👌*बुध्द काल की बम्हन संज्ञा एवं वैदिक आर्य काल की ब्राह्मण संज्ञा ये दोनो भी भिन्न भिन्न अर्थ होकर बुद्ध काल में वैदिक ब्राह्मण धर्म नाम का कोई अस्तित्व नहीं था !*
*डॉ. मिलिन्द जीवने 'शाक्य',* नागपुर १७
राष्ट्रिय अध्यक्ष, सिव्हिल राईट्स प्रोटेक्शन सेल
एक्स व्हिजिटिंग प्रोफेसर, डॉ बी आर आंबेडकर सामाजिक विज्ञान विद्यापीठ महु मप्र
बुद्ध आंबेडकरी लेखक, कवि, समिक्षक, चिंतक
आंतरराष्ट्रीय परिषदों के संशोधन पेपर परिक्षक
मो. न. ९३७०९८४१३८, ९२२५२२६९२२
जब हम बुद्ध काल में *"वैदिक ब्राह्मण आर्य धर्म"* अस्तित्व पर संशोधन करते है, तब हमें *"बम्हन"* और *"ब्राह्मण"* यह संज्ञा, दो विभिन्न वर्ग अर्थ मे दिखाई देती है. बुद्ध काल में *"बम्हन"* यह शब्द - *"समन / विद्वान"* इस अर्थ से दिखाई देती है. हमे इस संदर्भ को पुर्ण रुप से समझने के लिये, इ.पु. षटवी - पाचवी शती की लिपी, *"धम्म लिपी या बाम्ही लिपी"* को समझना बहुत ही जरुरी है. प्राचीन भारत सभ्यता लिपी *"सिंधु घाटी सभ्यता लिपी"* को, अभी तक भी पढा / समजा नहीं गया. इस के बहुत से कारण भी रहे है. इस पर चर्चा हम फिर कभी करेंगे. परंतु *"पालि भाषा"* यह पढी गयी है / समझी गयी है / और उमगी भी गयी है. तत्कालीन प्राचीन भाषा मागधि भाषा या *"पाली भाषा"* यह रही थी. अत: तत्कालीन *"पालि भाषा"* तथा इ.पु. तिसरी शति की *"हिब्रू संस्कृत भाषा"* इनके संदर्भ को समझना होगा. वह काल बुध्द धर्म के *"हिनयान - महायान संप्रदाय"* विभाजन संक्रमण का विशेष काल है. हिनयान संप्रदाय यह बुद्ध की मुलं भाषा, *"पालि भाषा"* से ही जुडा रहा. वही महायान संप्रदाय ने *"पालि भाषा पर संस्कार कर हिब्रू संस्कृत भाषा"* का, नविन अविष्कार किया. पालि भाषा पर संस्कार होने से, उसका नामकरण यह *"संस्कृत"* पडा है. इसवी दसवी ग्यारहवी शति में, *"वैदिक ब्राह्मण धर्म"* का उदय होता है. और हिब्रू संस्कृत भाषा पर, वैदिक काल में फिर से नविन संस्कार होकर, *"क्लासिकल संस्कृत भाषा"* का जन्म हुआ. आज की संस्कृत भाषा भी क्लासिकल संस्कृत भाषा ही है.
पालि भाषा का सर्व प्रथम वैय्याकरण *"कच्चायन"* इन्होने कराने का संदर्भ मिलता है. पालि व्याकरण यह तिन भागों में विभक्त है. *"कच्चायन व्याकरण / मोग्गलान व्याकरण / अग्गवसकृत - सद्यनीति."* पालि भाषा में ४१ ध्वनिया और १० स्वर है. प्राकृत भाषा में भी १० स्वर है. संस्कृत भाषा में १३ स्वर है. अपभ्रंश भाषा में ८ स्वर है. हिंदी भाषा में केवल ११ स्वर है. *"पालि - प्राकृत भाषा की अंतिम अपभ्रंश अवस्था ही आदि हिंदी है."* उसके बाद अठरह शति में *"आधुनिक हिंदी भाषा"* का अविष्कार हुआ. भगवान महावीर का जन्म इ. पु. ५४० है. भगवान बुद्ध का जन्म उनके *"२३ साल पहले"* इ.पु. ५६३ में हुआ. परंतु लुंबिनी में हुयी खुदाई में, डरहम विद्यापीठ के *डॉ रॉबिन कनिंगहॅम* इनके नेतृत्व में संशोधन किया गया. *"कार्बन डेटिंग"* से बुद्ध का जन्म उसके भी *"७० साल पहले इ.पु. ६२४* को बताया गया है. नेपाल के लोग भी बुद्ध का जन्म इ.पु. ६२४ को मानते है. अत: हम *"बुद्ध का जन्म इ.पु. ६२४"* को समझे या नहीं, इस पर निर्णय लेना बहुत जरुरी है. *पालि भाषा* में *"ऋ / श / ष / क्ष / त्र / ज्ञ / र"* यह शब्द नहीं दिखाई देते. जब कि *संस्कृत भाषा* में यह शब्द हमें दिखाई देते है. *सम्राट अशोक* इनके शिलालेखों में *"पियदसि लाजा"* यह संदर्भ दिखाई देते है. अर्थात *"प्रियदर्शी राजा."* आगे जाकर हमें *"र"* यह शब्द दिखाई देता है. और धम्म इस शब्द की व्याख्या का *"अत्तनो सभावं, अत्तनो लख्खनं, धारेति ति धम्मो |"* (अर्थात - जो अपने स्वभाव को धारण करता है, जो अपने लक्षणों को धारण करता है, उसे ही धम्म - धर्म कहते हैं) हमें बोध होता है. *"नागरि लिपि"* शब्द का अविष्कार *"नाग + रि"* अर्थात नाग लोंगों की और *"रि"* यह शब्द *"संबंधकारक शब्द"* है. अत: वैदिक ब्राह्मण यह *"आर्य"* शब्द भी *"हिब्रू संस्कृत"* का परिपाक है.
ब्राह्मण वर्ग यह *"हिंदु धर्मीय"* नहीं था, इसके प्रमाण हैदराबाद संस्थान के रिकार्ड्स भी देते है. सन १९२४ का *"वैदिक अंक"* भी कराता है. अंग्रेज शासन काल में, ब्राह्मण वर्ग ने *"हिंदु धर्मीयों"* से दुरी बनायी थी. ब्राह्मणी इतिहास यह *"आमने - सामने लढाई"* कराने का दिखाई नहीं देता. ब्राह्मणी *"डी.एन.ए. रिपोर्ट"* भी अलग ही कहानी बयाण करता है. वैज्ञानिक *मायकल बामशाद* इन्होने सन २००१ में, ब्राह्मण वर्ग विदेशी होने का संशोधन किया है. ब्राह्मण वैदिक धर्म का *"उदय इसवी दसवी ग्यारहवी शति"* तो है, परंतु *"ब्राह्मणी युग पतन"* का इतिहास सहजता से दिखाई नहीं देता. ब्राह्मण प्रवृति भी दो भागों में, *"सनातनी ब्राम्हण / प्रगतीशील ब्राह्मण"* विभाजीत की गयी है. विश्व के कुछ प्रमुख सभ्यताओं जिक्र किया जा सकता है. *"सिंधु घाटी सभ्यता* (इ.पु. ३३०० - १७००/ *चायना सभ्यता* (इ.पु. २०७० - १९११) / *मेसोपोटेमिया सभ्यता* (इ.पु. १०,००० - ५३९) / *इजिप्त नाईल सभ्यता* (इ.पु. ३१०० - ३१००) / *अक्कडियन सभ्यता* (इ.पु. २३५० - २१५०) / *सुमेरियन सभ्यता* (इ.पु. ४५०० - ४०००) / *बेबोलियन सभ्यता* (इ.पु. १७०० - १६००) / *असिरियन सभ्यता* (इ.पु. १००० - ६०९). वही भारत में *"पुर्व सिंधु घाटी सभ्यता "* (इ.पु. ८००० - ३३००) भी हरियाणा के *भिर्राणा / राखीगडी* में हमें दिखाई देती है. फारसी वैज्ञानिक *अलबरुनी* (इसवी ९७३ - १०४८) इन्होने ने उनके संशोधन में, ब्राह्मणी वेद का उल्लेख कही भी नहीं बताया. विदेशी इतिहासकार *मेगस्थनीज* (इ.पु. ३६५) यह सम्राट अशोक दरबार में था. और उसने *"इंडिका"* नामक ग्रंथ लिखा. वहां भी *"ब्राह्मण वर्ग"* होने का कोई प्रमाण नही है. उसने *"सात वर्ग"* का जिक्र किया है. *"विद्वान वर्ग / खेतिहार वर्ग / पशुपालक वर्ग / कारागिर - प्रशासकीय वर्ग / सैनिक वर्ग / दुकानदार वर्ग / गरिब वर्ग."* वही विदेशी इतिहासकार *एरियन"* (इ.पु. ९५ - इसवी १७६) ये भी, उसी संदर्भ की पुष्टी करता है. बुद्ध काल तथा बुद्ध प्रभाव काल में, जाति विभाजन दिखाई नहीं देता. वही विभिन्न *"वंश राज व्यवस्था"* हमें दिखाई देती है. जैसे - *"शाक्य वंश / कोलिय वंश / मौर्य वंश / हरयक वंश / कुषाण वंश / सुंग वंश / सक वंश / गुप्त वंश / पाल वंश."*
ब्राह्मण वर्ग यह *"विदेशी होने"* का जिक्र तो *बाल गंगाधर तिलक* से लेकरं, बहुत से ब्राह्मण इतिहासकारो ने ही किया है. परंतु *"विदेशी"* होने पर भी, वे कहां से आये है ? इस संदर्भ में विरोधाभास भी है. जैसे - *"सेंट्रल एशिया / सायबेरिया / मंगोलिया / ट्रांसकोकेशिया / स्कैंडेनेलिया / इराण....* कुछ विद्वान वर्ग उन्हे - *"स्टेफि चरवाह"* (गडरिया) श्रेणी से जोडकर उनका व्यवसाय पशुपालन बताया है. बुध्द धर्म यह इ.पु. तिसरी शति में *"हिनयान - महायान संप्रदाय"* विभाजन होने के बाद, इसवी पाचवी शति में महायान ने *"वज्रयान संप्रदाय"* को / इसवी आठवी शति में वज्रयान ने *"तंत्रयान संप्रदाय"* को जन्म दिया. इसवी ८५० (नववी शति) में *शंकर* नामक व्यक्ती का जन्म होकर / वह स्वयं को *"प्रछन्न बौध्द"* कहलाता है. वही इसवी दसवी शति में वज्रयान - तंत्रयान संप्रदाय ने, *"शैव पंथ / वैष्णव पंथ / साक्त पंथ"* को जन्म दिया. अत: *"बुध्द धर्म के अवनति"* का कारण *"संप्रदाय विभाजन"* / तथा *"पंथ को जन्म देना"* भी रहा है. इसके बाद शंकर नामक व्यक्ती ने *इसवी दसवी शती* में, स्वयं को *"आदि शंकराचार्य"* घोषित कर, समस्त *"महायान संप्रदाय बुद्ध विहारों"* पर अधिपत्य किया. और *"चार पीठ"* (शारदा पीठ, गुजरात / श्रृंगेरीपीठ, केरल / ज्योतिर्मठ पीठ, उत्तराखंड / गोवर्धन पीठ, पुरी) की स्थापना की. और उन्ही चार पीठों में *"वेदों की रचना"* की गयी. बुध्द धर्म के सभी संदर्भ *"शिलालेख / ताम्रपट / ताडपत्र"* दिखाई देते है. वही *"ब्राह्मणी वैदिक धर्म"* (इसवी ग्यारहवी शति) के सभी संदर्भ यह *"कागज"* पर अंकित है. *"कागज का शोध"* इसवी दसवी शती में, *"चायना"* देश में लगा. अत: बुद्ध धर्म अवनति का तिसरा - चवथा कारण यह तो, *आदि शंकराचार्य* का उदय / *वैदिक ब्राह्मण धर्म* की स्थापना दिखाई देता है. *पुष्यमित्त सुंग* तो बौध्द राजा था. मौर्य - सुंग वंश संघर्ष यह *"सत्ता संघर्ष"* रहा है. सम्राट अशोक शिलालेख मे कही भी *"ब्राह्मण धर्म / चाणाक्य"* का संदर्भ नही है. परंतु इतिहास में कही भी, *"ब्राह्मण धर्म अवनति"* का जिक्र हमें दिखाई नहीं देता. यह तो एक बहुत बडी *"मिस्ट्री"* दिखाई देती है. परंतु *"भारत गुलामी का इतिहास"* जरुर दिखाई देता है. भारत में *"विभिन्न राजे - महाराजे सत्ता पद लालसा"* ही भारत के गुलामी नीवं रही है. यहां कौन राजा *"देशभक्त"* था / है ? यह संशोधन का विषय है. फिर वह *"मुगल से लेकरं अंग्रेजो की गुलामी"* क्यौं ना हो ? वह अलग ही इतिहास बयान करता है. अर्थात *"अस्तिन के साप"* या *"देश के गद्दार"* कौन है ? यह आप विचारविद को ही तय करना है. यहां हम *"भारत इतिहास लेखक"* के बुध्दी पर क्या कहे ??? जयभीम !!!
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▪️*डॉ. मिलिन्द जीवने 'शाक्य'*
नागपुर दिनांक १५ मार्च २०२६
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