Sunday, 19 May 2019

👌 *जहां वहां बुध्द है....!*
       *डॉ. मिलिन्द जीवने 'शाक्य', नागपुर*

यहां हिंसा की वादियों ने, अहिंसा का नाद है
यह बुध्द की ही क्रांती है, जहां वहां बुध्द है...
बुध्दं सरणं गच्छामी...!
धम्मं सरणं गच्छामी...!!
संघं सरणं गच्छामी...!!!

यहां फूलों के सुगंध मे, भंवर घुमते है
तितलीयों के प्यार में, वो बु़ध्द का ही रंग है
सुंदरता की आलम में, निसर्ग ही देन है
यें धम्म पाठ हमें तो, भीम ने ही पढाया है...

यहां अनीति के राज में, अरे क्रांती ऊठी है
उस चिंगारी मे भी हमें, बुध्द शांती दिखी है
भीम के संविधान से, आज मैफिल सजी है
इस देश की शान में, अशोक चक्र वाणी है...

यहां युध्द के भय में, ये इंसान जी रहा है
फिर भी अनीति राज की, दलाली हो रही है
अरे स्त्रीयों के अब्रु का, यहां बाजार खुला है
ना ही कृष्ण से - ना ही राम से, देश का भला है...

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