभिलेख"* सात भागों में विभाजित है. *"लघु शिलालेख / भाबरु शिलालेख / कलिंग शिलालेख / बृहद शिलालेख / स्तंभ शिलालेख / लघु स्तंभ शिलालेख / गुफा लेख."* लिपी भी तिन प्रकार की दिखाई देती है. *"चित्र लिपी / भाव लिपी / ध्वनी लिपी."* सिंधु घाटी सभ्यता लिपी अब तक पढी या समजी नहीं गयी. इस के कुछ कारण भी है. बुध्द काल की *"धम्म लिपी"* (ब्राम्ही लिपी) यह पढी गयी है / समझी गयी है.भाषा यह *"मागधी"* रही थी. बुध्द काल के *"हिनयान - महायान विवाद"* में, महायान संप्रदाय ने *"हिब्रु संस्कृत भाषा"* का अविष्कार किया. आज जो संस्कृत दिखाई देती है, वह *"क्लासिकल संस्कृत"* है. *"ब्राम्ही लिपी"* ही भारत के सभी लिपीओं की जननी है. तथा *"बुध्द साहित्य"* यह भारत के सभी साहित्य की जननी है.

          ब्राम्ही लिपी का अविष्कार *"इ.पु. सहावी - पाचवी शती"* में हुआ‌. बुध्द काल में भाषा यह *"मागधी / पालि - प्राकृत भाषा"* थी. बाद में इ. पु. तिसरी - दुसरी शती में, महायान संप्रदाय ने *"हिब्रू संस्कृत भाषा"* का अविष्कार किया. इ. पु पहिली शती - पाचवी शती में *"अपभ्रंश भाषा"* का उदय हुआ. बारावी शती में *"आदि हिंदी भाषा"* का उदय हुआ. पालि प्राकृत भाषा की अंतिम अपभ्रंश अवस्था से ही *"आदि हिंदी भाषा / साहित्य"* का अविर्भाव स्वीकार किया जाता है. और अठरावी शती में *"आधुनिक हिंदी भाषा"* का अविष्कार हुआ‌. *"देवनागरी लिपी"* का प्रथम स्वरुप इसवी ११०० में और उसका *"प्रारंभ इसवी १७९६"* में दिखाई देता है. लिपी को दो भागों में विभक्त किया जाता है. *उत्तरी धारा* - गुप्त लिपी / कुटिल लिपी / शारदा लिपी / देवनागरी लिपी. *दक्षिणी धारा* - तेलगु / कन्नड / तामिल / कलिंग / ग्रंथ / मध्य देशी / पश्चिमी लिपी. *खरोष्टी लिपी / शंख लिपी* भी प्रयोग में थी. हिनयान - महायान संप्रदाय विभाजन के बाद, पाचवी शती में महायान ने *"वज्रयान"* को, और आठवी शती में वज्रयान ने *"तंत्रयान"* को जन्म दिया. इसवी ८५० में *शंकर* नाम के व्यक्ति का जन्म होता है. उसे *"प्रछन्न बौध्द"* भी कहते हैं. वज्रयान - तंत्रयान ने दसवी शती में, *"शैव पंथ / वैष्णव पंथ / साक्त पंथ"* को जन्म दिया. उस शंकर नाम के व्यक्ति ने, स्वयं को *"आदि शंकराचार्य"* घोषित कर, दसवी शती में *"महायान बुद्ध विहारो"* पर अधिपत्य किया. और चार पिठों की स्थापना की. यही से *"बुद्ध धर्म की अवनती"* दिखाई देती है. ब्राह्मणी धर्म *"वैदिक धर्म"* का उदय होता है. बुध्द धम्म प्रमाण *"शिलालेख / ताम्रपट / ताडपत्र"* पर अंकित है. कागज पर नहीं. *"वेद / उपनिषदे / रामायण / महाभारत यह सभी कागद"* पर ही अंकित है. कागज का शोध *"दसवी शती में चायना"* में लगा. और भारत मे अंधकार युग की शुरुवात !!!


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▪️*डॉ. मिलिन्द जीवने 'शाक्य*

     नागपुर' दिनांक १ मार्च २०२६

Thursday, 26 February 2026

 👌*बुद्ध सागर है...!*

      *डॉ. मिलिन्द जीवने 'शाक्य'* नागपुर 

      मो. न. ९३७०९८४१३८


शीतल चंद्र किरण छाया करुणा बादल है

हमारे भीम बाबा के विचार बुध्द सागर है...


सुर्य का वलय यही भीम बाबा का साद है

चांदणी की कोमलता बुध्द का वो नाद है

ये प्रेम मैत्री बंधुता ही बुध्द आगाज वाद है

चार आर्य सत्य ही बुध्द विचार का सत्य है...


भीम का बुध्द ओर जाना कल्याण वाद है

पंचशील अष्टशील अष्टांग मार्ग वो साद है

शांती अहिंसा कारण ही सब कुछ मंगल है

समस्त विश्व बौद्धमय होने का वही नाद है


ये प्रज्ञा शील करुणा ही मानव का मुल्य है

बुद्ध शुण्यवाद से संसार का आरंभ रचा है

कार्यकारणभाव ही बुध्द का नीति शास्त्र है 

प्रतित्यसमुत्पाद बीना कुछ भी संभव नहीं है...


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नागपुर दिनांक २७ फरवरी २०२६

(बुद्ध साहित्य में प्रेम - मैत्री - सौंदर्यशास्त्र

-- नैतिकवाद - निसर्ग)

Sunday, 22 February 2026

 ✍️*हिंदु धर्म रक्षणार्थ तिन बच्चे पैदा करो यह संघप्रमुख डॉ. मोहन भागवत का आवाहन और खंडमय भारत की आर्थिक - सामाजिक - राजकीय स्थिती अवलोकन !*

       *डॉ. मिलिन्द जीवने 'शाक्य'*, नागपुर १७

राष्ट्रिय अध्यक्ष, सिव्हिल राईट्स प्रोटेक्शन सेल 

एक्स व्हिजिटिंग प्रोफेसर, डॉ बी आर आंबेडकर सामाजिक विज्ञान विद्यापीठ महु मप्र 

बुद्ध आंबेडकरी लेखक, कवि, समिक्षक, चिंतक 

आंतरराष्ट्रीय परिषद का संशोधन पेपर परिक्षक 

मो. न. ९३७०९८४१३८, ९२२५२२६९२२


           लखनौ. उत्तर प्रदेश के सरस्वती शिशु मंदिर में आयोजित कार्यक्रम में सरसंघचालक डॉ मोहन भागवत के एक बयाण ने भारत में तुफान मचाया है. वह बयाण है - *"हिंदुओं ने तिन बच्चों को जन्म चाहिए."* मैं पिछले दो दिनों से इस बयान पर सोच रहा था. आगे भी डॉ मोहन भागवत बोल गये है. वह बयाण ही देखे. *"हिंदु धर्म को कोई भी धोका नहीं है. फिर भी सावध होकर घटती हुयी जनसंख्या पर, चिंता जतायी है. आमिष लेकरं धर्मांतरण पर भी बोल गये. भारत के घटते हुये प्रजनन दर के कारण भविष्य में नष्ट होने की बात कही है. विद्यापीठ अनुदान आयोग के नविन मार्गदर्शक तत्व संदर्भ में, कानुन के पालन की बात कही है. कानुन में त्रृटी हो तो, कानुन सुधार की भी बात कही है."* यह सभी विषय भारत के संदर्भ में हमें सोचने पर, मजबुर कर रहे है. इसके पहले *डॉ मोहन भागवत* इनका इंदौर (मध्य प्रदेश) का भाषण, तत्कालीन लोकसभा अध्यक्ष *सुमित्रा महाजन* इनकी प्रमुख उपस्थिती में, मुझे याद आ गया. इंदौर सभा में डॉ भागवत बोल गये थे - *"विवाह यह एक करार है. औरत का काम आदमी को खुश करना है. उसके बदले आदमी उसका भरण - पोषण करेगा."* अत: यह दोनो बयाण में मरना कहे या पिडित होना - *"स्त्री ही दिखाई देती है."*  अत: भारतीय संविधान के *"अनुच्छेद १४ - १८ : समानता अधिकार"* का क्या होगा ? यह भी प्रश्न उत्पन्न हो गया है. अत: संघप्रमुख *डॉ मोहन भागवत* इनके बयान पर, हम कुछ बिंदुओं पर चर्चा करेंगे.

         सबसे पहले हमें समझना होगा कि, *"राष्ट्रिय स्वयंसेवक संघ"*(RSS) के कार्यकर्ता ब्याह (विवाह) नहीं रचाते. उनका *"ब्रम्हचर्य पालन"* यह संदर्भ संशोधन का विषय भी हो सकता है. अब हम भारत का *"जनसंख्या दर"* देखेंगे. भारत की *"जनसंख्या १४५.०९ करोड"* अर्थात विश्व का नंबर वन देश है. नंबर दो पर *"चायना - १४१ करोड"* है और *"विश्व की जनसंख्या ८.२ से ८.३ अरब"* है. जनसंख्या मामलों में उत्तर प्रदेश / बिहार राज्य आघाडी पर है. वही *"दक्षिण भारत"* ने जनसंख्या दर पर, नियंत्रण पाया भी है. परंतु जनसंख्या अनुपात में *"लोकसभा सांसद बढोत्तरी"* यह विषय भारत के *"तिन तुकडे"* (उत्तरी भारत / दक्षिणी भारत / पश्चिमोत्तर भारत) होने का बडा विवाद भी भविष्य में हो सकता है. *"कुटुंब नियोजन कार्यक्रम"* (Family Planning) द्वारा प्रजनन दर पर अंकुश लगाया गया है. और *"प्रजनन दर (TFR) में २% से घटकर १.९%"* लाने में, हम ने सफलता पायी है. परंतु इस अंकुश को समाधानकारक नहीं कहा जा सकता. *"प्रजनन दर"* पर हम पुर्णतः स्थिरता लाने में सफलता नहीं पा सके. अत: संघप्रमुख *डॉ. मोहन भागवत* का वह बयाण हमारे देश के लिये चिंता का विषय है.

        *"जनसंख्या दर वृध्दी"* (Population Control) की बहुत बडी समस्या, भी हमारे सामने खडी है. एक है *"गरिबी"* (Poverty) और दुसरी है *"बेरोजगारी"* (Unemployment). अभी हम केवल दो विषयों पर ही चर्चा करेंगे. सन २०२६ को *नीति आयोग तथा UNDP* के अनुसार, भारत का *"गरिबी दर सन २०१३ - १४ के मुकाबले २९.१७% से घटकर आज ११.२८%"* बताया जा रहा है. तथा *"अत्याधिक गरिबी दर ५.३%"* ही बताया जा रहा है. वही दुसरी ओर भारत शासन रिपोर्ट के अनुसार *"प्रधानमंत्री कल्याण अन्न योजना में ८१.३५ करोड (५६.१०%)"* में लाभार्थी है. वही *"अन्य लोग अन्न योजना लाभार्थी को मिलाये तो अंदाजे ८०% लाभार्थी"*  दिखाई देते है. अत: *"नीति आयोग तथा UNDP के आकडों"* पर संदेह होना स्वाभाविक है. वही *"विश्व का गरिबी ८०८ मिलियन"* (४७%) बतायी गयी है. वही *"बेरोजगारी"* (Unemployment) को भी देखें. भारत का *"बेकारी दर २०२६ - ५.९५% तथा २०२५ - ४.८%"* बताया गया है. आंतरराष्ट्रीय संघटन (ILO)  अनुसार *"विश्व का बेरोजगारी दर ४  ९%"*  बताया गया है. जो हमारे लिये चिंता का विषय है.

       भारत का *"साक्षरता दर"* (Literacy) सन २०११ - ७४% तुलना में *"बढकर ८०.९%"* बताया गया है. पुरुष दर ८२.१४% तथा स्त्री दर ६५.४६% बताया गया है. इसमें उत्तर प्रदेश / बिहार राज्य भी पिछडा हुआ है. अर्थात GDP तुलना में *"विकास दर ८.२%"* यह बतायी गयी है. वही भारत पर *"सरकारी ऋण"* (Public Debt) सकल घरेलु उत्पाद (GDP) से लगबग *"८१.९%"* है. जो विश्व में १७ वे स्थान पर है. आंतरिक बनाम बाहरी - *"कुल सार्वजनिक ऋण ९६.५९%"* तथा *"विदेशी ऋण ३ ४१%"* दिखाई देता है. अर्थात *"प्रति व्यक्ती ऋण ४.८ लाख"* तक है. भारत का ऋण GDP अनुपात ८१.९% बताया गया है. इस से हम भारत की आर्थिक - सामाजिक - राजकिय स्थिती का बोध, सहजता से कर सकते हैं. *"विद्यापीठ अनुदान आयोग"* विषय पर, पहले बार ही *"ब्राह्मण आंदोलन"* हुआ है. ब्राह्मणी मक्तेदारी चल रही थी. उस पर रोक लगाना जरुरी था. *"सुप्रीम कोर्ट"* ने ब्राह्मण वर्ग को राहत दी है या नहीं ? यह संशोधन का विषय है. इस में हम ने वह विषय, तथा *"अस्पृश्यता / मागासवर्गीय स्थिती / स्त्री शोषण / न्यायालय - सत्ताशाही - नौकरशाही मनमानी"* यह संदर्भ जोडे नहीं है. अगर यह मोटा मोटी भारत की स्थिती देखे तो, *"तिन बच्चे पैदा करने"* के बाद, होने वाले भयानक समस्या की हम कल्पना ही नहीं कर सकते.


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▪️*डॉ. मिलिन्द जीवने 'शाक्य'*

     नागपुर दिनांक २३ फरवरी २०२६

Friday, 20 February 2026

 👌*औदुंबर पिपल की छा़व में !*

      *डॉ. मिलिन्द जीवने 'शाक्य'*

      मो. न. ९३७०९८४१३८


मेरा रोज का बसेरा

औदुंबर पिपल की छा़व में 

मुझे बहुत सुकून देता है 

निसर्ग की अपनी छाया

उन दोनो बोधीवृक्षों पर 

हमेशा से ही रही है 

बुद्धत्व के महान प्राप्ती 

अठ्ठावीस बुद्ध को

उन दो वृक्षों की छाया में

होने का एक इतिहास है

और मेरा बसेरा भी

उन वृक्षों की छाव में होना

वह एक प्रत्यक्ष साक्ष है

सुकुन की अनुभूती देता है ....

मेरे बगिचें में

अपने झुलें पर बैठकर

उन वृक्षों को न्हाहारता हुं

बगिचें के विभिन्न फुलों सें

विभिन्न फ़ल झाडों से 

बातें भी करते रहता हुं

विभिन्न रंग बिरंगी पक्षी

विभिन्न तितलीयों से 

सच्चे मन से प्यार करता हुं

वों भी प्यार करते है

बगिचें की सुंदर हरियाली

उनकी भी देखभाल करना 

मुझे अच्छा लगता है

बडा आनंद भी आता है

उन निसर्ग के सानिध्य में

जो अन्य कहीं सें भी मिलना

परम पावन मन भाव में

इतना सहज भी नहीं हैं....


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नागपुर दिनांक २१ फरवरी २०२६

Thursday, 19 February 2026

 👌*राणी वदुनी...!*

      *डॉ. मिलिन्द जीवने 'शाक्य'*

       मो. न. ९३७०९८४१३८


राणी वदुनी इतिहासाला तु साक्ष व्हावी

बुध्द चरणी लीन होतांना ती याद यावी...


वाटा पळवाटा जातांना रे ती साद यावी

जंगलाची ती हिरवी वनराई नाद व्हावी

उजाड वातावरणा ना मनात काहुर यावी

बुध्द विहाराच्या प्रवेशाने ती शांती व्हावी...


इतिहास भिंतीवर तुझी रे ती याद यावी

प्रेमाच्या अंकुरातुन तुझी ती साद व्हावी

तुझ्या वेदनांना ना ती पुन्हा पालवी यावी

दु:ख मुक्तीच्या चक्राला बुध्द गती व्हावी...


कमळाच्या कोमलतेची मधुर धार यावी

द्वेष पिकाची ती उगवण पुर्ण नाश व्हावी

मैत्रीच्या भावनेला बुध्दाची ती गती यावी

करुणेची ती शांती अहिंसा भावना व्हावी...


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नागपूर, दिनांक १८ फेब्रुवारी २०२६

(बुद्ध साहित्यातील प्रेम - सौंदर्यशास्त्र)

Sunday, 15 February 2026

 👌*मेरी चित्र कविता !* (आम्रपाली)

     (बुद्ध साहित्य में प्रेम - सौंदर्यशास्त्र - 

     स्त्री वेदना - स्त्री स्वातंत्र्य)

      *डॉ. मिलिन्द जीवने 'शाक्य'*

      मो. न. ९३७०९८४१३८


लावारीश होते भी युं पाया है गोद में 

कमल की कोमलता दिखी तेरे रुप में

लिच्छवी कानुन से तडपा रहा बाप युं 

आखिर वही तो बन गयी नगरवधु तु...


तेरा जलव़ा युं तो बिखरा रहा है आसमां में 

वो आते रहे थे बडे दिवाने युं तेरे दरबार में 

हुश्न की मल्लिका केवल तुम थी वैशाली में

तेरे प्यार की नशा तो हर किसी धडकन में...


अरें  युं तुम तो बंध गयी थी प्यार बंधन में 

प्यार का सावन तो युं ना था तेरे जीवन में 

सम्राट तो राणी देखना चाहता था मगध में

मगर गम की छाया वो आ गयी आसमां में...


युं तुम निकल पडी शांती की तलाश में 

बुद्ध की भेट थी तेरे ही उस आम्रवन में 

युं सब कुछ दान किया संघ के हाथों में 

तुम तो पहुंच गयी बुद्ध अर्हत श्रेणी में...


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नागपुर दिनांक १६ फरवरी २०२६

Friday, 13 February 2026

 🌹*आई रमाई....!*

    ‌‌ *डॉ. मिलिन्द जीवने 'शाक्य'*

     मो.न. ९३७०९८४१३८


आई रमाई 

तुझ्या स्व-वेदनांचा

दु:खाचा इतिहास डोंगर

हा खुप मोठा आहे 

राजरत्न बाळाचे जाणे

आणि खिशात दमडी नाही

बाबांची द्विधा मनस्थिती

तु जाणनारी डॉक्टर झालीस

आई, तु दारिद्री भांडवल

कधीही केले नाहीसं

लुगड्याचा पदर फाडुन

कफनाची तजबीज करुन

परिवाराची लाज राखलीसं...

आमचे बाबा

उच्च शिक्षण घेण्यास

विदेशात गेले असतांना

अगदी भल्या पहाटे

तु शेण गोळा करण्यास

आणि गोव-या थापण्यास

घरा बाहेर जात होतीस गं

अर्ध उपाशी पोटी राहतांना

मिळणारा तो घामाचा पैसा

बाबांच्या शिक्षणाला

तु पाठवित होतीस

आणि अश्या परिस्थितीत 

तुझ्या गोंडस बाळाने 

जगाचा निरोप घेतला

ही गोष्ट बाबांना लपवितांना

शिक्षणात खंड होवु नये

हा तुझा उदात्त विचार

तु हृदयावर ठेवलेला दगड

मला असह्य करुन जातो...

बाबा गोलमेज परिषदेला

विदेशात जात असतांना

बोटींपर्यंत सोडायला आलीस

जनसागरांचा निरोप

तुझ्या नयनी आलेले अश्रु

बाबासाहेबांचे तुझे नावे पत्र

तुझ्या प्रेमाचा सागर

हा असंख्य जन मनांचा

राजा झाला तेव्हा

बाबांच्या सत्काराला जाण्यास

घालायला नविन लुगडे नाही

म्हणुन तु काही बहाणा करुन

बाबा सोबत गेली नाहीसं

आणि बाबा गेल्यावर

छत्रपती शाहु महाराजांनी

बाबांना दिलेला पागोटा घालुन

दुरूनचं सत्कार बघत होतीसं

माते, तु इतकी मन ऊर्जा

कुठुन आणली होतेस गं...

आई, तुझ्या सौंदर्याची गाथा

आणि प्रेमाचा इतिहास

लिहिण्यास माझ्याकडे 

शब्दांचे भांडार नाही गं

माझी ती लायकी ही नाही

तुझ्या चरण धुळी एवढी

तुझ्या प्रेम त्याग समर्पणाला

आजची लेक असो वा लेकी

ह्या विसरुन गेल्या आहेत

केवळ पोवाडे गायिले जातात

आजची ही पिढी

कुणी फॅशनमध्ये मस्त आहे 

कुणी आलिशान राहाणीत

कुणी साधना करण्यात

कुणी फसवणुक करण्यात

कुणी वेश्या राजकारणात 

तर कुणी वेगवेगळ्या गैर मार्गात

ती कल्पनाचं न केलेली बरी

तुझ्या प्रेम सागरांनी

दिलेला बुध्दाचा धम्म वसा

केवळ पुस्तकात बंदिस्त आहे

आजच्या ह्या बाजारु जगात !!!


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*डॉ. मिलिन्द जीवने 'शाक्य'*

नागपूर दिनांक १३ फेब्रुवारी २०२६