Thursday, 30 July 2026

 ✍️ *द्वितिय महायुध्द : क्रुर तानाशाह हिटलर - मुसोलिनी - एवं डाँ. बाबासाहेब आँबेडकर - मोहनदास गांधी - पंडित जवाहरलाल नेहरु - सुभाषचंद्र बोस इनसे लेकर आजाद भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तक का सफरनामा एवं भाजपा संघवादी पुंजीवाद - तानाशाही बनाम जेन झी का (सत्याग्रह) आंदोलन !*

        *डॉ. मिलिन्द जीवने 'शाक्य'* नागपुर १७

राष्ट्रिय अध्यक्ष, सिव्हिल राईट्स प्रोटेक्शन सेल

एक्स व्हिजिटींग प्रोफेसर, डॉ बी आर आंबेडकर सामाजिक विज्ञान विद्यापीठ, महु म.प्र.

एक्स मेडिकल आँफिसर एंड हाऊस सर्जन

बुध्द आंबेडकरी लेखक, कवि, समिक्षक, चिंतक

अध्यक्ष - आयोजक, जागतिक बौध्द परिषद (नागपुर) वर्ष २००६, २०१३, २०१४, २०१५

आंतरराष्ट्रिय परिषदों के संशोधन पेपर परिक्षक

मो.न. ९३७०९८४१३८, ९८९०५८६८२२


               द्वितीय महायुध्द (१ सितंबर १९३९ से २ सितंबर १९४५) खलनायक जर्मनी के क्रुर तानाशाह *एडाल्फ हिटलर* तथा इटली के क्रुर तानाशाह *बेनिटो मुसोलिनी* इनकी तुलना भारत के प्रधानमंत्री *नरेंद्र मोदी* / केंद्रीय गृहमंत्री *अमित शहा* इनसे करे या नही ??? यह तो एक संशोधनात्मक प्रश्न है. तत्कालीन प्रधानमंत्री *इंदिरा गांधी* इन्होने भारत मे जो *"आपातकाल"* (Emergency) लगाई थी, उसका संदर्भ *"भारतीय संविधान अनुच्छेद ३५२ से लेकर ३६०"* से जुडा है. भारत के राष्ट्रपति इनके सही से *"आपातकाल"* वह घोषित किया गया था. परंतु नरेंद्र मोदी सरकार ने *"अघोषित आपातकाल"* (Undeclared Emergency) भारत पर लादी है, उसका क्या ? भारत मे *"स्पर्धा परिक्षा"* पेपर लिक कारण *"२२ छात्रों की आत्महत्या"* / किसान आंदोलन मे *"६०० के उपर किसान वर्ग की मृत्यु"* / मणीपुर राज्य की *"बर्बरता"* और ऐसे अनगिणत संदर्भ दिये जा सकते है. नयी दिल्ली  जंतर मंंतर *छात्र जेन झी काँकरोच आंदोलन"* (सत्याग्रह) २०२६ ने दिल्ली पुलिस / सीआरपीएफ जवान (सरकारी गुंडे) / संघवाद के बिन-सरकारी गुंडो की बर्बरता - *"लाठीचार्ज - अश्रुगोले - छांत्रों के कपडे फाडना - छात्रों के उपरी भाग पर स्पर्श करना - छात्रों के पिछवाडों दंडा घुसाना"* इसके बारे मे सुनकर / देखकर, सरकार के प्रति कोई भी संवेदनशील व्यक्ति *"घृणा / नफरत"* भाव प्रदर्शीत करेगा. हिटलर / मुसोलिनी काल मे *"द्वितीय महायुध्द"* चल रहा था. नरेंद्र मोदी काल में *"कोरोना महायुध्द"* से बाहर निकलते हुये हम *'आर्थिक महायुध्द"* से जुझ रहे है. अमेरिका *"एप्स्टीन फाईल - लडकीयों से कृष्णलीला"* इसमे नरेंद्र मोदी इनका नाम है या नही ? या *"चायना - अमेरिका"* इन देशों के शासकों के पास *"नरेंद्र मोदी कृष्णलीला फोटो"* उपलब्ध है या नही ? यह भी सँशोधनात्मक विषय है. परंतु नरेंद्र मोदी उन देशों के शासक समक्ष *"नतमस्तक"* होना / आजाद भारत की *"आर्थिक व्यवस्था खस्तहाल"* होना / भारत की अर्थव्यवस्था डामाडोल होने पर भी, *"सत्तावाद खामोशी"* / आजाद (?) भारत की *"गरिबी - बेरोजगारी"* / सरकारीकरण का *"खाजगीकरण"* हो जाना / भारत *"पुंजीवाद - तानाशाह"* (Capitalism - Dictatorship) दिशा की ओर बढ जाना / *"प्रजातंत्र"* (Democracy) की कबर ?दिखना और बडी लंबी यादी है. भारत के *'प्रादेशिक राजनितिक दल शक्ति"* खत्म हो चुकी है. *"विरोधी दल - काँग्रेस"* भी उतना प्रभावी ना होना / कांग्रेस राजकुमार *राहुल गांधी* इनका संविधानिक *"भारत राष्ट्रवाद"* यह भी एक प्रश्न है. राहुल तो देश को *"हिंदु धर्मवाद"* से जोडकर *"हिंदुस्तान"* कह रहा है. जब कि मा. सर्वोच्च न्यायालय अपने निर्णय में *"हिंदु यह धर्म नही. जीवन जीने की कला है"* कहता है. वैसे तो *"सर्वोच्च न्यायालय सत्ता रखेल"* हो जाना / *"सर्वोच्च न्यायालय*" द्वारा भारतीय *"संविधान वाँचडाँग"* से दुर भागना / संघववाद नायक *डाँ मोहन भागवत* इन्होने, कर्नाटक राज्य गृहमंत्री *प्रियांक खडगे* इनके दिये उत्तर में, *"हिंदु धर्म पंजीकृत नही"* है तो, *"RSS"* पंजीकृत होना आवश्यक नही, यह कहा है. अर्थात भारत की *"दिशा - दशा - अवदशा"* यह संदर्भ बहुत कुछ कथन कर गया है.

             हिटलर (जर्मनी) द्वारा *"पोलंड"* देश पर आक्रमण में, *रशिया* (जोसेफ स्टलिन) हिटलर के साथ साथ ही सहभागी था. परंतु हिटलर की *"सत्ता भुभाग विस्तारीकरण भुख"* ने, हिटलर द्वारा *"रशिया"* देश पर आक्रमण ने, *"द्वितीय महायुध्द"* दो भागों में बट गया. *"मित्र राष्ट्र और धुरी राष्ट्र. "* मित्र राष्ट्र पक्ष में *"रुस (जोसेफ स्टँलिन) / अमेरिका (फँकलिन डेलोनो रुझवेल्ट) / ब्रिटिश (विस्टन चर्चील) / चायना (चियांग काई शेक - माओ)"* और अन्य कुछ देश एक साथ खडे थे. तो धुरी राष्ट्र पक्ष में *"हिटलर (जर्मनी) / मुसोलीनी (इटली) / हिराहितो (जापान)"* यह तिन देश एकसाथ खडे थे. हिटलर - मुसोलीनी - हिराहितो ये *"नाजीवाद / फासीवाद / झारशाही"* के प्रतिक रहे है. द्वितीय महायुध्द मे *"धुरी राष्ट्र"* की हार हुयी तो *"मित्र राष्ट्र"* की जीत हुयी. द्वितीय महायुध्द में हिटलर की प्रेमिका *इव्हा ब्राऊन* / मुसोलीनी की प्रेमिका *क्लारा पेटाची* उनका साथ उनके मृत्यु तक रहा. इटली के विद्रोही द्वारा *मुसोलीनी - क्लारा पेटाची* इनको (२८ अप्रेल १९४५) गोली से छलनी कर, उनका *"शव चौराह पर लटका"* दिया. यह दुर्दर खबर सुनने के बाद *हिटलर - इव्हा ब्राऊन* इन्होने, जमिन के निचे खंदक मे ही *"स्वयं को गोली मारकर"* (३० अप्रेल १९४५) आत्महत्या की. और क्रुर तानाशाह का अंत ऐसा भयानक हुआ. उधर द्वितीय महायुध्द मे *अमेरिका* द्वारा जापान के *"हिरोशिमा*" (६ अगस्त १९४५) तथा *"नागासाकी*" (९ अगस्त १९४५) पर *"अणुबांब"* डालकर जापान के *"झारशाही"* को झुका दिया. हमें द्वितीय महायुध्द का यह इतिहास समझना बहुत जरुरी है. तब ही हम *"डाँ. बाबासाहेब आंबेडकर / मोहनदास गांधी / जवाहरलाल नेहरु / सुभाषचंद्र बोस* इनकी राजनीति - भारतीय स्वातंत्रता इतिहास - युध्द कालखंड और *"कौन नेता सही"* - कौन गलत है तथा *"नेता की दुरदृष्टी"* ? इसे समज सकते है.

             *सुभाषचंद्र बोस* इनको सन १९३८ को,  हरीपुरा कांग्रेस अधिवेशन मे कांग्रेस दल का *"निर्विरोध अध्यक्ष"* चुना गया था. दोबारा सन १९३९ को, त्रिपुरी अधिवेशन में उन्होने मोहनदास गांधी के उम्मीदवार *डाँ पट्टाभी सितारामय्या* इनको हराकर, कांग्रेस अध्यक्ष पद पर चुने गये. वह हार *मोहनदास गांधी* की ही हार थी. कुछ दिन बाद मोहनदास गांधी से वैचारिक मतभेद / कार्यकारीणी सदस्यों के इस्तिफे (जवाहरलाल नेहरु को छोडकर) के कारण, सुभाषचंद्र बोस इन्होने, २९ अप्रेल १९३९ को *"कांग्रेस अध्यक्ष"* पद से इस्तीफा दिया. फिर ३ मई १९३९ को सुभाषचंद्र बोस ने *"आँल इंडिया फारवर्ड ब्लाँक"* (औपचारिक घोषना २२ जुन १९३९) का गठण किया. आगे जाकर सुभाषचंद्र बोस *"जापान"* जाकर, झारशाही शासक *हिराहितो* से मिलकर, भारत आजादी के लिए सहकार्य मांगा. सुभाषचंद्र फिर जापान से सुत्र चलाते रहे. सुभाषचंद्र इन्होने २८ दिसंबर १९३७ को आस्ट्रिया महिला *एमिली शेंकल* इनसे गुपचुप विवाह किया था. जो राजनीतिक कारणवश छुपाया गया. उनको *अनिता बोस फाफ* नामक पुत्री भी हुयी. *रास बिहारी बोस* इन्होने १ सितंबर १९४२ को, *"आजाद हिंद फौज"* (Indian Independence Army) की स्थापना *टोकियो* (जापान) में की थी. उस फौज के *मोहनसिंग* पहले प्रमुख बने थे. परंतु उनके निष्क्रिय होने से, *सुभाषचंद्र बोस* इनके हाथो वह कमान दी गयी. सुभाषचंद्र बोस इन्होने फिर आजाद हिंद फौज में, *"नेहरु ब्रिगेड / गांधी ब्रिगेड / मौलाना ब्रिगेड / राणी झाशी ब्रिगेड"* की स्थापना की. परंतु सुभाषचंद्र बोस की कार्यपध्दति *"अधिनायक वाद"* अर्थात *"तानाशाह"* रही थी तो *जवाहरलाल नेहरु* ये *"आधुनिकवाद - प्रजातंत्र"* (Democracy)  के पक्षधर थे. सुभाषचंद्र बोस ये जर्मनी के हुकुमशहा *हिटलर* से, भारत आजादी के लिए मिले (२९ मई १९४२) थे. परंतु हिटलर ने सुभाषचंद्र को सहकार्य करने को मना किया. परंतु जर्मनी से जापान जाने के लिए *"पनडुब्बी"* की व्यवस्था की थी. सुभाषचंद्र ये इटली के शासक *मुसोलीनी* इनसे भी मिले थे. जापान के *झार शासक* ने सुभाषचंद्र के साथ भारत *"नार्थन क्षेत्र"* से चढाई की. भयानक नरसंहार किया. परंतु सुभाषचंद्र की आजाद हिंद सेना उस नरसंहार को रोक नही पायी. परंतू *"महार रेजीमेंट"* ने जापान के उस हल्ले को रोककर, *'फतह"* हासिल की थी. अगर जापान के *"झार शोषको"* की विजय हुयी होती तो, *"कोरिया"* समान भारत पर भी, *"जापान झारशाही"* का अधिपत्य हुआ होता. अर्थात *"अंग्रेज  गुलामी"* के बदले, भारत पुनश्च *"जापान झारशाही का गुलाम"* रहा होता. *मैने स्वयं* मेरे *"साऊथ कोरीया"* भेट में, मै कोरिया में द्वितिय महायुध्द उन *"स्मृति स्थलों"* को भेट दी थी. सुभाषचंद्र की मृत्यु १८ अगस्त १९४५ को तत्कालीन *"फार्मोसा (तायवान) विमान दुर्घटना"* में गंभिर रुप जलने से हुयी थी. उनकी अस्थिया जापान के *"रेनकोजी बुध्द विहार"* रखी है. परंतु उस मृत्यु पर प्रश्न चिन्ह लगने पर, भारत सरकार द्वारा *"जाँच आयोग"* भी बनाये गये. प्रधानमंत्री *नरेंद्र मोदी* सरकार ने, *"बोस मृत्यु अहवाल"* घोषित करने की बात कही. परंतु अभी भी वह अहवाल घोषित नही किया गया. वही फैजाबाद के *"गुमनाम बाबा"* और अन्य बाबा के रुप में, *सुभाषचंद्र बोस* इनकी नाम चर्चा होती रही.

             कांग्रेस दल राष्ट्रपिता *मोहनदास क. गांधी / पंडित  जवाहरलाल नेहरु / सरदार वल्लभभाई पटेल*  इनका *"आजादी नायक"* रुप में संदर्भ है. फिर *भगतसिंह / राजगुरु / चंद्रशेखर आजाद"* आदि कांतिकारकों का क्या ? द्वितिय महायुध्द (१९३९ - १९४५) में, *"किस पक्ष में साथ दे ?"* (मित्र राष्ट्र / धुरी राष्ट्र) यह कांग्रेस की भुमिका, बिलकुल ही स्पष्ट नही थी. वे कभी *"ब्रिटिश सरकार"* से चर्चा करते रहे तो, कभी क्रुर तानाशाह *"हिटलर"* से भी ! मोहनदास गांधी इनका जर्मनी तानाशाह *हिटलर"* इनको लिखा पत्र भी चर्चा का केंद्र रहा. *मोहनदास गांधी* सन १९३१ को, इटली के क्रुर तानाशाह *मुसोलीनी* से मिल चुके थे. सन १९४२ का *"चले जाव कांग्रेस सत्याग्रह"* यह द्वितीय युध्द काल में, गांधी - कांग्रेस की बडी ही मुर्खता थी. वह आंदोलन सफल नही हुआ. मार्च १९४२ को *"क्रिप्स कमीशन"* भारत आजादी चर्चा करने भारत आया था. *"संपुर्ण स्वराज या डोमेनियन स्टेट"* इस विषयों पर चर्चा से भी समाधान निकाला जा सकता था. *"गुलाम भारत"* में मुस्लिम लिग नेता *मोहम्मद अली जिना* और अस्पृश्य वर्ग नेता *डाँ. बाबासाहेब आंबेडकर* इनका कांग्रेस के साथ संघर्ष भी जोरों पर था. द्वितिय महायुध्द में *"विश्व की अर्थव्यवस्था"* चरमरा गयी थी. इंग्रज आर्थिक चरमारा स्थिती में *"भारत पर शासन करने के अनुकुल"* नही थे. परंतु अंतर्गत *"मुस्लिम - अस्पृश्य - कांग्रेस संघर्ष"* यह अधिकारों का भी संघर्ष रहा था. *"अखिल भारतीय हिंदु महासभा"* की स्थापना सन १९१५ में ब्राह्मण्य नायक *मदन मोहन मालविय* कर चुके थे. हिंदु महासभा के पहले अध्यक्ष *महाराजा मनिंद्र चंद्र नंदी* थे. बाद में *परमानंद / डाँ बी. एस. मुंजे (१९२०) / विनायक दा. सावरकर (१९३७)"* ये बन गये. *RSS* (Royal Secret Service) इन पर, ब्रिटिशों से जुडे रहने के साथ साथ ही, *"तानाशाह - फासीवाद - नाजीवाद"* विचार पक्षधर होनें का आरोप लगता रहा. RSS का नामकरण फिर *"राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ"* किया गया. संघ - हिंदु महासभा ये भारत आजादी से कोसो दुर रही. *विनायक दामोधर सावरकर* इन्होने अंग्रेज जेल से छुटने के लिए, *"१० माफिनामे"* लिखे थे, जिसके परिणाम स्वरुप वि दा सावरकर को, प्रति माह रु. ६०/_ पेंशन अंग्रेजो से मिलती थी. अत: *"हिंदु"* यह शब्द मुस्लिम शासक - अंग्रेज काल की उपज दिखाई देती है. *"सर्वोच्च न्यायालय ने भी हिंदु यह धर्म ना मानकर जीवन जीने की कला"* कहा है. *डां बाबासाहेब आंबेडकर* इन्होने जुलाई १९४१ को, द्वितीय महायुध्द में *"मित्र राष्ट्र"* पक्ष में समर्थन घोषित किया. ता कि *"नाजीवाद - फासीवाद - झारशाही"* की गुलामी (हिटलर - मुसोलीनी - हिराहितो) भारत पर ना आये.  *डाँ. आंबेडकर* ये ब्रिटिश मंत्रीमंडल में *"श्रम मंत्री"* (१९४२ - ४६) बन गये. कांग्रेस ने डाँ आंबेडकर इनको *" देशद्रोही - गद्दार"* कहा था. फिर उसी *काँग्रेस* ने सन १९४२ के बाद, द्वितीय महायुध्द में *"मित्र राष्ट्र"* पक्ष मे, अपना समर्थन घोषित किया. इसे हम क्या कहे ? *कांग्रेस की मुर्खता या अ-दुरदर्शिता ?* सुभाषचंद्र बोस ये डाँ बाबासाहेब आंबेडकर इनसे २ जुलाई १९४० को, मुंबई राजगृह में मिलने आये. परंतु *"अस्पृश्य अधिकार"* संदर्भ में, सुभाषचंद्र बोस इनकी भुमिका स्पष्ट ना होने से, डॉ आंबेडकर इन्होने सहकार्य करने से मना किया. डाँ. आंबेडकर इनके आवाहन पर, *"महार रेजीमेंट"* द्वितीय महायुध्द में कुद चुकी थी. अगर *"मुस्लिम - अस्पृश्य - कांग्रेस"* अंतर्गत संघर्ष ना होता तो, *"भारत को आजादी सन १९४२"* के बाद ही मिली होती. *"१५ अगस्त १९४७ की राह"* (४ - ५ साल देरी) हमे देखना ही ना पडता. भारत देश २६ जनवरी १९५० को *"गणराज्य"* (Republic) हुआ. अर्थात भारत *"प्रजातंत्र व्यवस्था"* (Democracy) की निव रची गयी. *सरदार वल्लभभाई पटेल* इनके बडे भाई *विठ्ठलभाई पटेल* अपने इलाज के लिए विदेश (आस्ट्रिया / स्वित्झरलँड) गये थे. तब *सुभाषचंद्र बोस* इन्होने उनकी मदत की थी. अत: विठ्ठलभाई पटेल ने अपनी 3/4 संपत्ती *सुभाषचंद्र बोस* इनके नाम करने की वसीयत बनायी थी. विदेश में विठ्ठलभाई का निधन हुआ. तब सरदार पटेल ने *सुभाषचंद्र बोस* इनके खिलाफ *"वसियत"* मुकदमा डाला था. अत: सरदार पटेल इनकी *"संपत्ति की भुख"* हमे यहां दिखाई देती है. प्रधानमंत्री *नरेंद्र मोदी* इन्होने *"प्रजातंत्र"* को पुरा कमजोर करते हुये, *"पुंजीवाद और हुकुमशाही"* (Capitalism - Dictatorship) की जडे मजबुत ही किये है. अर्थात *पुंजीवाद गुलामी"* तथा विदेशी ताकते *"अमेरिका - चायना"* की गुलामी को स्वीकृति दी है. सरन्यायाधीश *सुर्यकांत शर्मा* ये महाशय *"संविधान रक्षक"* (Constitution Watch Dog) दायित्व निभाने में, *"जेन झी काँकरोच आंदोलन"* में हमे *"ना-लायक"* (Not Qualified) दिखाई देते है. वही भारत भुतपुर्व न्यायाधीश *रंजन गोगाई* इनके राज्यसभा सदस्य पदासिन होने कथन पर, सर्वोच्च न्यायाधीश के न्यायाधीश *उज्वल भुयान* इनके यह शब्द बहुत कुछ कह जाते है, *"Former Chief Justice said - I am going to Rajyasabha to breach the gap between Judiciary & Executive. It is Fundamentally wrong. It is comletely wrong Fundamentally. Those organizing the Separation of Power...."* जय भीम ! जय संविधान !!!


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▪️ *डाँ. मिलिन्द जीवने 'शाक्य'*

      नागपुर दिनांक ३० जुलै २०२६

Saturday, 25 July 2026

 ✍️ *मा. सर्वोच्च न्यायालय के सरन्यायाधीश सुर्यकांत शर्मा क्या भारत के द्वितिय नंबर के तानाशाह है ? भारतीय संविधान के सरंक्षक (वाँच डाँग) दायित्व निभाने की योग्य क्षमता सरन्यायाधीश सुर्यकांत इनमे विराजीत है ?* (प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी तानाशाह बनने की चेष्टा ना करे. जनता विद्रोह बिगुल बजाती है.)

         *डॉ. मिलिन्द जीवने 'शाक्य'* नागपुर १७

राष्ट्रिय अध्यक्ष, सिव्हिल राईट्स प्रोटेक्शन सेल

एक्स व्हिजिटींग प्रोफेसर, डॉ बी आर आंबेडकर सामाजिक विज्ञान विद्यापीठ, महु म.प्र.

एक्स मेडिकल आँफिसर एंड हाऊस सर्जन

बुध्द आंबेडकरी लेखक, कवि, समिक्षक, चिंतक

अध्यक्ष - आयोजक, जागतिक बौध्द परिषद (नागपुर) वर्ष २००६, २०१३, २०१४, २०१५

आंतरराष्ट्रिय परिषदों के संशोधन पेपर परिक्षक

मो.न. ९३७०९८४१३८, ९८९०५८६८२२

          

           भारतीय संविधान ने राष्ट्रपति हो, या प्रधानमंत्री हो, या सर्वोच्च न्यायालय के सरन्यायाधीश भी क्यौ ना हो, *"आम जनता के मालक"* आप बिलकुल ही नही हो. भारत की आम आवाम आप की *"गुलाम"* नही है, ना ही आप *"तानाशाह"* (Dictator) हो. हमारा संविधान *"प्रजातंत्र"* (Democracy) की सही पहचान है. भारतीय *"संविधान अनुच्छेद १४ - समानता अधिकार"* (Right to Equality) प्रदान करता है. और वह संदर्भ हमे राजकिय अधिकार *"एक व्यक्ति - एक मत - एक मुल्य"* (One Man, One Vote, One Value) में भी दिखाई देता है. *"संविधान अनुच्छेद १९ - आजादी का अधिकार"* (Right to Freedom) प्रदान करता है. अत: *"चुनाव आयोग"* (Election Commission of India) आप भी अपनी मर्यादा को मत लांघे. भारत की आवाम को *"गुलाम"* बनाने की चेष्टा ना करे. *संविधान अनुच्छेद २५ - धार्मिक स्वतंत्रता अधिकार"* (Riight to Freedom of Religion) प्रदान करता है. *"मुस्लिम - शिख - ईसाई"* यह अवंडबर बंद करो. बहुत हुयी है *"धर्मांध मनमानी!!!"* अत: प्रधानमंत्री हो या सरन्यायाधीश इन्होने *"संविधान"* के इस संदर्भ को समझना बहुत जरुरी है. नही तो *"नेपाल - बांगला देश - श्रीलंका"* आंदोलन चेतना का संदर्भ, मैने मेरे एक लेख में पहले ही दिया था. परंतु *"खुर्ची अधिकार की तुम्हारी मग्रुरी"* को, हमारी *"काँकरोच युवा जेन झी"* अब जता चुकी है. उनका आंदोलन *"सत्याग्रह"* का था. परंतु *"मद सत्याधीश"* इन्होने स्वयं को सर्वोच्च *"तानाशाह"* (Dictator) समझकर, जेन झी काँकरोचों पर जो *"निर्गम पोलिस बर्बरता"* (पोलिस लाठी चार्ज / अश्रु गोले / लडकी के कपडे फाडना / लडकी के उपरी भाग पर स्पर्श / लडकी के पिछवाडे में दंडा घुसाना) करने से, उसके लिए शब्द भी कम है. हमारे *"वकिल वर्ग संविधान अनुच्छेद ३२"* अंतर्गत याचिका दायर करता है तो, *सरन्यायाधीश सुर्यकांत शर्मा* अगर यह कहता है कि, *"उसके पास याचिका सुनने तथा व्हिडीयो देखने के लिए समय नही है"* तो, उस खुर्ची के लिए तुम *"ना-लायक"* (Not Qualified) हो. सुर्यकांत इन्होने *"कोर्ट व्हिडिओ"* शेयर करने पर पाबंदी लगाई है. पारदर्शिता रखना तो उनका विशेष दायित्व बना है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के केवल *"रखेल न्यायाधीश"* हो. अत: आप खुर्ची खाली करो. *'"न्यायाधीश शपथ"* से आप ने *"गद्दारी"* की है. आप *"देशद्रोही"* हो. पहले ही आप पर *"अनैतिक संपत्ती"* जमाने का एक आरोप भी है. अत: आप सभी *"मद सत्ताधीश केवल और केवल जल्लाद"* दिखाई देते हो.

          प्रधानमंत्री *नरेंद्र मोदी* / सरन्यायाधीश *सुर्यकांत शर्मा* आप का *"राष्ट्रिय स्वयंसेवक संघ"* (अंग्रेल काल संघटन - RSS - Royal Secret Service) इनसे आज कितना निकट संबंध है, वह उन पर ही हम छोडते है. परंतु *"RSS"* संघटन का आदर्श तो, इटली का क्रुर तानाशाह *बेनितो मुसोलिनी* तथा जर्मनी का क्रुर हुकुमशहा *एडाल्फ हिटलर* इनसे रहने का संदर्भ है. और हिटलर - मुसोलीनी उन्होने *"प्रजातंत्र"*(Democracy) को धत्ता बताते हुये, *"तानाशाही"* (Dictatorship) व्यवस्था को रुजा दिया था. और प्रजा का दमन करके, *"प्रजा को गुलाम"* बनाने का इतिहास है. परंतु *"मुसोलीनी - हिटलर इनका अंत""* बहुत ही भयावह हुआ. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने *"हिटलर - मुसोलीनी* की राह पर चलते हुये, भारत में *"पुंजीवाद"* (Capitalism) को स्थापित कर, *"तानाशाही"* (Dictatorship) शासन व्यवस्था बना ली. भारत में *"प्रजातंत्र"* (Democracy) को खत्म किया. अगला कदम *"प्रजा गुलामी"* का था. *"जेन झी काँकरोचो"* ने मोदी - शहा के इस षड्यंत्र को चकनाचुर किया. परंतु *"विरोधी दलों"* का *"अंतर्फाड विवाद"* यह हमारे लिए बडा चिंता का विषय है. अब उन्हे एकसाथ आना बहुत जरुरी है. अत: विरोधी दलों को *"ऐल्गार"* करना होगा. काँकरोच आंदोलन यह धर्मेंद्र प्रधान इस्तिफे से भले ही २५ जुलै को खत्म हुआ हो. परंतु उनके सामाजिक - राजकिय आंदोलन अज्ञानता से बाहर निकलने पर फिरसे नयी क्रांती उभर सकती है. और प्रधानमंत्री *नरेंद्र मोदी* / सर्वोच्च न्यायालय के सरन्यायाधीश *सुर्यकांत* / तब उन्हे चुनाव आयुक्त *ज्ञानेश कुमार* इन्हे खुर्ची खाली करने करने के लिए दबाव लाना होगा. चुनाव प्रक्रिया *"बँलेट पेपर"* से करनी होगी. तब ही भारत में सही अर्थ में *"प्रजातंत्र"* की बहाली होगी. जय भीम ! जय संविधान !!!


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▪️ *डाँ मिलिन्द जीवने 'शाक्य'*

      नागपुर दिनाक २६ जुलै २०२६

Monday, 13 July 2026

 👌 *दीक्षाभुमी नागपुर ट्रस्टी विवाद : अत: क्या मध्यम मार्ग रुप मे - दोनो ही गट बुध्द समुदायों से आजिवन फी सदस्यता खुली कर हर पाच सालों ने चुनाव पध्दती का स्वीकार कराने को तैयार है  ?*

        *डॉ. मिलिन्द जीवने 'शाक्य'* नागपुर १७

राष्ट्रिय अध्यक्ष, सिव्हिल राईट्स प्रोटेक्शन सेल

एक्स व्हिजिटींग प्रोफेसर, डॉ बी आर आंबेडकर सामाजिक विज्ञान विद्यापीठ, महु म.प्र.

एक्स मेडिकल आँफिसर एंड हाऊस सर्जन

बुध्द आंबेडकरी लेखक, कवि, समिक्षक, चिंतक

आंतरराष्ट्रिय परिषदों के संशोधन पेपर परिक्षक

मो.न. ९३७०९८४१३८, ९८९०५८६८२२


             दीक्षाभुमी नागपुर ट्रस्टी विवादो में *"गवई गट - फुलझेले गट"* आमने सामने खडे होकर, एकमेक पर आर्थिक भ्रष्टाचार का आरोप कर रहे है. वही *गवई गट* द्वारा ट्रस्टी अध्यक्ष *भदंत आर्य नागार्जुन सुरेई ससाई* इन्हे अध्यक्ष पद से हटाने की / *विलास गजघाटे* इन्हे अध्यक्ष बनाये जाने की न्युज, हमे मिडिया में दिखाई दी थी. वही *फुलझेले गट* द्वारा आर्य नागार्जुन सुरेई ससाई जी इनके द्वारा *डॉ. राजेंद्र गवई / विलास गजघाटे* इन्हे ट्रस्टी पद से बरखास्त करने की भी न्युज, हमे दिखाई दे रही है. हमें यह समझना जरुरी है कि, दिक्षाभुमी पर *"फुलझेले गट"* का बहुमत होते हुये, *विलास गजघाटे* फुलझेले गट से जुडे थे. उसी बिच दीक्षाभुमी ट्रस्टीओं की *"तिन जगह"* रिक्त होने से, *भंते नाग दीपांकर / डॉ. चंद्रशेखर मेश्राम / प्रा. प्रदिप आगलावे* इन्हे फुलझेले गट के बहुमत से लिया गया. उसी दरम्यान किसी काम संदर्भ में, मेरी संघटन *'सिव्हिल राईट्स प्रोटेक्शन सेल"* का प्रतिनिधी मंडल दीक्षाभुमी ट्रस्टी सचिव *डॉ. सुधिर फुलझेले* से मिला था. दिक्षाभुमी ट्रस्टी *विलास गजघाटे* भी वही था. तब मैने सुधिर फुलझले से कहा था, *"सुधिर जी, दिक्षाभुमी ट्रस्टी अच्छे और दुरदर्शी मान्यवर होना चाहिये. आप ने वैसे लोगों का चयन नही किया. दीक्षाभुमी यह धम्म / डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर प्रसार प्रचार केंद्र"* होना चाहिये. उन तिन ट्रस्टी में *डॉ. चंद्रशेखर मेश्राम* ये नामांंकित न्युरो फिजीशियन ये. वे अपना समय दीक्षाभुमी कामों के लिए नही दे पायेंगे. *प्रा. प्रदिप आगलावे* इनका आंबेडकर विचारधारा विभाग से लेकर महाराष्ट्र शासन आंबेडकर ग्रंथ प्रकाशन समिती का इतिहास बहुत *"दागदार"* है. तब डॉ. सुधिर फुलझेले *मुझे* कहने लगे कि, *"भाऊ, हमारे अगले लिस्ट मे मेरा (डॉ. जीवने) भी नाम है. "* तब मै सुधिर फुलझेले को कहा कि, *"आप मुझे लो या मत लो. परंतु अच्छे तथा दुरदर्शी लोगो का चयन जरूरी है."* यही बात मैने *एड. आनंद फुलझेले* इन्हे भी कही थी. हमारी वह चर्चा खत्म हुयी. सवाल यह है कि, *"फुलझेले गट"* के वह चार ट्रस्टी *विलास गजघाटे / डॉ चंद्रशेखर मेश्राम / भंते नाग दीपांकर / प्रा प्रदिप आगलावे* इन्होने *"गवई गट"* मे पलटी क्यौं मारी ? यह पलटी इतनी सहज भी नही है. *"दीक्षाभुमी आर्थिक भ्रष्टाचार"* में हात कौन धो रहा है ? *भंदंत आर्य नागार्जुन सुरेई ससाई* इन्हे कोई भी आर्थिक लाभ लेने से, *"कोई औचित्य हमे दिखाई नही देता."* लेकिन अपने बुढापें मे. *"आर्य नागार्जुन ससाई"* जी पिसते नजर आ रहे है. वही भंते जी बदनाम करने का प्रयास *"गवई गट"* द्वारा होना, इतना सहज विषय नही है. वही कुछ महिला समुह द्वारा *"भिक्खुनी का चिवर उतारे जाने का प्रयास"* होना भी, इतना सहज विषय नही है. यहा प्रश्न है, *"हमाम में नंगे कौन है ?"* यह विवाद चल रहा था, तब मैने फोन पर *"दोनो गुट ट्रस्टीओँ से चर्चा करने का प्रयास"* किया. परंतु *"मध्यम मार्ग सफलता"* नही मिली. अत: बौध्द समुदाय के सामने एक *"मध्यम मार्ग"* सादर कर रहा हुं. *"ट्रस्टी"* का अर्थ होता है *"विश्वस्त !"* वे लोग *"दीक्षाभुमी के मालक"* नही है. आप का उन ट्रस्टीयों पर विश्वास है या नही ? यह भी प्रश्न है. अत: बुध्द समाज से *"आजिवन सभासद फी"* (रु  १०,००० से एक लाख तकं) खुली कर, उन आजिवन सभासद में से हर *"पाच साल मे चुनाव पध्दति"* से, *"ट्रस्टीओं का चुना"* जाना अब जरुरी हो गया है. दुसरी बात यह कि, तिन नये ट्रस्टी *भंते नाग दीपांकर / डॉ. चंद्रशेखर मेश्राम / प्रा प्रदीप आगलावे* इनका चेज रिपोर्ट मा. धर्मादाय कार्यालय द्वारा स्वीकृत किया गया है या नही ?  अगर स्वीकृत नही हुआ हो तो, क्या उन्हे *"सभा में बैठकर प्रोसिडींग बुक"* में सही करने का अधिकार है ? यह भी कानुनी प्रश्न है.

             दीक्षाभुमी का यह विवाद बहुत ही शर्मसार है. दीक्षाभुमी ट्रस्टी गट ये *"दीक्षाभुमी मालक"* ना होने से, उन्होने इस नंगानाच को बंद करना जरुरी है. विश्व मे उस घटना से अच्छा संदेश नही जा रहा है. *"दीक्षाभुमी यह समाज की धरोहर है."* अत: उस पर निर्णय लेने का अधिकार *"बुध्द समाज"* है. धम्म चक्र प्रवर्तन दिन पर *विधायक डॉ नितिन राऊत* इनकी संघटन *"संकल्प"* द्वारा *"भोजन दान"* कराने से, कुछ लोक *"हात में खाने की पत्रावली"*  लेकर घुमते नजर आते है. रास्ते पर ही खाना खाने बैठते है. *"विधायक नितिन राऊत हात में खाने की पत्रावली लेकर, स्वयं घुमकर वह भी अनुभव ले. "* इस *"भिकारवाडा तथा दिक्षाभुमी गंदगी"* पर आवाज उठती हुयी, हमें दिखाई नही देती. उस कारणवश लोगों के कपडे भी गंदे हुये है / ट्राफिक जाम भी हुआ दिखाई देता है. निश्चित *"भोजन दान"* पवित्र कार्य है. लेकिन भोजनदान *कुर्वेज न्यु माँडेल या आय टी आय मैदान"* मे आयोजन कर, *"भोजन करने टेबल / पिने का पानी / हात साफ करने पानी व्यवस्था / भोजन पात्र फेकने डस्टबिन"* आदि व्यवस्था करना जरुरी है. *नितिन राऊत भिकारवाडा* कारणवश बुरा असर *" डाँक्टर्स द्वारा मोफत रोग शिबिर"* पर हो रहा है. मेडिकल अंम्बुलंस आने - जाने में परेशानी हो रहा है. अत: यह व्यवस्था करने की जिम्मेदारी *"दिक्षाभुमी ट्रस्टी"* की है. इस पर गवई गट / फुलझेले गट खामोश है. शायद इसमे *"आर्थिक लाभ"* विषय ना हो. दिक्षाभुमी बांधकाम प्रकरण भी चर्चा का विषय था. वही *"दिक्षाभुमी भुमी विस्तारीकरण"* अर्थात बाजु की *"आरोग्य विभाग / कृषी विभाग जमिन"* इतने सालों से हमें नही मिल पायी. वही उत्तर नागपुर के कमाल चौक स्थित *"समाज भवन - सांस्कृतिक हाँल*" को तोडकर / केंंद्रिय मंत्री *डाँ नितिन गडकरी* इनके माँ के नाम पर, वहा *"अस्पताल"* का निर्माण किया गया है. अत: विधायक *डाँ नितिन राऊत* इनके अनुमती बिना यह संभव नही था. वही सिताबल्डी रेल्वे स्टेशन सामने का पुल *"गणेश मंदिर"* के लिए, बाधा होने के कारण वह तोडा गया. अत: हमारे *"बुध्द समुदाय का विघटन"* ही इसके लिए कारक रहा है. उत्तर नागपुर *"रिपब्लिकन गड"* उध्वस्त करने के *"शुक्राचार्य / अस्तिन के साप"* कौन है ? यह भी जानना हमारे लिए जरुरी है.


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▪️ *डॉ. मिलिन्द जीवने 'शाक्य'*

     नागपुर, दिनांक १३ जुलै २०२६

Sunday, 12 July 2026

 💐 *संजय आवले ये सीआरपीसी ट्रेड्स एंड काँमर्स विंग के अध्यक्ष राष्ट्रिय उपाध्यक्ष नियुक्त !*


      *सिव्हिल राईट्स प्रोटेक्शन सेल* की डाटर कंसर्न राष्ट्रिय संघटन *"सी.आर.पी.सी. ट्रेड एंड काँमर्स विंग"* के *"राष्ट्रिय उपाध्यक्ष "* पद पर *संजय आवले* इनकी नियुक्ती सीआरपीसी ट्रेड एंड काँमर्स विंग के राष्ट्रिय अध्यक्ष *इंजी. विजय बागडे* इन्होने सीआरपीसी के *सुर्यभान शेंडे / दिलिप तांदले / संजीवन वालदे / एड डॉ मोहन गवई / डॉ सिध्दार्थ मोरे / एड राजेश लाख / इंजी शिलकुमार गोस्वामी / अश्विन गायकवाड /अभिजित बरुआ / मिलिन्द गाडेकर / डॉ. राजेश नंदेश्वर / सीमा बोधनकर / रेशमा आठवले / ज्युली चार्ली / डॉ मनिषा घोष / डॉ. भारती लांजेवार /सुरेखा खंडारे / डॉ. सीमा बोरकर / बेला मरियम / ज्योती मुदलीयार* इनसे चर्चा कर घोषित की है. सदर नियुक्ती सुचना सिव्हिल राईट्स प्रोटेक्शन सेल के *राष्ट्रिय अध्यक्ष* तथा सीआरपीसी वुमन्स विंग / सीआरपीसी एडव्होकेट विंग / सीआरपीसी एम्पाइज विंग / सीआरपीसी हेल्थ (डॉक्टर) विंग / सीआरपीसी बुध्द आंबेडकरी साहित्यिक (लिटररी) विंग / सीआरपीसी इंजीनियर्स विंग / सीआरपीसी ट्रेड्स एंड कॉमर्स विंग / सीआरपीसी ट्रायबल विंग / सीआरपीसी कल्चरल विंग / सीआरपीसी वुमन्स क्लब के "राष्ट्रिय पेट्रान" - *डॉ मिलिन्द जीवने 'शाक्य'*  इन्हे कर दी है. *संजय* ये सामाजिक कामों से जुडे है. उनके इस नियुक्ती पर सभी पदाधिकारी वर्ग ने उनका अभिनंदन किया है.

Friday, 10 July 2026

 ✍️ *मा. सर्वोच्च न्यायालय यह अब संविधान की रक्षक (Watch Dog) ना होकर /निरपेक्ष सही न्यायदान की क्षमता खोकर / क्या जुते - फाईले खानेवाली फँक्टरी एवं गाली गलौच स्थली हो गयी है ?*

           *डॉ. मिलिन्द जीवने 'शाक्य'* नागपुर १७

राष्ट्रिय अध्यक्ष, सिव्हिल राईट्स प्रोटेक्शन सेल

एक्स व्हिजिटींग प्रोफेसर, डॉ बी आर आंबेडकर सामाजिक विज्ञान विद्यापीठ, महु म.प्र.

एक्स मेडिकल आँफिसर एंड हाऊस सर्जन

बुध्द आंबेडकरी लेखक, कवि, समिक्षक, चिंतक

आंतरराष्ट्रिय परिषदों के संशोधन पेपर परिक्षक

मो.न. ९३७०९८४१३८, ९८९०५८६८२२


             मा. सर्वोच्च न्यायालय *"संविधान रक्षक"* (Watch Dog) / *"निरपेक्ष - उचित न्यायदान"* (Right Justice) की अहं भुमिका पालन करने की पात्रता यह एक बहुत बडी पहेली बन गयी है. *"अयोध्या रामजन्मभुमी निर्णय / नागरीकत्व प्रश्न / चुनाव पध्दती / विभिन्न भ्रष्टाचार केसेस / कुछ विवादपुर्ण निर्णय"* आदी का उदाहरण दिया जा सकता है. अगर *"कोलोजीयम पध्दति"* ना होती तो, न्याय व्यवस्था के न्यायाधीश *"चपराशी स्पर्धा परिक्षा"* पास होते या नही होते ? यह संशोधन का विषय है. इसलिए न्यायदान व्यवस्था में *"संघ लोक सेवा आयोग"* (UPSC)  के सदृश्य *"न्यायिक लोक सेवा आयोग"* (Judiciary Public Service कमीशन - JPSC) का गठण होकर, मेरिट आधार पर *"न्यायाधीश नियुक्ति "* होना, बहुत जरुरी हो गया है. यह प्रश्न *"न्यायाधीश मेरिट"* का है. नरेंद्र मोदी सरकार द्वारा पारीत *"संविधान अनुच्छेद 124 A - National Judicial Appintment Commission"* (NJAC) की मै बात नही कर रहा हुं. सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश वर्ग पर *"बुट फेकना / फाईल फेकना / न्यायाधीशों पर अभद्र टिप्पणी वा गाली गलौच करना"* यह आम विषय हो गया है. क्या यही *"न्याय व्यवस्था"* पात्रता रही है ? न्याय व्यवस्था की *"गरिमा"* क्यौ धुमिल हो रही है ? इस पर संशोधन होना बहुत जरुरी है. अनुसुचित जाति समुह से जुडे मद्रास उच्च न्यायालय के *न्या. कर्णन* इन्होने न्यायव्यवस्था में *"२० भ्रष्ट न्यायाधीश"* होने की शिकायत प्रधानमंत्री *नरेंद्र मोदी* इन्हे की थी. नरेंद्र मोदी इन्होने वह शिकायत तत्कालिन सरन्यायाधीश *जे एस केहर* इन्हे भेजी थी. और सर्वोच्च न्यायालय के *"सात बेंच खंडपीठ - जे एस केहर / दिपक मिश्रा / जे चेलमेश्वर / रंजन गोगाई / मदन लोकुर / पी सी घोष / कुरियन जोसेफ* इनके द्वारा न्या कर्णन को छ माह की सजा सुनाई थी. उन सात न्यायाधीश वर्ग से भ्रष्टाचारी न्यायाधीश कौन है ? इस विषय को छोडकर *"स्त्री लंपट / शोषक - रंजन गोगाई* सरन्यायाधीश पद से रिटायरमेंट होने के बाद, अब राज्यसभा मे विराजीत है. अत: हम न्याय व्यवस्था की कुछ धुमिल घटनाओं पर चर्चा करेंगे.

           तत्कालिन सरन्यायाधीश *ए एस आनंद* इनके खंडपीठ में *एड. नंदलाल बालवानी* इन्होने सरन्यायाधीश इन पर २६ फरवरी १९९९ को *"जुता"* फेककर मारने से, तत्कालिन खंडपीठ ने उस वकिल की *"याचिका निरस्त"* करते हुये / अवमानना का दोषी मानकर *"४ माह की सजा, रु २००० जुर्माना, वकिल सुची"* से बरखास्त किया था. फिर २६ साल के बाद वही घटना तत्कालीन सरन्यायाधीश *भुषण गवई* इनके खंडपीठ मे घटीत हुयी. उच्च जाती के *एड. राकेश किशोर* इन्होने भुषण गवई इन पर *"बुट* फेकने के बाद भी, उसकी *"FIR दर्ज नही"* कराई गयी ना ही उस वकिल को कोई शिक्षा मिली. कारण एक *"वकिल लाबी"* बुट फेकनेवाले वकिल के साथ खडी होने से, *भुषण गवई* वह हिम्मत नही जुटा पाये. उत्तर प्रदेश के सत्ताधारी भाजप सांसद *निशिकांत दुबे* इन्होने १९ अप्रेल २०२५ को, तत्कालीन सरन्यायाधीश *संजीव खन्ना* इन्हे भारत मे *"गृह कलह"*(Civil War) करनेवाला कहने पर भी, सांसद निशिकांत दुबे इन पर कोई कारवाई नही हुयी. आज दिनांक १० जुलै २०२६ को, सर्वोच्च न्यायालय के *न्या. विश्वनाथन / न्या. आलोक आराधे* इनके खंडपीठ मे न्यायाधीश को *एड. भानुप्रताप सिंग* इस वकिल द्वारा *"Judicial Servant"* इस अपमानजनक शब्द से सुरुवात कर / लखनौ के ACP को *"अरेस्ट करने"* आदेश दे, यह कहने पर / न्यायाधीश ने हमे *"आदेश देने"* का जिक्र करने पर / एड भानुप्रताप सिंग ने अपने *"हाथ की फाईल"* न्यायाधीश पर फेकते हुये / *सरन्यायाधीश सुर्यकांत* इनको *"माँ - बहन की गाली गलौच"* की. अत: एड सिंग को न्यायालय के सुरक्षा रक्षको ने पकडकर वहा के *"पोलिस चौकी"* ले गये. परंतु *"FIR दर्ज नही"* की गयी. सर्वोच्च न्यायालय की यह घटनाएं क्या *"संदेश"* दे रही है ? क्या सर्वोच्च न्यायालय अपनी *"गरिमा - विश्वास खो चुकी"* है ? ऐसे बहुत सारे प्रश्न खडे होना तो लाजमी है.

           उत्तर प्रदेश उच्च न्यायालय के *न्या. राम मनोहर नारायण मिश्रा* इन्होने १७ मार्च २०२५ को एक *"गंभिर यौन पिडन केस"* के निर्णय मे, *"नाबालिग लडकी के स्तन को पकडना / पायजामा का नाडा खोलना / पुल के निचे ले जाना"* इन तमाम घटना को *"बलात्कार का प्रयास"* ना मानकर / आरोपी को बरी किया. अत: उस *"न्यायाधीश के पत्नी - लडकी"* पर यह प्रयोग होना बलात्कार नही माना जाएगा ? प्रकरण की गंभिरता देखकर सर्वोच्च न्यायालय ने उस निर्णय को *"खारीज"* किया, यह अलग विषय है. उत्तर प्रदेश उच्च न्यायालय के और एक *न्या. शेखर यादव* यह विश्व हिंदु परिषद के मंच पर ८ दिसंबर २०२४ को जाकर / *"बहुत विवादपुर्ण जातियवादी टिप्पणी"* कर गये. वही दिल्ली उच्च न्यायालय के *न्या. यशवंत वर्मा* इनके बंगले पर, १४ मार्च २०२५ को *"लाखो की करंसी"* मिली थी.  राजस्थान उच्च न्यायालय मे कुछ ब्राम्हण न्यायाधीश - वकिलो द्वारा *"मनु का पुतला"*:बिठाया गया. और ऐसे बहुत सारे विवादपुर्ण न्यायाधीश के निर्णय बताये जा सकते है. इन तमाम केस में उन *"न्यायाधीशो को जेल की शिक्षा - दंड"* नही मिला, जेसे अनुसुचित जाति के न्यायाधीश *सी. एस. कर्णन* को बगैर किसी अपराध से मिला था. शब्द मर्यादा के कारण शब्द को विराम दे रहा हु. प्रश्न हमारे *"न्याय व्यवस्था मेरिट"* का है. *"निरपेक्ष उचित न्याय"* का है. एवं *"भारतीय संविधान रक्षा"* का भी है. क्या *"न्यायाधीशों का Code of Conduct"* यही शिक्षा पढाता है. अत: भारत के भविष्य के बारे मे हम क्या कहे ??? इसलिए ब्रिटिश अंग्रेज काल *"ब्राम्हण्य न्यायाधीश"* बनने पर पाबंदी लगाई गयी थी. कांग्रेस पितामह *मोहनदास गांधी* / संघवाद के *सुदर्शन* / प्राचिन भारत के विचारविद *भर्तुहरी* इनके शब्दों में, भारत की राजनीति *"वेश्यालय"* है. आज वे होते तो, *"न्याय व्यवस्था को भी वेश्यालय"* कहते ? यह प्रश्न है...!!!


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▪️ *डॉ. मिलिन्द जीवने 'शाक्य'*

       नागपुर दिनांक १० जुलै २०२६

Friday, 3 July 2026

 .👌 *विपश्यना - फालुन दाफा साधना से लेकर फालुन गोंग साधना अभ्यास तक जुडे इन महायान - वज्रयान विचारों की उलझन में थेरवादी - नवयान समुह !* (ली होंंगजी लिखित फालुन गोंग / जुआन फालुन पुस्तक समिक्षा)

     *डॉ. मिलिन्द जीवने 'शाक्य'* नागपुर १७

राष्ट्रिय अध्यक्ष, सिव्हिल राईट्स प्रोटेक्शन सेल

एक्स व्हिजिटींग प्रोफेसर, डॉ बी आर आंबेडकर सामाजिक विज्ञान विद्यापीठ, महु म.प्र.

एक्स मेडिकल आँफिसर एंड हाऊस सर्जन

बुध्द आंबेडकरी लेखक, कवि, समिक्षक, चिंतक

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          चायना के *"फालुन दाफा'* साधना पध्दति का, बगिचे आदि जगहों पर सहजतासे अभ्यास करते दिखना, इस कारणवश बहुत से भारतीय लोक, जाति - पाति - पंथ - धर्म से उपर उठकरफालुन दाफा की ओर आकर्षित हो रहे है. बहुत से जगहों पर फालुन की प्रदर्शन लगना, प्रसार - प्रचार तंत्र भी होता हुआ, हमें दिखाई देता है. नागपुर के *"लोकमत भवन आर्टगॅलरी"* में भी *"फालुन दाफा"* प्रदर्शनी का आयोजन हो चुका है. मुझे आयोजन टीम से निमंत्रण होने से, मैं मेरी *"सिव्हिल राईट्स प्रोटेक्शन सेल"* टीम के साथ, फालुन दाफा प्रदर्शनी देखने गया था.वहां फालुन दाफा टीम के साथ मेरा परिचय भी हुआ.साथ ही चायना देश में *"फालुन दाफा"* टीम के साथ, चलनेवाला *"शोषण संघर्ष "* भी सामने आया है. फालुन दाफा साधना पध्दती के प्रायोजक - *ली होंगजी* इन्होने, *चीन* सत्ता शासन क*"शोषण नीति"* के कारण, चायना छोडकर *"अमेरिका"* होने की चर्चा है. *"फालुन दाफा"* इस शब्द का सहज अर्थ - फालुन = सिध्दांत चक्र / दाफा = विधाता का ज्ञान, विश्व का महान मार्ग सिध्दांत, साधना शक्ति - अभ्यास, इस अर्थ स देखा जाए तो, *"फालुन दाफा = सिध्दांत चक्र साधना शक्ति - अभ्यास "*(सिध्दांत चक्र विधाता का ज्ञान) भी कह सकते हैं. *"फालुन गोंग"* इसका अर्थ - *"शरीर + मन दोनों की साधना प्रणाली"* बतायी गयी है. इस साधना पध्दती के अभ्यास के कारण ही, *"शारिरीक - मानसिक"* रुप में *"स्वास्थ "* पर, सकारात्मक परिणाम होना बताया जाता है. अब हम उपरोक्त *"साधना पध्दती"* के इतिहास  - अभ्यास परिणाम, *"विपश्यना"* आदी विषयों पर भी हम चर्चा करेंगे.

     ‌       *"फालुन"* (सिध्दांत चक्र) संदर्भ की, *ली होंगजी* लिखित दो पुस्तके *"फालुन गोंग"* तथा *"जुआन फालुन"*  यह पुस्तके मैने पढ़ी है. साथ साथ ही *"विपश्यना"* साधना पध्दति पर भी वाचन किया है. *"विपश्यना"* का सरल अर्थ - *"अंतर्दृष्टी या स्पष्ट दृष्टी"* कह सकते हैं. विपश्यना में *"जो वस्तु जैसी है, उसे ठिक वैसे ही देखना है - समझना है"* यह भी कह सकते हैं. विपश्यना यह तो, *"आत्मनिरिक्षण"* एवं *आत्मशुध्दी"* की साधना पध्दति बतायी जाती है. इसे *"प्राणायाम"* और *"साक्षीभाव"* इसका मिलाजुला योग भी, कुछ मान्यवर कहते हैं. कुछ मान्यवर *"बुध्दीझम"* से इसका संबंध नकारते भी है. इस संदर्भ में सविस्तर चर्चा हम फिर कभी करेंगे. परंतु व्यक्ति के *"शारीरिक  - मानसिक स्वास्थ्य"* के लिये, *"साधना अभ्यास"* करना कुछ बुरा नहीं है. प्रश्न जब *"बुद्ध धम्म"* से जुडा हुआ होता है, तब *"विपश्यना / फालुन दाफा"* समान किसी भी साधना पध्दती का, कोई भी औचित्य नहीं होता, यह समझना भी जरूरी है. हम लोग *"धम्म और साधना पध्दति"* को एक साथ जोडकर, विवादों को जन्म देते है. *"धम्म"* यह बहुत बडा विषय है. *धम्म* यह आचरण का साधन है. *"साधना"* यह केवल शरिर शुध्दता का साधन है. इसलिए बुध्द हमें *"अष्टांग मार्ग"* पालन की सिख देते है. *"धम्म"* से बढकर कुछ भी नहीं है. *"धम्म"* यह व्यक्ती के साथ साथ, *"समुदाय सापेक्ष"* विषय है. जब कि *"साधना"* यह *"व्यक्ती सापेक्ष"* विषय है, यह समझना भी बहुत जरूरी है. इस लिये केवल *"बुध्द"* यह धर्म (धम्म) बना. ना कि, *"विपश्यना / फालुन दाफा"* यह साधना पध्दती - *"धर्म बना !!!"*

          *"फालुन"* (सिध्दांत चक्र) द्वारा संबंधित *"फालुन गोंग / जुआन फालुन"* यह दो पुस्तके *"ली होंगजी"* इनके *"चीनी भाषा"* में दिये गये, कुछ *"भाषणों का संकलन"* दिखाई देता है. दुसरा संदर्भ यह कि, *"भाषांतरण"* होने के बाद में *"अर्थ"* संदर्भ में बदलाव संभव हुआ हो. और *ली होंगजी* की वह पुस्तके, *"भाषण संकलन"* होने के कारण, *"विषय संदर्भ के अनुक्रम / विषय सादरीकरण"* भी जैसा चाहिए, वैसे हुआ दिखाई नहीं देता. साथ ही *"जी होंगजी"* इनका जुडाव *"महायान / वज्रयान / तंत्रयान"* रहा है. उसमें *"ताओ विचार"* की भर पड गयी. अत: *होंगजी* इनकी  *"वैचारिक स्पष्टता "* ना होने से, पुस्तक *"उद्देश लिखाण से भटकना"* यह दिखाई देता है. अगर उन्होने उद्देश लेकरं पुस्तक लिखी होती तो, वह *"पुस्तक लिखाण"* अलग होता. और उनके द्वारा *"संकलित बतायी गयी साधना पध्दती - एक उन्नत साधना प्रणाली है,"* यह बताने भी वे भुलें नहीं है. कही कही तो *ली होंगजी* इन्होने, *"बुध्द से भी बडा होने की स्वयं तारिफ"* भी की है. जब कि *युनो"* ने, विश्व का सर्वोत्तम शांती धर्म *"बुद्ध धर्म"* को माना है. *ली होंगजी* इन्होने तो, *"जन / शान / रेन"* (सत्य / करुणा / सहनशीलता)  इस त्रयी से ही, उनके *"साधना का मार्ग"* बताया हुआ है. *बुध्द* तो उसके आगे भी चले गये है. *"बुध्दत्व प्राप्ति"* को साधना, क्या *होंगजी* के साधना से संभव है ? यह भी प्रश्न है‌. *होंगंजी -  "चीगोंग* (प्राण शक्ति) / *गोंग* (साधना शक्ति) / *फाशन* > फा > सिध्दांत शरीर - ज्ञानप्राप्त व्यक्ती का शरीर/ *शिनपिंग* (मन या हृदय की प्रकृति) / *दान* (शक्ति पुंज) / *दिव्य नेत्र* (माथे का मध्य) आदि आदि शब्दों के बिच ही, उनकी *"साधना घुमती"* हुयी नज़र आती है. उन्होंने *"साधना और अभ्यास"* इसको अलग अलग माना है. *तथागत बुध्द* इनके महापरिनिर्वाण (इ. पु. ४८३ नये शोध अनुसार इ. पु. ५४३) के बाद, *पहिली शती* (इसवी ७२) में कश्मिर हुयी - *"चवथी बौध्द सांगिती"* में, बुद्ध धर्म यह *"हिनयान / महायान"* संप्रदाय में विभक्त हुआ. इतिहास में *"हिनयान"* यह १८ भागों में विभाजीत होने का संदर्भ है. साथ ही, *"थेरवाद (स्थविरवाद) / सर्वास्तिवाद (वैभाषिक) / सौतांत्रिक"* यह प्रमुख तिन संप्रदाय दिखाई दिये. यही नहीं तो, *"हिनयान / थेरवाद"* बौध्द संप्रदाय भी अलग अलग बताये गये. वही *"महायान "* (पहिली शती में उदय) ने *"वज्रयान (५ - ७ वी शती) / तंत्रयान संप्रदाय (८ वी शति)"* को जन्म दिया. वही वज्रयान / तंत्रयान ने, *"शैव पंथ / वैष्णव पंथ / शाक्त पंथ"* (९ - १० वी शति में) इनकी निव भी रखी. परंतु *होंगजी* इन्होने उन संदर्भ के प्रस्तुतीकरण को, समजा हुआ हमें दिखाई नहीं देता. महत्वपूर्ण यह कि, *"हिनयान / महायान / वज्रयान / तंत्रयान"* बौध्द संप्रदाय विचार तथा *"विपश्यना"* साधना विचार भी, यह सहजता से समझे जा सकते हैं. *बाबासाहेब डॉ आंबेडकर* इन्होने १४ अक्तुबर १९५६ को, हिनयान में कुछ सुधार कर *"नवयान बौध्द"* होने की बात कही. *"दि बुद्धा एंड हिज धम्मा"* यह ग्रंथ बहुत सरल सोपी भाषा में लिखा है. परंतु *ली होंगजी* द्वारा लिखित साधना संदर्भीत पुस्तके, सरल - सोपी भाषा में नहीं दिखाई देते. अत: सरल सोपी भाषा में ही *"फालुन साधना - अभ्यास"* लिखाण का प्रयास हो.

            *ली होंगजी* इन्होने "फालुन" संदर्भीत पुस्तक में, *"चीगोंग"* (प्राणशक्ती) का संदर्भ, *"प्राचिन काल"* से बताया है. बुध्द काल का संदर्भ देखे तो, *"भिक्खु संघ"* के भिक्खु लोग *"अर्हत / बोधिसत्व"* अवस्था तक जाने का संदर्भ है. उनकी साधना पध्दती यह *"शाक्यमुनी बुध्द"* इनके विचारों की रही है. प्राचिन काल में *"२८ बुध्द"* होने का संदर्भ है. ८४ हजार बुध्द नहीं. *अवलोकितेश्र्वर* इनको तो *"बोधिसत्व"* बताया गया है. *"बुद्ध नहीं."* तथा *नागार्जुन* इन्हे भी बोधिसत्व ही बताया गया है. उनका संदर्भ भी महायान से जोडा जाता है. महायान संप्रदाय में *"मंजुश्री / मैत्रेय"* आदि का संदर्भ आता है. *बाबासाहेब डॉ आंबेडकर* इन्हे भी, काठमांडू के "जागतिक बौध्द परिषद - १९५४" में, *"बोधिसत्व"* यह महान बौध्द पदवी, भिक्खु संघ द्वारा ही दी है. महायान / हिनयान बौध्द साहित्य पर, हम फिर कभी चर्चा करेंगे. *"फालुन गोंग"* (शरीर + मन दोनों की साधना प्रणाली) का संदर्भ बौध्द साधना प्रणाली से जुडा दिखाई देता है. बुध्द धर्म में *"आत्मा"* इस वस्तु को नकारा है. *बुध्दघोष* इन्होने *"विशुध्दीमग्ग"* ग्रंथ में आत्मा नकारते हुये कहा कि, *"कम्मस्स कारको नत्थि विपाकस्स च वेदको | सुध्दधम्मापवत्तन्ति एव ऐतं सम्मादस्सनं ||"* (अर्थात - कोई कर्ता नहीं है, जो कर्म को करता है, शरीर का अवयव घटक चक्र स्वयं ही अपने आप घुमते रहाता है. यही वस्तुस्थिती है.) *वेदांत दर्शन* ने भी  *"आत्मा"* संदर्भ में, *बुध्द* के विचारों की ही कॉपी की है. जैसे - *"नात्मा भावेषु ....!"*- (अष्टावक्र गीता ७:४) (अर्थात - शरीर में आत्मा नहीं रहती.) बुध्द ने विश्व का कर्ता नहीं माना. *"न हेत्थ देवो ब्रम्ह संसारस्य अत्थि कारको | बुध्दधम्मा पवत्तन्ति हेतुसंभारपच्चया ति ||"* (अर्थात - विश्व का कोई कर्ता नहीं है. सृष्टी के नियमानुसार सृष्टी चक्र अपने आप शुरु रहता है.) *"विपश्यना"* का उल्लेख *सुत्तपिटक* (दिघनिकाय) इसमें दिखाई देता है. *"अंगुत्तर निकाय"* (कालामसुत्त) में बुध्द ने, *"तंत्र - मंत्र - दैवी शक्ति"* को नकारा है. बुध्द ने *"चार भौतिक तत्व"* को ही माना है. - *"पृथ्वी / आप (जल) / तेज (अग्नि) / वायु"* तत्व. बुध्द ने *"आकाश"* तत्व को नहीं माना. *"मृत्यु"* के उपरांत शरीर भी, *"चार तत्वों"* में ही विलिन हो जाता है. अत:  *जी होंगजी* इन्होने बुध्द के इस विचार को समझना होगा. *"महायान का उदय"* पहिली शती में हुआ था. और *"त्रिपिटक"* का निर्माण तो, यह उसके ही पहले, *"तिन बुध्द सांगिती"* में हो चुकां था. *"फालुन गोंग अभ्यास पध्दति"* इस प्रकरण को छोडा जाए तो, समस्त पुस्तक *"सिर के उपर से"* जाती हुयी दिखाई देती है. *"फालुन गोंग"* में पांच क्रियाओं का संग्रह है. *"बुध्द सहस्त्र हस्त प्रदर्शन क्रिया / फालुन स्थिर मुद्रा क्रिया / विश्व के दो छोरों का भेदन क्रिया / फालुन अलौकिक परिपथ क्रिया / दिव्य शक्तियों को सुदृढ करने का मार्ग क्रिया."* अत: अन्य साधना पध्दति सरल पध्दति से कैसे हो ? इस प्रकार साधना पुस्तक की रचना कराकर,  *ताओ विचार* आदि अवांतर विषयों को समावेश ना करे तो, यह बहुत अच्छा होगा. साधना अभ्यास में *"शुद्ध बुद्ध विचार"* हो. मिलावट नहीं !!! अंत में *"साधना विचार"* यह हमारा अंतिम उद्देश (ध्येय) नहीं है. *"शुध्द मुल बुध्द धम्म"* पालन / प्रसार - प्रचार ही हमारा उद्देश होना, बहुत ही जरुरी है. हम केवल *"साधना"* की बीच ही उलझकर, हमारा *"मुल उद्देश"* को भुलं रहे है. *"विपश्यना / फालुन दाफा"* आदि साधना से बाहर निकलने में, वह साधक लोग उदासीन ही दिखाई देते है. जो भविष्य में हमें हमारे *"बौध्द धर्म"* (धम्म) के अस्तित्व की समस्या होगी !

         जय भीम ! नमो बुध्दाय !!!


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▪️ *डॉ मिलिन्द जीवने 'शाक्य'*

       नागपुर दिनांक ३ जुलै २०२६

Wednesday, 1 July 2026

 👌 *बुध्द सत्याचा बोध...!!!*

       *डॉ. मिलिन्द जीवने 'शाक्य'*

       मो. न. ९३७०९८४१३८


निसर्ग चक्र संसारातील

प्रात: काल निर्मल मन

प्रेम मैत्री सत्य अहिंसा 

प्रज्ञा शील करुणा

स्वातंत्र समता बंधुता न्याय

हा जीवन बोध करतांना

कार्य कारण भाव - प्रतित्यसमुत्पाद

बुध्द सत्याची जाण देतो ....

मनातील दडप आवरण

घालवावे कसे हा अहं प्रश्न

असत्य - दगाबाज जग

रक्ताळलेले हिंसा तांडव

अ-शील भ्रष्टाचार पोखरण

नेहमी आ वाजुन उभे असतांना

तुझा प्रेम मैत्री करुणा हाथ

मनाला शांतीची अनुभुती देतो....

तुझ्या प्रेमाच्या पाशेत

मनाला येणारी शांत झोप

हवी हवीसी असणारी चेतना

परंतु वातावरणातील दुषितता

सर्व काही उध्वस्त करतांना

सुर्योदय किरण उत्सर्ग

माणसाला नित्य जागवतांना

बुध्द सत्याचा बोध करुन जातो ....


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नागपूर दिनांक २ जुलै २०२६