Friday, 18 January 2019

🌙 * *बुद्ध की चंद्र किरण में...!*
                   *डॉ. मिलिन्द जीवने 'शाक्य'*
                    मो. न. ९३७०९८४१३८

सुर्य किरण की भावों में, यु हीं तुम तप कर
बुद्ध की चंद्र किरण में, तुम युं हीं चले आना...

जीवन काया संघर्ष में, आगे तुम बढ कर
आसुओं के समुंदर से, कही दुर चले जाना
ना साथीओं की राह देंखे, युं हीं चलते जाकर
बुलंदी के वजुदों का, तुम आशियाना हो जाना...

भीम के संघर्ष में, वो आवाज बुलंद होकर
युं ही नही चला कारवां, विश्वास का था तराना
गुट वादी धम्म मिशन की, वो पिडा देख कर
बाबा के वेदना भरी, आसु के गीत गाते जाना...

बुद्ध के स्मित भावों में, चिंता को युं ही देख कर
भारत के सोने की चिडिया का, कहीं ये खो जाना
कहां ढुंडे मकडीं जाल में, परी राज खो कर
फिर भी बाबा के संविधान ने, हमे जोड जाना...

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     ( *भारत राष्ट्रवाद की याद में...!*)

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