Thursday, 1 November 2018

👌 *ये सभी बुध्द का है...!*
           *डॉ. मिलिंद जीवने 'शाक्य', नागपुर*
            मो. न. ९३७०९८४१३८

इन फूलों मे, इन रंगो मे, ये गंधो मे बुध्द है
ये धरती, ये आसमंत ही, ये सभी बुध्द का है...

जहां आतंक ने घर किया, अशांत का वास है
उच्च निचता के भेद मे, वहां शैतान बसा है
गुलामी के राज मे, अरे कोहरा ही तो मचा है
मरने को बचाने वाला, अब बुध्द ही शेष है...

यहां हिंसा को मात देकर, अहिंसा का नाद है
अरे, अशांती मे शांती लाना, वही बुध्द राज है
दानव को इंसान बनाना, वही तो मिशन है
बुध्द के वाणी में, केवल यही तो एक सत्य है...

अशोक के उस नाद में, अब भीम की ज्वाला है
धम्म का ये बुध्द चक्र, संसार में घुम रहा है
ना कोई उसे रोक पाये, मजाल ना किसी में है
अंधकार के राह पर, अब बुध्द ही याद है...

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