Friday, 30 January 2026

 👌*मेरी चित्र कविता!* (बुद्ध से संविधान तक)

      *डॉ. मिलिन्द जीवने 'शाक्य'*

       मो. न. ९३७०९८४१३८


कानुनी दस्तावेज रुप में तुम संविधान हो 

तुलना तो किसी ग्रंथ से हो ही नहीं सकती 

क्यौं कि हर कोई धर्म ग्रंथ से तुम अलग हो 

तुम्ही ने देश को एकसंघ बांधकर रखा है...


हे तुम्हारी प्राचीन धरोहर ही मेरी‌ यादें है 

मेरा जीवन अतित तुम ही याद रखती हो 

जब कभी हम तुमको मिलने आते रहते है 

तुम भी अपना अतित बयान करती रही हो...


हर कोई इंसान किसी तो भी जंजिर मे कैद है 

बसं फर्क तो केवल वो स्वरुप का ही रहा है 

कोई गुलामी में दिखता है तो कोई आजादी में

पर हर कोई अपना वास्तव ही बताता नहीं है...


तुम प्रेम का नही करुणा का प्रतिक हो 

बुद्ध ने तुम्हे ही श्वेत रुप में स्वीकारा है 

कोई कितना भी रंग भरे तुम्हारे मन में 

तुम अपना गुण कभी भी नहीं भुलते हो...


------------------------------------------

नागपुर दिनांक ३१ जनवरी २०२६

No comments:

Post a Comment