👌 *बुध्द के प्रेम शांतीमय आरा में ...!*
*डॉ. मिलिन्द जीवने 'शाक्य'*
मो.न. ९३७०९८४१३८
बुध्द के प्रेम शांतीमय आरा में
हम निकले है करूणा की ओर ...
तुफान भरे उस महा लाटा में
किनारा छुप गया अपना जोर
खोजने निकला अपने भाव में
हारे मन ही चला बुध्द की ओर ...
धर्म की उस हिन राजनिती में
तुम ले गये हो गुलामी की ओर
सुलाकर जन को निंद नशा में
देश का वजुद मिटाने की ओर ...
अब तुम जागो नये विचारों में
खैर समझो खुशयाली की ओर
नही तो उस आँधी ललकार में
मर मिट जाओंगे गांधी के ओर ...
* * * * * * * * * * * * * * * * *
(भारत राष्ट्रवाद समर्थक)
*डॉ. मिलिन्द जीवने 'शाक्य'*
मो.न. ९३७०९८४१३८
बुध्द के प्रेम शांतीमय आरा में
हम निकले है करूणा की ओर ...
तुफान भरे उस महा लाटा में
किनारा छुप गया अपना जोर
खोजने निकला अपने भाव में
हारे मन ही चला बुध्द की ओर ...
धर्म की उस हिन राजनिती में
तुम ले गये हो गुलामी की ओर
सुलाकर जन को निंद नशा में
देश का वजुद मिटाने की ओर ...
अब तुम जागो नये विचारों में
खैर समझो खुशयाली की ओर
नही तो उस आँधी ललकार में
मर मिट जाओंगे गांधी के ओर ...
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(भारत राष्ट्रवाद समर्थक)
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