Thursday, 26 July 2018

🌊 *मै बुध्द की ओर बहता हुँ ...!*
        *डॉ. मिलिन्द जीवने 'शाक्य', नागपुर*
        मो.न. ९३७०९८४१३८, ९२२५२२६९२२

संसार एक दु:ख धारा है, उस का मै वारा हुँ
सुख शांती पाने को, मै बुध्द की ओर बहता हुँ ...

ये आसुओं का मन भी, इन आँखो में रहता है
दु:ख तो हर किसी को, पर कोई कह जाता है
बाटने से ना कम होगा, फिर भी छेड जाता है
जीवन का ये पहलु भी, मन धारा हो जाता है ...

आझादी मिलकर, मन फिर भी दु:खी रहा है
दु:ख कारणो के खोज में, बुध्द ने घर छोडा है
मध्यम मार्ग देकर हमे, विश्व को शांती दी है
सत्ता के मदमस्ती मे, हम ने दु:ख को पाला है ...

निसर्ग के फुल पंछी भी, ना कभी धोका देते है
सुखमय उन जीवों का, बोध ना हम लेते है
आदतों के लाचारी में, हम युं ही बह जाते है
दु:ख को स्वयं बुलाकर, हम चलते जाते है ...

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