Monday, 14 October 2019

💧 *मै तेरे एक बूंद को तरसा हुं...!*
       *डॉ. मिलिन्द जीवने 'शाक्य'*, नागपुर
        मो.न. ९३७०९८३१३८

कुदरत की छाया में रहता हुं
मै तेरे एक बूंद को तरसा हुं...

वह स्मित काल याद करतां हुं
वो जल बरबादी में खामोश हुं
हवा के प्रदुषण को सहता हुं
अरे क्यौं घुट घुटकर जीता हुं...

आदमियों के छल को देखता हुं
धर्मांध युध्द को ना रोक पाता हुं
सत्तांध कु-नीति का ही शोषित हुं
उठाव क्रांती शब्द लिख देता हुं...

फूलों के सुगंध में रम जाता हुं
तितलींयो से ही प्यार करता हुं
हरियाली वादियों मे खेलता हुं
बुध्द को मै तब समझ पाता हुं...

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