Thursday, 18 September 2025

 ✍️ *सरन्यायाधीश भुषण गवई इनके विरोध में खजुराहो के जावरा विष्णू मंदिर खंडित प्रकरण में उठे सवाल बनाम रामजन्मभूमी निर्णय में पाच न्यायाधीशों की बौध्दिक (?) क्षमता एवं प्रायमा फेसी !*

       *डॉ मिलिन्द जीवने 'शाक्य',* नागपुर १७

राष्ट्रिय अध्यक्ष, सिव्हिल राईट्स प्रोटेक्शन सेल 

एक्स व्हिजिटिंग प्रोफेसर, डॉ बी आर आंबेडकर सामाजिक विज्ञान विद्यापीठ महु मप्र

मो. न. ९३७०९८४१३८, ९२२५२२६९२२


         अभी अभी मा. सर्वोच्च न्यायालय के सरन्यायाधीश *भुषण गवई* तथा *न्या. आगस्तिन जार्ज मसिह* इनके खंडपीठ के सामने, *"जावरा मंदिर खजुराहो* (इसवी ९ - ११ वी शती) मध्य प्रदेश स्थित *"खंडित विष्णू प्रतिमा"* याचिका का प्रकरण सुनवाई के लिये था. वैसे *"मुर्तीकला" - गांधार शैली / मथुरा शैली"* यह बुद्ध धर्म की देण है. प्राचिन भारत में पहिली मुर्ती *"बुद्ध"* की ही बनी थी. *वैदिक धर्म या ब्राह्मण धर्म* पंडितो ने, *"बुध्द विहारो पर अधिपत्य"* कर ब्राह्मणी मंदिर बनाये थे. *"शैव पंथ / वैष्णव पंथ / शाक्त पंथ"* इस को जन्म भी *"वज्रयान - तंत्रयान"* इस बौध्द संप्रदाय ने ही *"इसवी ९ या १० वी शती"* में किया था. *"शिरच्छेदन"* भी बुद्ध मुर्ती का ही हुआ था. इस विषय पर सविस्तर चर्चा हम फिर कभी करेंगे. भुषण गवई इनकी खंडपीठ ने, राकेश दलाल द्वारा दायर याचिका *"भारतीय पुरातत्व विभाग"* (ASI) के अधिन होने से, उनकी वह याचिका खारीज की गयी. परंतु याचिका कर्ता की ओर से, वह याचिका खारिज होने पर भी दबाव बनाने वा हटवादिता दिखाई दी तो, सरन्यायाधीश *भुषण गवई* इन्होने कहा कि, *"जाओ, देवतांओं से ही कुछ करने को कहो. आप भगवान विष्णू के कट्टर भक्त हो तो, जाओ प्रार्थना करो !"* सरन्यायाधीश भुषण गवई इन्होने अपने इस बयाण में *"कहां भगवान को गाली दी है"* या भगवान का अपमान भी किया है ? अगर हम न्यायव्यवस्था अंतर्गत *"ब्राह्मण न्यायाधीशों"* के निर्णय और कथन का इतिहास निकाले तो, वह एक बडी किताब लिखी जा सकती है. तत्कालीन सरन्यायाधीश *धनंजय चंद्रचूड* का ही उदाहरणं ले. चंद्रचुड इन्होने तो *"रामजन्मभूमी प्रकरण"* पर निर्णय देते समय *"भगवान के शरण में ही गये थे. और भगवान ने ही उन्हे आदेश देना सिखाया.""* अर्थात ब्राह्मण न्यायाधीश वर्ग यह *"घुटना"* ही होते है, यह प्रमाण धनंजय चंद्रचूड हमें दे गये है. *"रामजन्मभूमी प्रकरण"* पर पाच न्यायाधीशों में, तत्कालीन सरन्यायाधीश *रंजन गोगोई* इनकी अध्यक्षतावाली पीठ में *न्या. शरद बोबडे / न्या. अशोक भुषण / न्या. धनंजय चंद्रचूड / न्या. अब्दुल नझीर* इन्होने दिनांक ९ नवंबर २०१९ को, *"बिना प्रायमा फेसी"* केवल भावना के आधार पर, वह निर्णय दिया था. जब की अयोध्या में *"बुद्ध के प्रमाण"* ही मिले थे. बौध्द वर्ग द्वारा दायर याचिका पर *"क्या निर्णय हुआ है ?"* यह प्रश्न अब भी अनुत्तरित है. यही है *"ब्राह्मण वर्ग का मेरिट !"* यह सभी बातें *"मैं अधिकार"* से इसलिए भी कहता हुं कि, मिशन कारण मेरी  *"अयोध्या"* तथा *"खजुराहो"* को भी भेट हुयी है. *"देश - विदेश भी मेरा भ्रमण"* यह तो आम विषय है.

            नयी दिल्ली के करंसी कांड के *न्या. यशवंत वर्मा*  का प्रकरण / लखनौ के *न्या. शेखर यादव* इनका ब्राह्मण धर्म मंच पर दिया गया *"अल्पसंख्याक विरोधी बयाण"* / अभी अभी *"दिल्ली उच्च न्यायालय"* द्वारा, रोहिणी न्यायालय के *"यु ट्युब प्रकरण"* पर ही, दुसरे पक्ष की बाजु सुनवाई बिना ही, आदेश करने पर भी अर्जंट में सुनवाई ना करना / इस ही कारणवश *"११ यु ट्यबर्स"* द्वारा *अडानी तथा अंबानी"* विरोध की *"१३८ व्हिडीओ"* को यु ट्युब से डिलिट होना (?), आदि उदाहरण भी ताजे है. मेरी स्वयं की सन २०१९ की मा‌ उच्च न्यायालय नागपुर की याचिका *"डॉ मिलिन्द जीवने विरुद्ध संविधान फाऊंडेशन नागपुर"* में, *"संविधान यह साहित्य नहीं है"* दायर की गयी थी. तब *न्या. रवी देशपांडे / न्या. विनय जोशी* इन्होने मेरे *"मुलभूत अधिकारों के हनन ना होने से"* मेरी याचिका निरस्त की थी. क्या मैने *"मेरे मुलभूत अधिकारों के हनन"* के लिये, याचिका दायर की थी ? *"भारतीय संविधान की उच्च गरिमा"* रखने के लिये, वह याचिका मेरे द्वारा दायर की थी. *भारतीय संविधान यह "कानुनी किताब" बिलकुल नहीं है. वह "कानुनी दस्तावेज"  है*. नागपुर उच्च न्यायालय निर्णय कारण ही, *"दिल्ली के जंतर मंतर पर संविधान जलाया गया था."* वही राजस्थान उच्च न्यायालय के सामने *"मनु का पुतला"* बिठाया गया है. *नागपूर / भंडारा* के *"जिला न्यायालय में गणपती"* बिठाया गया था. *मेरी शिकायत* के बाद ही उसे फिर उठाया गया. अर्थात ब्राह्मण मानसिकता को समझना भी जरुरी है. यह सभी उदाहरण देने का कारण यह कि, सरन्यायाधीश *भुषण गवई* इनके उपर *"जातियवादी हिनता"* की टिप्पणी की गयी है. *"जातीयवाद गाली"* दी गयी है. अत: ब्राह्मण वर्ग को उनकी *"वैचारिक औकात"* को बताना जरुरी है. भारत देश यह *"प्रजासत्ताक देश"* है. भारत देश यह *"धर्मनिरपेक्ष देश"* है. सभी धर्मों का हमें आदर करना जरूरी है. और राजनीति में *"धर्म से हटकर"* देश भावना जरुरी है. *"बंधुभाव"* जरुरी है. *"प्रेम - मित्रता"* जरुरी है.

       जय भीम !!!

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▪️ *डॉ. मिलिन्द जीवने 'शाक्य'*

       नागपुर दिनांक १८ सितंबर २०२५

Tuesday, 16 September 2025

👌 *नमो त्रिपिटकाय ...!*
        *डॉ. मिलिन्द जीवने 'शाक्य'*
        मो. न. ९३७०९८४१३८

नमो बुध्दाय नमो धम्माय नमो संघाय
हे नमो नमो नमो नमो नमो त्रिपिटकाय....

कारण कार्य भाव को मेरा आदर समाय
प्रतित्यसमुत्पाद तत्व को भी नमो कराय
हे अत्त दिपो भव विचारों ने मानव जगाय 
दि बुद्धा एंड हिज धम्मा को मेरा नमाय...

हे सुत्त पिटक हम मानव को सुत्त जताय 
विनय पिटक ने भिक्खु को आज्ञा कराय
अभिधम्म पिटक भी हमे युं मार्ग दिखाय 
बुध्द धम्म जगत में शांती अहिंसा जगाय...

‌हे वैर से वैर शांत नहीं होता ये संदेश कराय
त्रिसरण पंचशील अष्टांग मार्ग से है हिताय
दस पारमिता पालन करने से जग सुखाय
बुध्दं सरणं गच्छामी सुत्त चेताता है उपाय....

हे प्रेम मैत्री करुणा भाव ने बंधुभाव कराय
चित्तेन नियतो लोको द्वारा ये मन को चेताय
जन जन ये बहुजन हिताय बहुजन सुखाय
युध्द की बेला पर ही बुध्द का मंत्र जगाय...

हे धम्मचक्क पवत्तन से ही संसार जगाय 
चार अरिय सच्च से जगत को बोध कराय
अनत्त लक्खण सुत से भी ये क्रांती बनाय
बोधी वृक्ष देता रहा है प्रेरणा मन लुभाय...
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नागपुर दिनांक १६/०९/२०२५
(*बुध्दगया* में दिनांक २ - १२ दिसंबर २०२५ को महाबोधी सोसायटी बंगलोर द्वारा आयोजित *"त्रिपिटक एवं धम्म दान महोत्सव"* के निमंत्रण उपलक्ष में)

Saturday, 13 September 2025

 🔥 *नेपाली ब्राह्मण्य की जातीयवाद विरोध के ढगढगती ज्वाला में जलता हुआ नेपाल बनाम भारतीय ब्राह्मण्य जातीय राजनीति !*

      *डॉ मिलिन्द जीवने 'शाक्य'* नागपुर १७

राष्ट्रिय अध्यक्ष, सिव्हिल राईट्स प्रोटेक्शन सेल 

एक्स व्हिजिटिंग प्रोफेसर, डॉ बी आर आंबेडकर सामाजिक विज्ञान विद्यापीठ महु म.प्र.

मो. न. ९३७०९८४१३८, ९२२५२२६९२२


        भारत हो या नेपाल इस देश में, *"ब्राह्मण्य जातीयवाद"* राजनीति (?) सदियों से चलती आ रही है. *"ब्राह्मण्यवाद"* (?) यह देश के लिये कलंक है. और ब्राम्हण्यवाद गिरगिट के समान अपना रंग भी बदल लेता है. *डॉ बाबासाहेब आंबेडकर* इन्होने *ब्राह्मण्य रंग बदलती नीति"* पर कहा हैं कि, *"भारत का धर्म हमेशा के लिये हिंदु धर्म था, यह विचार मुझे मान्य नही. हिंदु धर्म तो सबसे आखरी में, विचारे की उत्क्रांती होने के पश्चात उत्पन्न हुआ है. वैदिक धर्म के प्रसार के बाद, भारत मे तिन बार धार्मिक परिवर्तन हुआ है. वैदिक धर्म का रुपांतर ब्राह्मण धर्म में और ब्राह्मण धर्म का रुपांतर हिंदु धर्म में हुआ है."* (कोलंबो ६ जुनं १९५०) नेपाल देश तो *"चक्रवर्ती सम्राट अशोक"* काल (इ.पु. २६८ - २३२) में, *"अखंड भारत"* का हिस्सा था. *"मौर्य कालखंड"* यह इ. पु. ३२२ - १८५ अर्थात १३७ साल तक रहा था. अखंड भारत के देश *अफगाणिस्तान* (१८७६) / *नेपाल* (१९०४) / *भुतान* (१९०६) / *तिब्बत* (१९०७) / *श्रीलंका* देश  (१९३५) / *म्यानमार* (१९३७) / *पाकिस्तान* (१९४७) / *बांगला देश* (१९७१) यह अखंड भारत से अलग हो गये. वह देश अलग क्यौ / कैसे हुये ? इसका अलग इतिहास है. इस पर चर्चा हम फिर कभी करेंगे. *"सिंधु घाटी सभ्यता"* (इ.पु. ३३०० - १९००) यह नगरीय सभ्यता थी. उत्खनन में मिले स्तुपों ने *"पहिले बुद्ध"* का परिचय कराया है. सिंधु घाटी सभ्यता में *"वैदिक धर्म / ब्राह्मण धर्म"* होने का, कोई प्रमाण नहीं मिला. *शंकर* नाम का व्यक्ति का जन्म *"इसवी ८५०"* हुआ. उसे ही *"प्रछन्न बौध्द"* भी कहा जाता है. वही *"आदि शंकराचार्य"* है, उसने ही *"महायानी बुध्द विहारों"* को, *"दसवी शती"* में चार पीठों में परिवर्तीत किया गया. वे चार पीठ है - *श्रृंगेरी पीठ*  केरला (यजुर्वेद) / *शारदा पीठ* गुजरात (सामवेद) / *ज्योतीर्पीठ* उत्तराखंड (अथर्ववेद) / *गोवर्धन पीठ* ओरिसा (ऋग्वेद). वेदों का निर्माण *"इसवी दसवी शती"* के बाद कागज पर लिखा गया. महत्वपूर्ण विषय यह कि, कागज का शोध *"इसवी दसवी शती में चायना"* मे ही लगा था. *"वज्रयान / तंत्रयान"* इस बौध्द संप्रदाय ने ही, *इसवी दसवी शती* काल में - *"शैव पंथ / वैष्णव पंथ / शाक्त पंथ"* को जन्म दिया था. हमें यह इतिहास को इसलिए समजना जरुरी है कि, इसवी दसवी शती के बाद *"बुद्ध धर्म"* का अवनति काल / *"वैदिक धर्म - ब्राह्मण धर्म "* का उदय होता है.

          अखंड भारत यह *"खंड खंड"* हो गया. परंतु *"वैदिक धर्म / ब्राह्मण धर्म"* का प्राबल्य भारत देश पर निर्माण हुआ. फिर भी भारत देश कभी *"हिंदु राष्ट्र "* बना ही नहीं. क्यौ कि, भारत पर *"राजेशाही"* हावी हो चुकी थी. परंतु *नेपाल* यह देश *"हिंदु देश"*  जरुर बना. भारत के समान ही नेपाल में भी, *"ब्राह्मण्य जातियवाद"* पनपने लगा. १५ अगस्त १९४७ को भारत का *"आजाद"* होना / २६ जनवरी १९५० को *"प्रजासत्ताक "* होना / *"भारत के संविधान"* में मागासवर्गीय समुहो को, *डॉ बाबासाहेब आंबेडकर* मार्फत अधिकार मिल जाना / भारत के संविधान ने *"भारत देश को एकसंघता"* में बांधे रखा. परंतु भारत से अलग हुये पडोसी देश - *"पाकिस्तान / श्रीलंका / नेपाल / बांगला देश / म्यानमार"* उन सभी पडोसी देशों में, कभी भी *"सत्ता का एकसंघीकरण"* (???) नहीं बन पाया ‌है / था. उन सभी देशों में *"सत्ता का विद्रोह / उठाव"* हमेशा होते रहा. *"आर्थिक परिस्थिती"* का भी सामना उन्हे करना पडा. नेपाल का संविधान *"२० सितंबर २०१५"* को लागु हुआ. और नेपाल का संविधान को लिखनेवाली *मागासवर्ग* समुह की महिला / सांसद - *कृष्णा कुमार पेरियार* यह थी. नेपाल संसद ने फिर नेपाल *"हिंदु राष्ट्र"* को तिलांजली देकरं, नेपाल यह *"धर्म निरपेक्ष देश"* बन गया. धर्म से दुर हो गया.

          सितंबर २०२५ नेपाल के इतिहास में *"हिंसाचार त्रासदी"* का कालखंड है. सत्ताधारी *"ब्राह्मण / छेत्री - क्षत्रिय"* समुदाय अर्थात *"खस आर्य"* राजनीति को चुनौति है. ब्राह्मण (नेपाली भाषा मे *"बाहुन"*) समुदाय जनसंख्या १२.२ % तथा क्षत्रिय जनसंख्या १६.६ % एवं *"कुल जनसंख्या २९ %"* है. और नेपाल सत्ता पर उनका अधिपत्य स्थापित रहा है. *"राष्ट्रपति / प्रधानमंत्री / सेना प्रमुख / सरन्यायाधीश / सभापति"* आदि सभी जगह ब्राह्मण / क्षत्रिय वर्ग छाया रही है. *"जातियवाद"* चरम सीमा पार है. सदियों से यह परंपरा चलते आ रही है.  ब्राह्मण / क्षत्रिय समुदाय के बच्चे *"विदेश"* में पढाई करते रहे है. आलिशान *"कार / बंगलों"* को लाभ उठा रहे है. आम जनता के लिये तो, *"सोशल मिडिया"* पर पाबंदी लगायी गयी है. *"बेरोजगारी / गरिबी / भुखमरी"* का आलम है. सत्ताधारी के विरोध में, *"नैपो बेबी"* कैफेन के *"विद्रोह ही चिंगारी"* सुलझ चुकी है. *"जेन झी"* बैनर के अंतर्गत आंदोलन है. *"नेपाल संसद / सुप्रीम कोर्ट / प्रधानमंत्री कार्यालय"* आदि आदि जलाये गये है. नेपाल के भुतपुर्व प्रधानमंत्री *झालानाथ खनल* इनकी पत्नी *रवि लक्ष्मी चित्रकार* यह आग की शिकार हुयी है. वित्त मंत्री *विष्णु पौडेल* इन्हे दौंडा दौडाकर मारा पिटा गया है. भुतपुर्व प्रधानमंत्री *शेर बहादुर देउबा* इनकी हालात खस्ता हुयी है. राष्ट्रपति *रामचंद्र पौडेल* इन्होने तो, राजीनामा पेशकश की है. प्रधानमंत्री *के. पी. शर्मा ओली* इन्होने पद छोड दिया है. *"मंत्री वर्ग"* ने भी राजीनामे दिये है. प्रधानमंत्री *"ना ब्राह्मण / ना क्षत्रिय / ना वैश्य"* यह नारे लगे रहे है. नया प्रधानमंत्री के रुप में *बालेंद्र शाह बौध्द* इनका नाम उछाला जा रहा है. *"अंतरीम सरकार की प्रधानमंत्री"* के तौर पर / सर्वोच्च न्यायालय की भुतपुर्व *"ब्राह्मण"* सरन्यायाधीश *मिसेस सुशिला गार्गी* इन्होने *"ब्राह्मण"* समुदाय के राष्ट्रपति *रामचंद्र पौडेल* इनके हाथो शपथ ली है. *सुशिला गार्गी* छोटासा मंत्रीमंडल गठन कर *"संसद को विसर्जित"* करने की बडी चर्चा जोरो पर है. देश की हालात सामान्य करने के लिये, *"नेपाली सेना"* ने मोर्चा संभाला भी है. यह सभी घटना देखकर मुझे *"श्रीलंका / बांगला देश / पाकिस्तान / म्यानमार"* इन देशों की याद आती है. उन देशों के *"प्रमुखों के हाल"* हमने देखे है. भारत की सत्तानीति भी, *"हुकुमशाही"* के ओर बढी हुयी दिखाई देती है. भारतीय *"प्रजातंत्र"* को धत्ता कर दिया हैं. भारत का *"पुंजीवाद"* मजबुत हुआ है. *"भारतीय अर्थव्यवस्था का बडा ही खस्ताहाल"* है. भारत में *"बेरोजगारी / गरिबी / भुखमरी"* का बडा आलम है. नेताओं के सुपुत्र *"मौजमस्ति"* कर रहे है. विदेशों में *"पढाई"* कर रहे है. भारत के सत्तावाद में भी *"ब्राह्मणवाद का बोलबाला"* है. भारत के उपराष्ट्रपती *सी. पी‌. राधाकृष्णन* ब्राह्मण वर्ग से संबंधित है. अत: क्या हम *"नेपाल / पाकिस्तान / बांगला देश / श्रीलंका"* इन देशों की *"परिस्थिती"* की वह राह देख रहे है ? इटली का *मुसोलिनी* / जर्मनी का *एडोल्फ हिटलर* आदि हुकुमशहा का *"दु:खद अंत"* हमने सुना है. दु:खद अंत का इतिहास रचा गया है. *"क्या हम उसका इंतजार करे ?"* एक अहं प्रश्न है सत्तानीति के लिये !!!


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▪️ *डॉ. मिलिन्द जीवने 'शाक्य*

       नागपुर दिनांक १३ सितंबर २०२५

 💐 *डॉ इंदिरा सोमकुवर इनकी सीआरपीसी हेल्थ विंग के राष्ट्रिय सचिव पद पर नियुक्ती !*


      *सिव्हिल राईट्स प्रोटेक्शन सेल* की डाटर कंसर्न राष्ट्रिय संघटन *"सी.आर.पी.सी. हेल्थ विंग"* के *"राष्ट्रिय सचिव "* पद पर *डॉ. इंदिरा सोमकुवर* इनकी नियुक्ति हेल्थ विंग के राष्ट्रिय अध्यक्ष *डॉ संजीव कांबळे* इन्होने की है. डॉ सोमकुवर इनकी नियुक्ती की जाणकारी सिव्हिल राईट्स प्रोटेक्शन सेल के *राष्ट्रिय अध्यक्ष* तथा सीआरपीसी वुमन विंग / सीआरपीसी एडव्होकेट विंग / सीआरपीसी एम्पाइज विंग / सीआरपीसी हेल्थ विंग / सीआरपीसी बुध्द आंबेडकरी साहित्यिक (लिटररी) विंग / सीआरपीसी ट्रेड्स एंड कॉमर्स विंग / सीआरपीसी ट्रायबल विंग / सीआरपीसी वुमन क्लब के "राष्ट्रिय पेट्रान" - *डॉ मिलिन्द जीवने 'शाक्य'* इन्हे दी गयी है. डॉ सोमकुवर सार्वजनिक दवाखाना में भी सेवा देती है. सोमकुवर इनके इस नियुक्ती पर सभी पदाधिकारी वर्ग ने उसका अभिनंदन किया है.

Saturday, 6 September 2025

 ✍️ *भारत की खस्ता आर्थिक व्यवस्था में डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर इनकी आर्थिक नीति चेतावणी एवं रिझर्व्ह बँक का गठण !*

       *डॉ मिलिन्द जीवने 'शाक्य',* नागपुर १७

राष्ट्रिय अध्यक्ष, सिव्हिल राईट्स प्रोटेक्शन सेल 

एक्स व्हिजिटिंग प्रोफेसर, डॉ बी आर आंबेडकर सामाजिक विज्ञान विद्यापीठ महु मप्र 

मो‌. न. ९३७०९८४१३८, ९२२५२२६९२२


              भारत का *"मुद्रा अविष्कार"* यह सिंधु घाटी सभ्यता में दिखाई देता है. सिंधु घाटी सभ्यता यह विश्व का *"सब से बडा व्यापारी केंद्र"* रहा था. वही *चक्रवर्ती सम्राट अशोक* के राजव्यवस्था में, *"भारत की बडी समृद्ध अर्थव्यवस्था"* हमें दिखाई देती है. तब *"अखंड विशाल भारत"* रहा था. जब हम भारत के *"मुद्रा प्रणाली व्यवस्था"* का अध्ययन करते है, तब भारत की प्राचीन अर्थव्यवस्था यह *"चांदी"* पर आधारित दिखाई देती है. अर्थात *"धातु का शिक्का"* अविष्कार का बोध होता है. उसके पहले *"वस्तु के वस्तु बाजार व्यवहार"* रहा था. परंतु उस *"विनिमय"* में कुछ समस्या भी रहती थी. *"वस्तु के बदले आवश्यक वस्तु की खोज"* उतनी सहजता नहीं होती थी. यही कारणवश *"धातु का शिक्का"* प्रचलन व्यवस्था शुरु हुयी. इस संदर्भ का एक लंबा इतिहास है. परंतु *"अंग्रेज कालखंड"* में रुपया की किंमत *"चांदी"*(Silver) से तय होना, वही इस विनिमय को बदल कर *"सोना"*(Gold) में परावर्तित किया गया. कारण *"वैश्विक अर्थव्यवस्था"* को दिया जाता है. तब ब्रिटन की अर्थव्यवस्था यह *"सोना"* पर आधारित थी. ब्रिटन में *"पौंड"* तो भारत में *"रुपया"* मुद्रा थी. *"सोना - चांदी की खदाने खोज"* होती रही. *"आपुर्ती की अधिकता, मांग की कमी"* का परिणाम, भारत के *"रुपया"* पर पडते गया. *"चांदी"* में गिरावट दिखाई देने लगी. बाबासाहेब डॉ आंबेडकर इन्होने *"भारत की इस अर्थव्यवस्था"* का सखोल अध्ययन किया. और बाबासाहेब डॉ आंबेडकर इन्होने *"The problem of Rupees : it's origin and its solution "* यह प्रबंध लिखकर *"लंडण विद्यापीठ"* को १९२२ को सादर कर, *"डी.एस.सी."* डिग्री हासिल की थी. बाबासाहेब आंबेडकर वह प्रबंध १९२३ में *"पी. एस. किंग एंड सन्स"* लंडन से प्रकाशित होने पर, *"ब्रिटिश भारत में तहलका"* मच गया. अत: *"रुपया पर नियंत्रण"* रखने के लिये, ब्रिटिश सरकार को एक *"आर्थिक संंस्था"* की जरुरत होने लगी. और डॉ बाबासाहेब आंबेडकर इनके *"प्राब्लेम ऑफ रुपया"* इस आर्थिक विषयक ग्रंथ के आधार पर, *"रिझर्व्ह बँक ऑफ इंडिया"* की स्थापना १ एप्रील १९३५ में की गयी.

               ब्रिटीश *"पौंड"* की तुलना में भारतीय *"रुपया"* गिरने का प्रमुख कारण *"सोना"* पर आधारीत मुद्रा व्यवस्था थी. भारतीय *"चांदी"* आधारीत मुद्रा व्यवस्था का भारत में प्रचलन रहा था. ब्रिटीश सरकार *"सोना"* आधारीत विश्व अर्थव्यवस्था को स्थिर मानते रहे थे. भारत में आम लोग / मजुर / किसान आदि को *"चांदी"* का स्वस्त होन से, व्यवहार में सरल था. *"सोना"* यह आम लोगों के सहज नहीं था. *"रुपया का कमजोर होने का फायदा निर्यातक को होता रहा."* उन का ही माल ज्यादातर बिकता रहा. भारतीय किसानों का क्या ? भारत में *"आर्थिक विद्रोह"* की बडी स्थिती होती रही थी. *"भारत राष्ट्रवाद"* की चिंगारी उठना शुरु हुयी. भारत समान गरिब देश में प्रचुर मात्रा में, *"सोना"* प्राप्त करना इतना सहज भी नहीं था. आम लोगों के लिये *"बचत"* करना कठिण हो रहा था. भारत के *"संप्रभुता"* का विषय भी रहा था. भारत की *"मुद्रा नीति"* को स्थिर रखना इसके साथ ही *"मंहगाई"* को स्थिर रखना यह एक द्वंद्व रहा था. ब्रिटीश सरकार *"Gold Exchange"* इसके साथ ही *"Gold Exchange Standard"* इन दो विनिमय नीति का, मायाजाल व्यवहार करता था. यह एक प्रकार का धोका था. लुट थी. *बाबासाहेब डॉ आंबेडकर* ने इन दोनो पध्दती को नकारा था. ब्रिटीश सरकार *"मंहगाई"* काल में भी अपनी मर्जी से ही *"नोट छापता"* था. भारतीय *"रुपया की बडी गिरावट"* होती रही. *"आर्थिक संस्थान"* ना होने से, इस पर *"नियंत्रण"* कौन करे ? यह प्रश्न था. *"मुद्रा का स्थिर होना / मंहगाई"* पर भी नियंत्रण जरूरी था. बाबासाहेब डॉ आंबेडकर के *"Problem of Rupees : It's origin and it's solution"* यह ग्रंथ ब्रिटिशों को मार्गदर्शक रहा. ब्रिटीश सरकार ने *"६ मार्च १९३४ को संसद में रिझर्व्ह बँक बिल पारित"* किया. और १ एप्रिल १९३५ को *"Reserve Bank of India"* की स्थापना हुयी. *"मुद्रा समस्या का हल"* को निकाला गया. भारतीय *"रुपया को जारी करना"* यह *"सोना"* अनुपात में नियंत्रण आ गया.

             उपरोक्त *"ब्रिटिश काल का आर्थिक इतिहास"* बताने का कारण, भारत के आज के *"आर्थिक कु-स्थिती"* की जानकारी कराना है. रिझर्व्ह बँक / शासन बॅंक / वित्तीय संस्था द्वारा रिझर्व्ह बँक खातों में, *"२.३ लाख करोड का डिव्हिडंट"* मिलने का अनुमान लगाया गया है. सन २०२३ - २४ तथा २०२२ - २३ में, रिझर्व्ह बँक ने नरेंद्र मोदी सरकार को क्रमशः *"२१ लाख करोड / ८७.४२० लाख करोड"* का डिव्हिडंट दिया है. सन २०२५ में नरेंद्र मोदी सरकार ने कुल *"२.६९ लाख करोड"* का डिव्हिडंट लिया है. जो आज तक का एक बडा इतिहास है. जो आज तक के इतिहास में,*"किसी सरकार"* ने नहीं लिया. सन २०१९ से २०२४ तक रिझर्व्ह बँक ने, *"७६००० किलो सोना"* गिरवी रखा है. वही सन २०२५ में रिझर्व्ह बँक ने *"विदेशी ट्रेझरी"* जमा गोल्ड में से, *"१००.३२ मेट्रिक टन सोना"* वापस मंगाया है. अब विदेशी ट्रेझरी में केवल *"३६७.६० मेट्रिक टन सोना"* शेष है. भारत के हर व्यक्ती के नाम *"४.८ लाख का कर्ज"* का बोजा है. भारत को *"रशिया"* से पिछले ६ माह में *"२३१ मिलियन बैरल कच्चा तैल आयात"* हुआ है. और वह कच्चा तैल *"अंबानी ग्रुप / नायरा एनर्जी"* इन दो निजी कंपनी के पास आने के बाद, उस पर *"प्रक्रिया होने"* के बाद, सारा तैल *"विदेशों में निर्यात"* किया जाता है. उपर से *अमेरिका"* ने रशिया से कच्चा तैल लेने के कारण, भारत पर *"५०% टेरिफ"* लगाया है. रशिया से आया *"कच्चे तैल"* का, हम *"भारतीय जनता को क्या लाभ"* मिला ? क्या *"पेट्रोल के दाम कम"* हुये हे ? अमेरिका टेरिफ का परिणाम *"भारतीय अर्थव्यवस्था"* पर होगा. भारत में *"महंगाई"* बढती जा रही है. अत: *"भारतीय अर्थ नीति"* को समझना, हमारे लिये बहुत जरुरी है.

             सन २०२४ साल में, *"आंतरराष्ट्रीय श्रम संगठण"* (International Labour Organization - ILO) ने, समस्त *"विश्व का बेरोजगारी दर (Unemployment) ४.८९%"* बताया है. सन २०२५ का दर उपलब्ध नहीं बताया है. सन २०२५ में भारत का *"बेरोजगारी दर ५.२%"* बताया है. जहां ग्रामीण क्षेत्र - ४.४% तथा शहरी क्षेत्र - ७.२% है. *"लिंग"* (Sex) के अनुपात में महिला - ८.७% तथा पुरुष - ४.६% है. भारत का *"भुखमरी दर"* (Global Hunger Index - GHI) *"सन २०२४ में २७.३ % तथा सन २०२३ में २८.७%"* है. विश्व के १२७ देशों में भारत *"१०५ वे स्थान"* पर है. हमें *"भुखमरी दर प्रमाण"* यह भी समजना जरुरी है. निम्न दर - ९.९% / मध्यम दर -१०.९ % से १९.९% / चिंताजनक दर - २०.००% से ३४.९% / अत्यंत चिंताजनक - ३५.००% ... *"सर्वोच्च न्यायालय"* के द्वय - न्या. विक्रमनाथ / न्या. संदिप मेहता खंडपीठ द्वारा अपने निर्णय ) Judgement) में कहा कि, *"Govt. is a constitutional employer not a market player."* It cannot use outsourcing as a means of exploitation. सर्वोच्च न्यायालय का यह निर्णय हमारे लिये एक बडा संदेश है. भारत का सामान्य (Normal) *"सकल देशांतर्गत उत्पादन"* (GDP) सन २०२५ में अंदाजनं *"४.३ से ४.८ ट्रिलियन डॉलर"* बताया जाता है. और आर्थिक रॅंकिग में *"विश्व में चवथे नंबर"* (?) की अर्थव्यवस्था होने का बहुत डिंडोरा पिटा जाता है. वास्तविकत: भारत की *"अर्थव्यवस्था यह आठ - नौ नंबर"* पर है. *"अमेरिका"* की अर्थव्यवस्था विश्व में *"नंबर वन"* तथा *"चायना"* की अर्थव्यवस्था *"नंबर दो"* पर है. *"दरडोई उत्पन्न"* (Per Capita Income) में अमेरिका के बाद चायना / जर्मनी इन देशों का नाम आता है. उसका सुत्र है. *"दरडोई उत्पन्न = देश की जीडीपी ÷ कुल जनसंख्या."* भारत का दरडोई उत्पन्न अंदाजन *"२.४ लाख रुपये"* (?) वार्षिक है. *बिहार* यह राज्य बहुत पिछडा है. बिहारी का *"वार्षिक उत्पन्न रु. ९०,००० /-"* है. विश्व की *"जनसंख्या"* (Population)  माह अगस्त २०२५ तक *"८.२ अब्ज"* है. और हर साल *"७० दशलक्ष"* में बढ रही है. *चायना* की जनसंख्या - १४०.८ करोड है. जब की भारत की जनसंख्या - *"१४६ करोड"* बतायी जा रही है. भारत को आजादी १५ अगस्त १९४७ को / प्रजातंत्र २६ जनवरी १९५० में मिलने के बाद, हमारी आर्थिक स्थिती में बहुतसा सुधार भी हुआ था. सन २०१४ के बाद की *"आर्थिक स्थिती"* के बारे में क्या कहे ? भारत में संसद उपलब्ध होने के बाद  भी,*"नयी संसद भवन - ईस्टा"* के नाम पर भी *रु. ९७१ /- करोड* अंदाजनं  खर्च / प्रधानमंत्री का नया *"एयरक्राफ्ट"* खरेदी (?) *रू. ८८५८/- करोड* अंदाजन खर्च / प्रधानमंत्री की *"कार"* खरेदी *रु. १४०० /- करोड* अंदाजन आदि खर्च हमे क्या संदेश दे रहे है. कोई महाराजा का क्या यह खर्च होगा ? उपर से *"सांसद / विधायक"* वर्ग को पाच साल होने के बाद *पेंशन* भी !!! इधर कर्मचारी वर्ग की २५ - ३० साल सेवा देने के बाद भी, *"पेंशन बंद"* की जा रही है. भारत के *"उद्योग व्यवसाय"* की क्या स्थिती है ? *"शेती व्यवसाय"* की क्या भयाण स्थिती है ? लेकिन भारत की *"मंदिर अर्थनीति"* बहुत उफान पर है. नोबेल विजेत्या अर्थशास्त्री *डॉ अमर्त सेन* ने बाबासाहेब आंबेडकर को अपना *"आर्थिक गुरु"* माना. भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री अर्थशास्त्री दिवंगत *मनमोहन सिंग* जी भी डॉ बाबासाहेब आंबेडकर के *"आर्थिक ज्ञान"* को समजते थे. परंतु प्रधानमंत्री *नरेंद्र मोदी* इनकी अर्थनीति यह समज से परे है. भारत *"आर्थिक खस्ताहाली"* की ओर जा चुका है. भारत की अर्थव्यवस्था *"पाकिस्तान / बांगला देश / श्रीलंका"* इन देशों के बदतर स्थिती में हो तो, कल भारत की *"अर्थव्यवस्था"* क्या होगी ? हम फिर भी कहते हैं, *"मेरा भारत महान !"* जरा सोचो ....


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◼️ *डॉ मिलिन्द जीवने 'शाक्य'*

        नागपुर दिनांक ६ सितंबर २०२५

Thursday, 4 September 2025

 🫀 *हे हृदयातील प्रेम भाव !*

       *डॉ. मिलिन्द जीवने 'शाक्य'*

       मो. न. ९३७०९८४१३७


हे हृदयातील प्रेम भाव ह्या ओठांवर यावे

बुध्द जगातील भीम किर्ती दिगंतात वावे...


निसर्ग शब्दांचे शांती गीत हे मनात यावे

संगिताची मधुर सुर ताल तु छेडीत जावे

ह्या सुगंध लहरी धुनीत मी रममाण व्हावे

बुध्द भीमाच्या चरणी शीर झुकता जावे...


हे दुर होता ना रे कधी तु आसपास यावे

भीमाच्या संघर्ष जीवनाची तु साक्ष व्हावे

ह्या सत्य जीवाशी ना कधी बेईमान व्हावे

बुध्द भीमाच्या विचारांचे हे पाईक व्हावे...


फुलांच्या गंधानी हा आसमंत रंगुन जावे

ह्या निसर्ग जगतात रे संपुर्ण शुध्दता यावे

कुणी कुणाचे मन ना ही द्वेष पीक व्हावे

बुध्द भीमाचा नाद हा जगी गुंजता जावे...


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◼️ *डॉ. मिलिन्द जीवने 'शाक्य'*

       नागपूर दिनांक ३ सप्टेंबर २०२५



🫀 *A love by heart !*

       Dr. Milind Jiwane 'Shakya' 

       Mob. 9370984138


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Monday, 1 September 2025

✍️ *प. पु. डॉ बाबासाहेब आंबेडकर लेखन - भाषणे शासन प्रकाशनात दिवंगत प्रा. हरी नरके ह्यांच्या नरकवाद : एड. (डॉ.) सिध्दार्थ कांबळे ह्यांचा माफीनामा संदर्भ पॅंथर प्रकाश बनसोड संपादीत पुस्तकाची समिक्षा !*

       *डॉ मिलिन्द जीवने 'शाक्य',* नागपूर १७

राष्ट्रिय अध्यक्ष, सिव्हिल राईट्स प्रोटेक्शन सेल 

एक्स व्हिजिटिंग प्रोफेसर, डॉ बी आर आंबेडकर सामाजिक विज्ञान विद्यापीठ महु मप्र 

मो. न. ९३७०९८४१३८, ९२२५२२६९२२

 

            रातुम नागपूर विद्यापीठ नागपूर अंतर्गत *"डॉ. आंबेडकर अध्यासन विभागातील"* (Dr. Ambedkar Chair) तत्कालीन विभागप्रमुख माझा जिवलग मित्र *प्रा. डॉ. प्रदिप आगलावे* ह्यानी केलेल्या भ्रष्टाचार संदर्भात *पॅंथर प्रकाश बनसोड* संपादीत पुस्तकावर मी माझी समिक्षा लिहिली असल्याने / मिडियामध्ये ती प्रकाशित झाल्यामुळे *प्रा. आगलावे* ह्याच्या वतीने *एड. (डॉ) सिध्दार्थ कांबळे* ह्यांनी मला *"कायदेशीर नोटीस"* दिलेली आहे. सदर दिलेल्या कायदेशीर नोटीसला योग्य वेळी उत्तर दिले जाणार आहे. परंंतु सदर नोटीस मध्ये *"प्रा. हरी नरके* संपादित महाराष्ट्र शासनाच्या *"डॉ बाबासाहेब आंबेडकर चरित्र साधने प्रकाशन* पुस्तकातील *प्रकाश बनसोड* संपादीत (१३ ऑक्टोबर २०१० रोजी) केलेले पुस्तक *"डॉ बाबासाहेब आंबेडकर : लेखन - भाषणे - समस्या आणि उपाय"* हा संदर्भ देतांना *प्रकाश बनसोड* ह्यांच्यावर काही टिका केली गेली. मला प्रा बनसोड पासुन अलिप्त असावे, असा तो संदेश आहे. तेव्हा मी पॅंथर *प्रकाश बनसोड* ह्याला फोन करून सदर पुस्तक मागावुन घेतले. आता मी सदर दुस-या पुस्तकावर माझी समिक्षा करीत आहे. सदर पुस्तकात मला ज्या वकिलांनी कायदेशीर नोटीस दिलेली आहे, ते *डॉ. सिध्दार्थ कांबळे* - पुर्वीचे पशु डॉक्टर आणि आताचे वकिल ह्यांनी तत्कालीन शिक्षणमंत्री *दिलिप वळसे पाटील* ह्यांना चरित्र साधने प्रकाशन समितीचे "सदस्य सचिव" *प्रा. हरी नरके* (९ ऑगस्ट २०२३ ला स्मृतीप्राप्त) ह्यांच्या *"एककल्ली कारभाराची"* गंभीर तक्रार *दिनांक ६ ऑक्टोबर २००५* रोजी केलेली दिसुन आली. आणि तब्बल १७ वर्षांनंतर २४ जानेवारी २०२२ ला *डॉ सिध्दार्थ कांबळे* ह्यांनी *प्रा. हरी नरके* ह्यांना सदर तक्रारींचा *"माफीनामा"* दिल्याची चर्चा आहे. *डॉ सिध्दार्थ कांबळे* ह्यांनी सदर माफीनामा मागण्यात काय *"गौडबंगाल"* आहे ? हे डॉ. सिध्दार्थ कांबळे ह्यांनाच माहित !!! डॉ सिध्दार्थ कांबळे हे सदर तक्रारीत चरित्र साधने प्रकाशन समितीचे ओएसडी *वसंत मुन* हे त्यांचे *"अंकल"* असल्याचे लिहिलेले आहे. *वसंत मुन ह्यांचे निधन १ एप्रिल २००२* रोजी झाल्यानंतर *दिनांक २३ ऑगष्ट २००२* ह्या रोजी महाराष्ट्र शासनाच्या आदेशानुसार *प्रा. हरी नरके* ह्यांची *"ओएसडी"* (Officer on Special Duty) ह्या पदावर नियुक्ती करण्यात आली होती. परंतु *प्रा. हरी नरके* ह्यांनी *"ओएसडी"* पदामध्ये बदलाव *"सदस्य सचिव"* म्हणुन करुन घेतले. हा सुध्दा अलग इतिहास आहे. मग चरित्र साधने प्रकाशन समितीला कशी घरघर लागली आणि *"खंडांचे प्रकाशन"* होण्यास कसा विलंब झाला, हा संदर्भ इतिहास म्हणजे *प्रकाश बनसोड* संपादीत ती पुस्तक होय.

          डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर चरित्रे - साधने प्रकाशन समितीची *"स्थापना दिनांक १५ मार्च १९७६"* ला तत्कालिन उच्च व तंत्रशिक्षण मंत्री ह्यांच्या *"अध्यक्षतेखाली"* करण्यात आली होती. डॉ. आंबेडकर ह्यांचे उद्दीष्टे पुर्ण करण्यासाठी *"ऑफिसर ऑन स्पेशल ड्युटी"* (OSD) हे पद निर्माण करुन सन १९७८ मध्ये *वसंत मुन* ह्यांची सदर *"पदावर नियुक्ती"* करण्यात आली होती. डॉ बाबासाहेब आंबेडकर ह्यांची चळवळ - भाषणे - लिखाण साहित्य हे विपुल प्रमाणात उपलब्ध आहे. परंतु सदर साहित्य प्रकाशन करण्यास *वसंत मुन* ह्यांनी संपूर्ण हयात पणास लावली. त्यांनी बाबासाहेब ह्यांचे *"विखुरलेले साहित्य जमा"* करण्यास प्राणाची बाजी लावली. त्यांना बाबासाहेब ह्यांच्या तत्वज्ञान - चळवळीची खुप जाण होती. सदर विषयावर वसंत मुन ह्यांनी लिखाण सुध्दा केले आहे. *"डॉ बाबासाहेबांचे बरेच लिखाण साहित्य ट्रंकमध्ये बंद होते."* काही साहित्य लिखाणाला *"किड"* लागलेली होती. पेटी मध्ये सदर साहित्य खुप वर्षे बंदिस्त असल्याने *"कुबट वास"* सुटलेला होता. सदर सर्व लिखाण साहित्य *वसंत मुन* ह्यांनी *"छान स्वच्छ"* करुन खंड रुपात *"दोषरहीत"*  प्रकाशित केलेले होते. पेटीतील *"साहित्याच्या दुर्गंधीने"* वसंत मुन हे *"आजारी"* ही पडलेत. वसंत मुन ह्यांनी केलेला हा *"प्रयास मी व्यक्तीश:"* वसंत मुन ह्यांच्याकडुन ऐकलेला आहे. *वसंत मुन* ह्यांना मी आयोजित केलेल्या एका *"कार्यक्रमात निमंत्रित"* केले होते. वसंत मुन ह्यांच्या *हनुमान नगर नागपुर येथील घरी* आणि वर असलेल्या *लायब्ररीत* ही माझे कधी कधीचं जाणे असे. *मुंबई* येथिल घरी सुध्दा *वसंत मुन सोबत माझी भेट* झालेली आहे. वसंत मुन सोबतच्या *"माझ्या अल्प सानिध्याने"* मला वसंत मुन ह्यांच्या मेहनतीची जाण आहे. *वसंत मुन* जेव्हा संपादन कार्यात रममान होते तेव्हा *प्रा प्रदिप आगलावे आणि मी स्वतः* विद्यार्थी दशेत होतो. सध्या वकिली करीत असलेला पशुचा डॉक्टर *सिध्दार्थ कांबळे* हा आमचा मित्र *वसंत मुन हे अंकल* सांगत असतांना वसंत मुन ह्यांच्या सोबत *"१६ वर्षांचा"* संदर्भ देत आहे. मग डॉ सिध्दार्थ कांबळे हे प्रकाशन समितीचे सदस्य सचिव *प्रा. हरी नरके* ह्यांच्या *"नरकवाद कार्याची कां बरे वाहवा"* करीत आहे ? कां बरे हरी नरके ह्यांना *"माफीनामा"* सादर केला आहे ? सदर संदर्भ खरे तर संशोधनाचा विषय आहे असे म्हटलेले बरे !!! *वसंत मुन* ह्यांनी घेतलेले परिश्रम त्यानंतर आलेल्या एकाही *"ओएसडी / सदस्य सचिव"* ह्यांनी घेतलेले नाहीत, हे खेदाने म्हणावे लागते. फक्त *"तोरा दाखविण्याचे / मानधन - शासन लाभ घेण्याचे काम"* नंतर नियुक्ती झालेल्या तमाम *"ओएसडी वा सदस्य सचिव "* पदस्थ लोकांनी केलेले आहे. नंतर काही खंड प्रकाशित झालेत ही ! परंतु सदर *"प्रकाशीत खंडाच्यावर दोषपूर्ण"* (?) असल्याचा *"काळा शिक्का"* हा लागलेला आहे. ह्याला आपण काय म्हणावे ? सदर काळ्या शिक्क्यात सध्या कार्यरत *"सदस्य सचिव"* माझा जिवलग मित्र *प्रा. प्रदिप आगलावे* हा सुध्दा सुटलेला नाही. प्रदिप आगलावे ह्याच्यावर *"शासन प्रकाशन समितीच्या सदस्यांनीचं"* गंभिर आरोप केलेले आहेत. अगदी तत्कालीन सदस्य सचिव *"प्रा. हरी नरके* ह्यांनी केलेला *"एककल्ली कारभार"* समकक्ष एककल्ली कारभार हा माझा जिवलग मित्र *प्रा. प्रदिप आगलावे* ह्यांचा राहिलेला आहे.

          प्रकाशन समितीचे "सदस्य सचिव" *प्रा. हरी नरके* ह्यांनी सन २०१० मध्ये *"खंड २१, २२"* प्रकाशित करतांना कोणतेही मोठे योगदान दिलेले नाही, हा आरोप समिती सदस्यांकडुन केला गेला. औरंगाबाद येथिल *प्रा. दत्ता भगत* हे सुध्दा *"सदस्य सचिव"* झालेले होते. ह्यांचाही कार्यकाल हा विवादीत राहिलेला आहे. प्रकाशित खंडातील *"पेज नंबर सहित चुकांची फार माठी जंत्रीच"* ब-याच बाबासाहेबांच्या अभ्यासक वर्गांनी तयार करुन तश्या अनेक तक्रारी ह्या महाराष्ट्र शासनाकडे करण्यात आल्या होत्या. आणि सदर खंडाची *"विक्री थांबवुन"* ती पुन्हा *"पुनर्मुद्रण"* करण्याची मागणी झाली. कारण डॉ बाबासाहेब आंबेडकर यांच्या *"लिखाणाच्या संदर्भात चुकीचा संदेश"* जावु नये, हा त्यामागे समिती सदस्यांचा चांगला उद्देश होता. दिनांक १४ एप्रिल २०१० रोजी प्रकाशित *"डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर : चित्रमय चरित्र"* ह्या ग्रंथात छायाचित्रांच्या तज्ञांनी *"४६० छायाचित्रे"* ही निवडुन दिलेली होती. परंतु *"खंड २२ मध्ये १९८ फोटोंचा"* समावेश करण्यात आला. परंतु सदर फोटोच्या खाली *"फोटोचा संदर्भ"* हा दिला गेला नाही. मग सदर फोटोला जीवंतपणा कसा येणार आहे ? उर्वरित *"२६२ फोटोंचे"* काय झाले ? सदर प्रश्न निवड समिती सदस्यांनी प्रा. हरी नरके ह्यांना केलेले होते. नामांकित चित्रकार *प्रा. प्रमोद रामटेके* हे अल्बम समितीचे सदस्य होते. त्यांना सुध्दा अंधारात ठेवले गेले. खंडाची बांधनी करण्यात *प्रा. मधुकर कासारे / एन. जी. कांबळे (Retd. IPS) / प्रा. अशोक गोडघाटे* ह्यांनी खुप मेहनत घेतलेली दिसुन येत आहे. ह्या समिती सदस्यांना विचारण्यात आलेले नाही. प्रकाशन समितीच्या नियमित सभा घेण्यास *प्रा हरी नरके* हे उदासिन असल्याची जाण ही *प्रकाश बनसोड* संंपादित पुस्तक देत आहे. बाबासाहेबांच्या ग्रंथ संपदा समितीतील *खासदार रा. सु. गवई / खासदार रामदास आठवले / आमदार प्रा. जोगेंद्र कवाडे / डॉ. नितीन राऊत* इत्यादी राजकिय नेत्यांनीही उचित प्रकाशन होण्यास आवाज उठविल्याचे ही दिसुन येत आहे. असे जरी असले तरी *प्रा. प्रदिप आगलावे* ह्यांना "सदस्य सचिव" होण्याकरीता *डॉ. नितीन राऊत* ह्यांनी केलेली शिफारस खुप वेदना लावुन जाते. कारण *प्रा. हरी नरके आणि प्रा. आगलावे* ह्यांची काम करण्याची पध्दती एकसमान दिसुन येत आहे. *"प्रकाशन खंडातील चुका ही !!!"* खरे तर ह्या प्रकाशन समितीतील काम हे *"सामुहिक असे काम"* आहे. व्यक्तिगत काम नाही. परंतु हा अभाव समितीतील कार्यात दिसुन येत आहे. *प्रकाश बनसोड* ह्यांनी पुस्तक संपादन करतांना नामांकित चित्रकार *प्रा. प्रमोद रामटेके / रमेश‌ शिंदे / प्रा. भगवान धांडे / उध्दव नारनवरे / गजानन बोदडे / पॅंथर प्रकाश बनसोड / डॉ. सिध्दार्थ कांबळे / प्रा. डॉ. एस. एन. बुसी (Retd. IRS) / आलोक देशपांडे* ह्यांच्या लिखाणाचा समावेश केला आहे. ह्याशिवाय सदर पुस्तकात अजुन काही मान्यवरांचा संदर्भ दिला आहे. सदर पुस्तक हे *"विनामूल्य वितरण"* (?) अन्वये लिहिण्यापेक्षा *"देणगी मुल्य ५० - १००/-"* असे ठेवायला हवे होते. असो. ही पुस्तक आंबेडकरी प्रेमींनी एकदा वाचायलाचं हवे. पुस्तकाचे मुखपृष्ठ नामांकित चित्रकार *प्रा प्रमोद रामटेके* ह्यांनी सुबक तयार केलेले आहे. *पॅंथर प्रकाश बनसोड* ह्याच्या ह्या कार्याला मंगल कामना देतो.


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▪️ *डॉ. मिलिन्द जीवने 'शाक्य'*

       नागपूर दिनांक १ सप्टेंबर २०२५