Friday, 3 July 2026

 .👌 *विपश्यना - फालुन दाफा साधना से लेकर फालुन गोंग साधना अभ्यास तक जुडे इन महायान - वज्रयान विचारों की उलझन में थेरवादी - नवयान समुह !* (ली होंंगजी लिखित फालुन गोंग / जुआन फालुन पुस्तक समिक्षा)

     *डॉ. मिलिन्द जीवने 'शाक्य'* नागपुर १७

राष्ट्रिय अध्यक्ष, सिव्हिल राईट्स प्रोटेक्शन सेल

एक्स व्हिजिटींग प्रोफेसर, डॉ बी आर आंबेडकर सामाजिक विज्ञान विद्यापीठ, महु म.प्र.

एक्स मेडिकल आँफिसर एंड हाऊस सर्जन

बुध्द आंबेडकरी लेखक, कवि, समिक्षक, चिंतक

आंतरराष्ट्रिय परिषदों के संशोधन पेपर परिक्षक

मो.न. ९३७०९८४१३८, ९८९०५८६८२२


          चायना के *"फालुन दाफा'* साधना पध्दति का, बगिचे आदि जगहों पर सहजतासे अभ्यास करते दिखना, इस कारणवश बहुत से भारतीय लोक, जाति - पाति - पंथ - धर्म से उपर उठकरफालुन दाफा की ओर आकर्षित हो रहे है. बहुत से जगहों पर फालुन की प्रदर्शन लगना, प्रसार - प्रचार तंत्र भी होता हुआ, हमें दिखाई देता है. नागपुर के *"लोकमत भवन आर्टगॅलरी"* में भी *"फालुन दाफा"* प्रदर्शनी का आयोजन हो चुका है. मुझे आयोजन टीम से निमंत्रण होने से, मैं मेरी *"सिव्हिल राईट्स प्रोटेक्शन सेल"* टीम के साथ, फालुन दाफा प्रदर्शनी देखने गया था.वहां फालुन दाफा टीम के साथ मेरा परिचय भी हुआ.साथ ही चायना देश में *"फालुन दाफा"* टीम के साथ, चलनेवाला *"शोषण संघर्ष "* भी सामने आया है. फालुन दाफा साधना पध्दती के प्रायोजक - *ली होंगजी* इन्होने, *चीन* सत्ता शासन क*"शोषण नीति"* के कारण, चायना छोडकर *"अमेरिका"* होने की चर्चा है. *"फालुन दाफा"* इस शब्द का सहज अर्थ - फालुन = सिध्दांत चक्र / दाफा = विधाता का ज्ञान, विश्व का महान मार्ग सिध्दांत, साधना शक्ति - अभ्यास, इस अर्थ स देखा जाए तो, *"फालुन दाफा = सिध्दांत चक्र साधना शक्ति - अभ्यास "*(सिध्दांत चक्र विधाता का ज्ञान) भी कह सकते हैं. *"फालुन गोंग"* इसका अर्थ - *"शरीर + मन दोनों की साधना प्रणाली"* बतायी गयी है. इस साधना पध्दती के अभ्यास के कारण ही, *"शारिरीक - मानसिक"* रुप में *"स्वास्थ "* पर, सकारात्मक परिणाम होना बताया जाता है. अब हम उपरोक्त *"साधना पध्दती"* के इतिहास  - अभ्यास परिणाम, *"विपश्यना"* आदी विषयों पर भी हम चर्चा करेंगे.

     ‌       *"फालुन"* (सिध्दांत चक्र) संदर्भ की, *ली होंगजी* लिखित दो पुस्तके *"फालुन गोंग"* तथा *"जुआन फालुन"*  यह पुस्तके मैने पढ़ी है. साथ साथ ही *"विपश्यना"* साधना पध्दति पर भी वाचन किया है. *"विपश्यना"* का सरल अर्थ - *"अंतर्दृष्टी या स्पष्ट दृष्टी"* कह सकते हैं. विपश्यना में *"जो वस्तु जैसी है, उसे ठिक वैसे ही देखना है - समझना है"* यह भी कह सकते हैं. विपश्यना यह तो, *"आत्मनिरिक्षण"* एवं *आत्मशुध्दी"* की साधना पध्दति बतायी जाती है. इसे *"प्राणायाम"* और *"साक्षीभाव"* इसका मिलाजुला योग भी, कुछ मान्यवर कहते हैं. कुछ मान्यवर *"बुध्दीझम"* से इसका संबंध नकारते भी है. इस संदर्भ में सविस्तर चर्चा हम फिर कभी करेंगे. परंतु व्यक्ति के *"शारीरिक  - मानसिक स्वास्थ्य"* के लिये, *"साधना अभ्यास"* करना कुछ बुरा नहीं है. प्रश्न जब *"बुद्ध धम्म"* से जुडा हुआ होता है, तब *"विपश्यना / फालुन दाफा"* समान किसी भी साधना पध्दती का, कोई भी औचित्य नहीं होता, यह समझना भी जरूरी है. हम लोग *"धम्म और साधना पध्दति"* को एक साथ जोडकर, विवादों को जन्म देते है. *"धम्म"* यह बहुत बडा विषय है. *धम्म* यह आचरण का साधन है. *"साधना"* यह केवल शरिर शुध्दता का साधन है. इसलिए बुध्द हमें *"अष्टांग मार्ग"* पालन की सिख देते है. *"धम्म"* से बढकर कुछ भी नहीं है. *"धम्म"* यह व्यक्ती के साथ साथ, *"समुदाय सापेक्ष"* विषय है. जब कि *"साधना"* यह *"व्यक्ती सापेक्ष"* विषय है, यह समझना भी बहुत जरूरी है. इस लिये केवल *"बुध्द"* यह धर्म (धम्म) बना. ना कि, *"विपश्यना / फालुन दाफा"* यह साधना पध्दती - *"धर्म बना !!!"*

          *"फालुन"* (सिध्दांत चक्र) द्वारा संबंधित *"फालुन गोंग / जुआन फालुन"* यह दो पुस्तके *"ली होंगजी"* इनके *"चीनी भाषा"* में दिये गये, कुछ *"भाषणों का संकलन"* दिखाई देता है. दुसरा संदर्भ यह कि, *"भाषांतरण"* होने के बाद में *"अर्थ"* संदर्भ में बदलाव संभव हुआ हो. और *ली होंगजी* की वह पुस्तके, *"भाषण संकलन"* होने के कारण, *"विषय संदर्भ के अनुक्रम / विषय सादरीकरण"* भी जैसा चाहिए, वैसे हुआ दिखाई नहीं देता. साथ ही *"जी होंगजी"* इनका जुडाव *"महायान / वज्रयान / तंत्रयान"* रहा है. उसमें *"ताओ विचार"* की भर पड गयी. अत: *होंगजी* इनकी  *"वैचारिक स्पष्टता "* ना होने से, पुस्तक *"उद्देश लिखाण से भटकना"* यह दिखाई देता है. अगर उन्होने उद्देश लेकरं पुस्तक लिखी होती तो, वह *"पुस्तक लिखाण"* अलग होता. और उनके द्वारा *"संकलित बतायी गयी साधना पध्दती - एक उन्नत साधना प्रणाली है,"* यह बताने भी वे भुलें नहीं है. कही कही तो *ली होंगजी* इन्होने, *"बुध्द से भी बडा होने की स्वयं तारिफ"* भी की है. जब कि *युनो"* ने, विश्व का सर्वोत्तम शांती धर्म *"बुद्ध धर्म"* को माना है. *ली होंगजी* इन्होने तो, *"जन / शान / रेन"* (सत्य / करुणा / सहनशीलता)  इस त्रयी से ही, उनके *"साधना का मार्ग"* बताया हुआ है. *बुध्द* तो उसके आगे भी चले गये है. *"बुध्दत्व प्राप्ति"* को साधना, क्या *होंगजी* के साधना से संभव है ? यह भी प्रश्न है‌. *होंगंजी -  "चीगोंग* (प्राण शक्ति) / *गोंग* (साधना शक्ति) / *फाशन* > फा > सिध्दांत शरीर - ज्ञानप्राप्त व्यक्ती का शरीर/ *शिनपिंग* (मन या हृदय की प्रकृति) / *दान* (शक्ति पुंज) / *दिव्य नेत्र* (माथे का मध्य) आदि आदि शब्दों के बिच ही, उनकी *"साधना घुमती"* हुयी नज़र आती है. उन्होंने *"साधना और अभ्यास"* इसको अलग अलग माना है. *तथागत बुध्द* इनके महापरिनिर्वाण (इ. पु. ४८३ नये शोध अनुसार इ. पु. ५४३) के बाद, *पहिली शती* (इसवी ७२) में कश्मिर हुयी - *"चवथी बौध्द सांगिती"* में, बुद्ध धर्म यह *"हिनयान / महायान"* संप्रदाय में विभक्त हुआ. इतिहास में *"हिनयान"* यह १८ भागों में विभाजीत होने का संदर्भ है. साथ ही, *"थेरवाद (स्थविरवाद) / सर्वास्तिवाद (वैभाषिक) / सौतांत्रिक"* यह प्रमुख तिन संप्रदाय दिखाई दिये. यही नहीं तो, *"हिनयान / थेरवाद"* बौध्द संप्रदाय भी अलग अलग बताये गये. वही *"महायान "* (पहिली शती में उदय) ने *"वज्रयान (५ - ७ वी शती) / तंत्रयान संप्रदाय (८ वी शति)"* को जन्म दिया. वही वज्रयान / तंत्रयान ने, *"शैव पंथ / वैष्णव पंथ / शाक्त पंथ"* (९ - १० वी शति में) इनकी निव भी रखी. परंतु *होंगजी* इन्होने उन संदर्भ के प्रस्तुतीकरण को, समजा हुआ हमें दिखाई नहीं देता. महत्वपूर्ण यह कि, *"हिनयान / महायान / वज्रयान / तंत्रयान"* बौध्द संप्रदाय विचार तथा *"विपश्यना"* साधना विचार भी, यह सहजता से समझे जा सकते हैं. *बाबासाहेब डॉ आंबेडकर* इन्होने १४ अक्तुबर १९५६ को, हिनयान में कुछ सुधार कर *"नवयान बौध्द"* होने की बात कही. *"दि बुद्धा एंड हिज धम्मा"* यह ग्रंथ बहुत सरल सोपी भाषा में लिखा है. परंतु *ली होंगजी* द्वारा लिखित साधना संदर्भीत पुस्तके, सरल - सोपी भाषा में नहीं दिखाई देते. अत: सरल सोपी भाषा में ही *"फालुन साधना - अभ्यास"* लिखाण का प्रयास हो.

            *ली होंगजी* इन्होने "फालुन" संदर्भीत पुस्तक में, *"चीगोंग"* (प्राणशक्ती) का संदर्भ, *"प्राचिन काल"* से बताया है. बुध्द काल का संदर्भ देखे तो, *"भिक्खु संघ"* के भिक्खु लोग *"अर्हत / बोधिसत्व"* अवस्था तक जाने का संदर्भ है. उनकी साधना पध्दती यह *"शाक्यमुनी बुध्द"* इनके विचारों की रही है. प्राचिन काल में *"२८ बुध्द"* होने का संदर्भ है. ८४ हजार बुध्द नहीं. *अवलोकितेश्र्वर* इनको तो *"बोधिसत्व"* बताया गया है. *"बुद्ध नहीं."* तथा *नागार्जुन* इन्हे भी बोधिसत्व ही बताया गया है. उनका संदर्भ भी महायान से जोडा जाता है. महायान संप्रदाय में *"मंजुश्री / मैत्रेय"* आदि का संदर्भ आता है. *बाबासाहेब डॉ आंबेडकर* इन्हे भी, काठमांडू के "जागतिक बौध्द परिषद - १९५४" में, *"बोधिसत्व"* यह महान बौध्द पदवी, भिक्खु संघ द्वारा ही दी है. महायान / हिनयान बौध्द साहित्य पर, हम फिर कभी चर्चा करेंगे. *"फालुन गोंग"* (शरीर + मन दोनों की साधना प्रणाली) का संदर्भ बौध्द साधना प्रणाली से जुडा दिखाई देता है. बुध्द धर्म में *"आत्मा"* इस वस्तु को नकारा है. *बुध्दघोष* इन्होने *"विशुध्दीमग्ग"* ग्रंथ में आत्मा नकारते हुये कहा कि, *"कम्मस्स कारको नत्थि विपाकस्स च वेदको | सुध्दधम्मापवत्तन्ति एव ऐतं सम्मादस्सनं ||"* (अर्थात - कोई कर्ता नहीं है, जो कर्म को करता है, शरीर का अवयव घटक चक्र स्वयं ही अपने आप घुमते रहाता है. यही वस्तुस्थिती है.) *वेदांत दर्शन* ने भी  *"आत्मा"* संदर्भ में, *बुध्द* के विचारों की ही कॉपी की है. जैसे - *"नात्मा भावेषु ....!"*- (अष्टावक्र गीता ७:४) (अर्थात - शरीर में आत्मा नहीं रहती.) बुध्द ने विश्व का कर्ता नहीं माना. *"न हेत्थ देवो ब्रम्ह संसारस्य अत्थि कारको | बुध्दधम्मा पवत्तन्ति हेतुसंभारपच्चया ति ||"* (अर्थात - विश्व का कोई कर्ता नहीं है. सृष्टी के नियमानुसार सृष्टी चक्र अपने आप शुरु रहता है.) *"विपश्यना"* का उल्लेख *सुत्तपिटक* (दिघनिकाय) इसमें दिखाई देता है. *"अंगुत्तर निकाय"* (कालामसुत्त) में बुध्द ने, *"तंत्र - मंत्र - दैवी शक्ति"* को नकारा है. बुध्द ने *"चार भौतिक तत्व"* को ही माना है. - *"पृथ्वी / आप (जल) / तेज (अग्नि) / वायु"* तत्व. बुध्द ने *"आकाश"* तत्व को नहीं माना. *"मृत्यु"* के उपरांत शरीर भी, *"चार तत्वों"* में ही विलिन हो जाता है. अत:  *जी होंगजी* इन्होने बुध्द के इस विचार को समझना होगा. *"महायान का उदय"* पहिली शती में हुआ था. और *"त्रिपिटक"* का निर्माण तो, यह उसके ही पहले, *"तिन बुध्द सांगिती"* में हो चुकां था. *"फालुन गोंग अभ्यास पध्दति"* इस प्रकरण को छोडा जाए तो, समस्त पुस्तक *"सिर के उपर से"* जाती हुयी दिखाई देती है. *"फालुन गोंग"* में पांच क्रियाओं का संग्रह है. *"बुध्द सहस्त्र हस्त प्रदर्शन क्रिया / फालुन स्थिर मुद्रा क्रिया / विश्व के दो छोरों का भेदन क्रिया / फालुन अलौकिक परिपथ क्रिया / दिव्य शक्तियों को सुदृढ करने का मार्ग क्रिया."* अत: अन्य साधना पध्दति सरल पध्दति से कैसे हो ? इस प्रकार साधना पुस्तक की रचना कराकर,  *ताओ विचार* आदि अवांतर विषयों को समावेश ना करे तो, यह बहुत अच्छा होगा. साधना अभ्यास में *"शुद्ध बुद्ध विचार"* हो. मिलावट नहीं !!! अंत में *"साधना विचार"* यह हमारा अंतिम उद्देश (ध्येय) नहीं है. *"शुध्द मुल बुध्द धम्म"* पालन / प्रसार - प्रचार ही हमारा उद्देश होना, बहुत ही जरुरी है. हम केवल *"साधना"* की बीच ही उलझकर, हमारा *"मुल उद्देश"* को भुलं रहे है. *"विपश्यना / फालुन दाफा"* आदि साधना से बाहर निकलने में, वह साधक लोग उदासीन ही दिखाई देते है. जो भविष्य में हमें हमारे *"बौध्द धर्म"* (धम्म) के अस्तित्व की समस्या होगी !

         जय भीम ! नमो बुध्दाय !!!


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▪️ *डॉ मिलिन्द जीवने 'शाक्य'*

       नागपुर दिनांक ३ जुलै २०२६

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